gunahon ka Saudagar by rahul | Hindi Novel | Grehlakshmi
gunahon ka Saudagar by rahul

एक पब्लिक कॉल बूथ के पास रुककर अमर ने प्रेमप्रताप से कहा‒

“तुम यहां इसके पीछे छुप जाओ।”

पप्पी बूथ के पीछे छुप गया। भय के मारे उसका चेहरा पीला पड़ गया था।

अमर ने बूथ में घुसकर डायल घुमाया। आवाज आने पर सिक्का डाला और माउथपीस मुंह के करीब लाने के बाद आवाज बदलकर बोला‒“हैल्लो…!”

गुनाहों का सौदागर नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

दूसरी तरफ से पुरुष-स्वर सुनाई दिया‒“हैल्लो…!”

“नेताजी हैं…?”

“आप कौन हैं ?”

“मैं कोई भी हूं। अगर नेताजी न भी हों तो उन तक तुरंत खबर पहुंचा दीजिए कि अकरोली के रास्ते पर नहर के पश्चिमी किनारे पर इंस्पेक्टर दीक्षित ने नेताजी के बेटे चेतन को गोली मार दी है।”

दूसरी तरफ से चीखने की-सी आवाज आई‒“क्या ? मेरे बेटे को गोली मार दी है ?”

“ओह ! आप नेताजी ही हैं।”

चीखकर पूछा‒“क्यों मार दी मेरे बेटे को गोली ? कौन हो तुम ?”

“मैं आपका एक भक्त हूं। नाम बताकर पुलिस के झंझट में नहीं फंसना चाहता। मैं अपनी आंखों से देखा था। इंस्पेक्टर दीक्षित पेड़ के पीछे छुपा हुआ था। उधर से चेतन बाबू मोटरसाइकिल पर गुजरे। दीक्षित ने उन्हें लल्कारकर रोका।

“दोनों में कुछ कहा-सुनी हुई। चेतन बाबू ने गुस्से में दीक्षित को एक पत्थर खींच मारा। दीक्षित ने बेहोश होते-होते चेतन बाबू को ही गोली मार दी।”

“तुम झूठ बोल रहे हो।”

“जल्दी कीजिए नेताजी। दीक्षित होश में आ गया तो आप जीवन भर उसे बेटे का कातिल साबित नहीं कर सकेंगे, क्योंकि वह बहरहाल पुलिस वाला है।”

फिर अमर ने रिसीवर लटका दिया।

बूथ से निकलकर उसने प्रेमप्रताप से कहा‒“अब आप अपना चेहरा ठीक कीजिए और यह भूल जाइए कि आप चेतन के साथ थे और आपने उसे गोली मारी है।

“अब चेतन का कातिल इंस्पेक्टर दीक्षित है, क्योंकि उसके हाथ में जो रिवाल्वर है उसकी गोली से चेतन की मौत हुई है। उसके ऊपर दीक्षित की ही उंगलियों के निशान हैं।”

“म…म…मगर…”

“प्रेम बाबू ! आप यही जानना चाहते हैं न कि आपने मेरे साथ इतना बड़ा अन्याय किया और मैंने आपकी गर्दन से फांसी का फंदा ही निकलवा दिया ?”

“हां, अपने इतने बड़े दुश्मन के साथ आखिर तुमने क्यों इतनी बड़ी भलाई की ?”

“इसलिए कि मैं आपको अपना दुश्मन नहीं समझता।”

“मगर तुम मेरे ही कारण से सस्पैंड हुए थे।”

“सस्पैंड मुझे मेरी सच्चाई ने कराया था और आपको शौकत और चौहान ने बिगाड़ा था, आप तीनों को अभिभावकों ने !”

प्रेमप्रताप कुछ न बोला।

अमर ने फिर से कहा‒“अगर आप इस सच्चाई को स्वीकार करते हैं कि आपको इतनी छूट नहीं होती तो आप लोग यूं खुले आम डकैती और लूटमार न करते फिरते तो आपकी समझ में खुद-ब-खुद सबकुछ समझ में आ जाएगा।”

“तुम शायद सच कह रहे हो। मुझे मेरे डैडी और शेरवानी ने मिलकर चेतन के खून पर उकसाया था‒वह भी झूठ बोलकर।”

“ओहो…!”

