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कांतारा का हिंदी में रीमेक नहीं चाहते ऋषभ: Kantara News
Hindi Remake of Kantara

Kantara Review: पिछले कुछ दिनों में साउथ की फिल्‍मों का जादू दर्शकों पर कुछ ऐसा चल रहा है कि वे इन फिल्‍मों की हिन्‍दी डबिंग को सिनेमाघरों में देखने को बेकरार रहते हैं। कुछ समय पहले तक जहां साउथ की फिल्‍में टीवी पर आती थीं, उसके बाद उन फिल्‍मों ने ओटीटी प्‍लेटफॉर्म पर अपनी पकड़ बनाई। अब इनकी दीवानगी दर्शकों को सिनेमाघरों तक ले आती है। इसके पीछे वजह है उनका कंटेंट और बेहतरीन आदाकारी और सिनेमैटोग्राफी। पिछले दिनों केजीएफ की सफलता के बाद मणिरत्‍नम की पोन्नियन सेल्‍वन 1 को देखने के बाद दर्शकों को ज्‍यादा सेटिस्‍फैक्‍शन नहीं मिला वहीं कंतारा का ट्रेलर देखने के बाद हिंदी बेल्‍ट के दर्शकों ने इसको हिंदी में रिलीज करने की मांग शुरू कर दी थी। 14 अक्‍टूबर को फिल्‍म हिंदी में भी रिलीज हो चुकी है और इसे देख इसकी तुलना केजीएफ से की जा रही है। हो भी क्‍यों न इस फिल्‍म का निर्माण भी होम्‍बाले फिल्‍म्स ने किया है। केजीएफ के बाद एक और भारत के अंदर बसने वाली कहानियों को उन्‍होंने बेहतरीन तरीके से दर्शाया है।

कंतारा एक मिथक और भारतीय जड़ों को दर्शाती कहानी

कंतारा की कहानी जंगलों में बसे एक गांव और उससे जुड़े एक मिथक देवता पर आधारित है। फिल्‍म में दिखाया गया है कि 1870 में एक राजा जो शांति को खोजता हुआ कंतारा आ जाता है। वहां उसे शांति और आनंद मिलता है जिसके पीछे वहां बसने वाले एक देवता और उनसे जुड़ी मिथक कहानी है। वह राजा उस देवता को अपने साथ ले जाने की बात करता है तो देवता राजा से उस जंगल की वह भूमि उन गांव वालों को देने के लिए कहते हैं और राजा के साथ जाने को तैयार हो जाते हैं। देवता शर्त रखते हैं कि वह भूमि हमेशा गांव वालों की रहेगी और अगर कोई उसे लेगा तो वह उसे माफ नहीं करेंगे। ऐसी कहानी भारत के हर कोने में लोक कथाओं के रूप में अक्‍सर सुनने को मिल जाती हैं। इस कहानी को बड़े पर्दे पर असरदार तरीके से दिखाने का श्रेय जाता है रिषभ शेट्टी को। फिल्‍म की कहानी आगे बढ़ती है। 1970 में जहां उस राजा की अगली पीढ़ियों के लोग कंतारा की जमीन को फिर से हासिल करने के लिए गांव वालों की आस्‍था पर सवाल उठाते हैं। गांव वाले जो साल में एक बार देवता की पूजा के लिए भूत कोला का आयोजन करते हैं। उनका मानना है कि इस दौरान एक नर्तक के शरीर में देवता प्रवेश करते हैं और राजा के वंशजों के प्रश्‍न उठाने पर नर्तक के शरीर के साथ देवता जंगल में बीच में जाकर गायब हो जाते हैं। इस दृश्‍य को इस तरह से दर्शाया गया है कि लगता है कि आप इस सबसे जुड़े हैं।

कहानी का अगला हिस्‍सा दिखाया जाता है 1990 में। फिल्‍म का हीरो शिवा(रिषभ शेट्टी ) कंबाला(भैसों की रेस) में हिस्‍सा लेता है। साउथ के इस खेल का दृश्‍य बेहद अनूठा और सजीव लगता है। शिवा कंतारा का रक्षक है, कुछ साल पहले उसके पिता देवता बनकर जंगल में गायाब हो गए थे। एक बार फिर राजा के वंश का एक सदस्‍य देवेन्‍द्र (अच्‍युत कुमार) को इस जमीन का लालच होता है। वहीं जंगल में नए फारेस्‍ट ऑफीसर मुरलीधर (किशोर कुमार जी) आते हैं जो कंतारा को रिजर्व फॉरेस्‍ट बनाना चाहते हैं। एक बार फिर देवता की इस भूमि के लिए सरकार और राजा के वंशज की चाहत से कहानी में विद्रोह होता है। शिवा की मां जो अपने पति के गायब होने से पहले से ही दुखी है उसे अपने बेटे की भी चिंता होने लगती है। फिल्‍म में हीरो की प्रेमकहानी भी आसान नहीं है। शिवा की गर्लफ्रैंड लीला(सप्‍तमी गौडा) फॉरेस्‍ट ऑफीसर के अंडर काम करती है। सरकार और अमीरों की इस जंग में क्‍या कंतारा के लोग अपनी जमीन को बचा पाते हैं या नहीं। शिवा और उसके परिवार का गांव से जुड़े मिथक से संबंध को क्‍लाईमैक्‍स के बाद भी दर्शकों को बांधे रखने वाला है।

कांतारा ट्रेलर Video

फिल्‍म में क्‍या है खास

फिल्‍म की कहानी बेहद असरदार और लोगों से कनेक्‍टेड है। जंगल और उससे जुड़े रहस्‍यों को यूं भी जानने की उत्‍सुकता लोगों में रहती है। तो उससे जुड़ी लोककथा जैसी यह कहानी पसंद आएगी। फिल्‍म के कलाकरों की आदाकारी भी काफी दमदार है। सिनेमैटोग्राफी का कमाल भूत कोला, कंबाला और जंगल के दृश्‍यों की खूबसूरती में देखने को मिलता है। फिल्‍म में वीएफएक्‍स भी अच्‍छा है। फिल्‍म के निर्देशन और स्‍क्रीनप्‍ले के साथ साथ रिषभ शेट्टी ने बेहतरीन अभिनय कर अपनी बहुमुखी प्रतिभा को पर्दे पर बखूबी उतारा है। फिल्‍म के अन्‍य कलाकार किशोर कुमार जी, अच्‍युत और सप्‍तमी गौडा ने भी बेहतरीन अदाकारी से फिल्‍म में जान फूंक दी है।

वैसे तो यह फिल्‍म हिंदी बेल्‍ट के दर्शकों को भा रही है। हो सकता है उन्‍हें हिंदी डबिंग में कुछ कमी लगे। हालांकि मेकर्स ने हिंदी में भी अच्‍छे डायलाग देने की कोशिश की है। कुल मिलाकर एक बार फिर आपको पैसा वसूल फिल्‍म कंतारा के रूप में देखने को मिलेगी।

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