“उन्होंने मुझे बताया था कि नेताजी ने अपने बेटे चेतन के साथ षड्यंत्र करके मुझे और मेरे डैडी को फंसाया, दीपा को बहू बनाने के लिए। मैंने आवेश में चेतन को मार डाला। मगर चेतन ने मरते समय गीता की सौगन्ध खाई थी कि उसने कोई षड्यंत्र नहीं रचा था। वह अकारण ही मेरे हाथों मारा गया।”

कहते-कहते पप्पी ने बूथ से पीठ लगा ली। दोनों हाथों से मुंह छुपाकर सिसक-सिसककर रो पड़ा।

अमर ने ठण्डी सांस ली और उसके कंधे पर थपकी देखकर बोला‒“तुमने उनके इस षड्यंत्र का उद्देश्य समझा ?”

पप्पी ने आंसू पोंछकर रुंधे गले से कहा‒“मैं समझ गया हूं क्योंकि चेतन के मरते ही इंस्पेक्टर दीक्षित अकेेला वहां पहुंच गया था। उसने मुझे धीरज बंधाकर बताया कि इस तरह मैं जेेल चला जाऊंगा और दीपा से सगाई और शादी से बच जाऊंगा और मुझे बचा लिया जाएगा, यह कहकर कि चेतन खुद दीपा का प्रेमी था। और वह मुझे नहर के किनारे मारने के लिए ले गया था। मगर अपने बचाव में मुझसे खून हो गया।”

“हूं, और वे लोग यह बात साबित कर देते।”

उसने आंसू पोंछकर कहा‒“मगर…मैं…मैं अपने डैडी को दण्ड देना चाहता हूं।”

“किस प्रकार ?”

“मैं खुद अदालत में जाकर स्वीकार करूंगा कि मैंने चेतन का खून किया है और उसके लिए मुझे मेरे डैडी और उस कुत्ते शेरवानी ने उकसाया था।”

“क्या इस प्रकार तुम सचमुच अपने डैडी को दण्ड देने में सफल हो जाओगे ?”

“मैं उनका इकलौता बेटा हूं।”

“हुंह, वह इकलौता बेटा, जिसे उन्होंने सिर्फ अपने कुल की इज्जत बचाने के लिए दांव पर लगा दिया। मान लो अगर उनकी स्कीम में भूल रह जाती और यह साबित न हो पाता कि तुमने अपने बचाव में चेतन को मारा था तो भी तुम्हें मृत्यु-दण्ड ही मिलता।”

“बेश्क…!”

“लेकिन तुम्हारे डैडी को इस बात की परवाह नहीं थी। प्रेमप्रताप, दौलत की लालसा और राजनीति आदमी का दिल पत्थर कर देती है। उसके दिलों में भी खून के रिश्तों का भी कोई मान या महत्त्व नहीं रह जाता।”

पप्पी कुछ न बोला।

अमर ने फिर से कहा‒“तुम सचमुच अपने डैडी को दण्ड देना चाहते हो न ?”

“शत-प्रतिशत…!”

“तो फिर उसका एक ही तरीका है।”

“वह क्या ?”

उन्होंने जो चाल चली थी उसे असफल बना दो।”

“कैसे…?”

“दीपा से सगाई करके।”

“नहीं…”

अमर ने गम्भीरता से कहा‒“क्यों नहीं ? क्या इसलिए कि वह हरिजन है ?”

“मेरा मतलब है…”

“क्या दीपा सुन्दर नहीं ?”

“बहुत सुन्दर है।”

“पढ़ी-लिखी नहीं…?”

“है…!”

“क्या उसके अन्दर वह जोश और उत्साह नहीं, जो आज की एक अच्छी जीवन-साथी में होना चाहिए और आज के नौजवान चाहते हैं।”

“सबकुछ है। मगर उसने मेरे सामने मुझे और चेतन को मूर्ख बनाकर फंसाया और अपनी बिरादरी से मार पड़वाई।”

“जानते हो, उसने ऐसा क्यों किया ?”

“क्यों…?”

“इसलिए कि तुम्हारे ही जैसे ऊंची जाति के एक पंडित ने उसे मन्दिर के अन्दर जाकर भगवान के चरणों में दीपक जलाने से इसलिए रोक दिया कि वह हरिजन है।”

“ओह…!”

“उसने मनौती मानी थी कि वह ग्रेजुएट होने पर भगवान के चरणों में दीया जलाएगी। लेकिन पुजारी ने उसे अन्दर नहीं जाने दिया। उस मंदिर की आधार शिला चेतन के पिता ने रखी थी और उसके निर्माण के लिए सबसे ज्यादा रकम तुम्हारे पिता ने ही दी थी। इसीलिए उसने तुम दोनों के पिताओं को दंड देने का फैसला किया था।”

“मगर हमने उसका क्या बिगाड़ा था ?”

“प्रेम बाबू, लाला सुखीराम ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था ? उनके बेटे अमृत ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था ?”

प्रेम कुछ न बोला।

अमर ने फिर कहा‒“प्रेम बाबू ! इस दुनिया में हर अपराध, हर पाप का दंड इसी धरती पर मिल जाता है। अगर दण्ड के लिए परलोक ही नियत होता तो आदमी को स्वर्ग और नर्क का अन्तर मालूम ही न होता।”

प्रेमप्रताप ने भर्राई हुई आवाज में कहा‒“शायद तुम ठीक कह रहे हो।”

“इसलिए दीपा को अपने अपराधों का दण्ड ही समझकर स्वीकार कर लीजिए। मेरा विश्वास है कि वह आपका जीवन स्वर्ग बना देगी। अगर आपको अपने पापों का पछतावा है तो उसका सिर्फ एक यही रास्ता है और आप अपने डैैडी को भी इसी तरह दण्ड दे सकते हैं।”

प्रेमप्रताप ने ठंडी सांस ली और बोला‒“सच कहते हैं आप। मैं ऐसा ही करूंगा। मगर तुम दीपा को कैसे जानते हो ?”

“जैसे एक भाई, बहन को जानता है।”

“क्या मतलब ?”

“दीपा को मैंने मन्दिर की सीढ़ियों पर पंडितजी से उलझते देखा था। अगर मैं उसे न रोकता तो वह अपनी बिरादरी वालों को बुलाने जा रही थी मन्दिर में प्रवेश करने के लिए।”

“ओहो…”

“मैंने उसे समझाया था कि तुम बिरादरी वालों को बुलाकर लाओगी तो हंगामा होगा। सवर्णों और शूद्रों का टकराव होगा और कानून और पुलिस हमेशा ऊंची जाति-वालों का ही साथ देती है।

“उस टकराव में मारे जाने वाले निर्दोष ही होंगे, चाहे वे सवर्णों के हों, चाहे शूद्रों के, क्योंकि लड़ने वाले अलग होते हैं और लड़ाने वाले अलग।”

पप्पी ने उसे हैरत से देखा और बोला‒“तुम तो बड़ी समझदारी की बातें करते हो। आखिर तुम कांस्टेबल ही क्यों बने थे ?”

अमर ने ठंडी सांस ली और बोला‒“सिर्फ इसलिए कि मेरे पीछे कोई सेठ जगताप या कोई नेता चौहान नहीं था। मैं साइंस का ग्रेजुएट हूं।”

“ओह…!”

“अब मैं तुमसे सगाई के बाद ही मुलाकात करूंगा, क्योंकि तुम्हें अपने दोस्त के खून का ही नहीं, अपने पिछले अपराधों का भी प्रायश्चित करना है। एक नौजवान होने के नाते देश के प्रति अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए उन बूढ़े गिद्धों के विरुद्ध लड़ाई भी लड़नी है, जो तुम जैसे नौजवानों को मोहरे बनाकर अपनी कुर्सियां बचाते हैं।”

प्रेमप्रताप कुछ न बोला। उसके होंठ सख्ती से भिंचे हुए थे।

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