जमना, सरस्वती और इन्दुमति डबडबाई हुई आँखों से झाँकती हुई देख रही थी कि प्रभाकर सिंह हथकड़ी-बेड़ी से मजबूर पेड़ के साथ बँधे हुए हैं और दारोगा नंगी तलवार लिए उनके सामने खड़ा है, अब दारोगा और प्रभाकर सिंह में कुछ बातें होने लगी जो कि उन दोनों की आकृति और हाव-भाव के मालूम होता था मगर दूर होने के कारण उनके शब्द जमना, सरस्वती और इन्दुमति की सुनाई नहीं देते थे, फिर कुछ देर बाद मालूम हुआ कि दारोगा उन्हें किसी काम के लिए मजबूर किया चाहता है मगर प्रभाकर सिंह लापरवाही के साथ इनकार कर रहे हैं और दारोगा की धमकियों तथा क्रोध में आकर उसके दाँत पीसने पर कुछ भी खयाल नहीं करते।
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इसी समय इन्दुमति की निगाह एक मौलसिरी (मालश्री) के पेड़ के नीचे पड़ी जो बहुत ही बड़ा और छतनार था, तथा ऊपर मालती की लता चढ़े रहने के कारण जिसकी अवस्था घने कुंज की-सी हो रही थी, वह पेड़ वहाँ से थोड़ी दूर पर था जहाँ दारोगा खड़ा प्रभाकर सिंह से बातें कर रहा था।
इन्दु ने देखा कि उस कुँज के अन्दर से के नकाबपोश झाँककर दारोगा और प्रभाकर सिंह की तरफ देख रहा है। इन्दु ने जमना और सरस्वती को उसी तरफ देखने का इशारा किया और वे भी बड़े गौर से उस नकाबपोश की तरफ देखने लगीं जिसका बदन धीरे-धीरे पत्तों के झुरमुट में से बाहर निकलता आ रहा था, यहाँ तक कि अब उसका आधा बदन और दाहिना हाथ जिसमें नंगी तलवार थी, नजरों के सामने आ चुका था।
मौत के पंजे में फंसे हुए बेचारे प्रभाकर सिंह की अवस्था की तरफ से ध्यान हटाकर उन नकाबपोश की तरफ देखने का कारण है। इन्दुमति की और साथ ही उसके जमना, सरस्वती को भी विश्वास हो गया कि यह नकाबपोश जो पत्तों की आड़ में से ताक-झाँक कर रहा है जरूर दारोगा का दुश्मन है और प्रभाकर सिंह की मदद के लिए आया है। वास्तव में बात भी ऐसी ही थी। जिस समय अपनी बात न मानने के कारण झुंझलाकर दारोगा ने प्रभाकर सिंह को मारने के लिए तलवार वाला हाथ उठाया उसी समय वह नकाबपोश जो दूर न था दारोगा पर झपट पड़ा और उसके पीछे पहुँचकर उसने दारोगा का तलवार वाला उठा हुआ हाथ पकड़ लिया। दारोगा ने घबड़ाकर पीछे की तरफ देखा मगर चेहरे पर नकाब पड़े रहने के कारण इसे पहिचान न सका। झटका देकर हाथ छुड़ाना और घूम जाना चाहा मगर ऐसा भी न कर सका। मालूम होता था कि किसी फौलादी पंजे ने उसकी कलाई पकड़ ली है। कुछ देर तक दोनों की हालत एक तस्वीर की-सी बनी रही और इसके बाद नकाबपोश ने डपटकर दारोगा से कहा, “क्यों बे कमबख्त बेईमान, यहाँ के सीधे-सादे राजा ने क्या इसीलिए तुझे इतना अधिकार दे रखा है कि तू अपने स्वार्थ के लिए अंधा होकर उनके रिश्तेदारों और गरीबों पर हद दर्जे का जुल्म करे और उनकी जान तक ले लेना खिलवाड़ समझे? अफसोस, उस बेचारे सीधे राजा को तेरी करतूतों की कुछ भी खबर नहीं है! वह तेरी खुशामद से अन्धा हो रहा है और नहीं जानता कि एक दिन तू इसी तरह उसके ऊपर भी बेईमानी और नमकहरामी का हाथ साफ करेगा, बल्कि यों कहना चाहिए कि एक दिन तू उसे और उसके खानदान को मिट्टी में मिला देगा और स्वयं राजा बन बैठेगा। (कुछ रुक कर और दारोगा की तरफ कड़ी निगाह से घूर कर) नहीं-नहीं, मैं तुझे ऐसा न करने दूँगा। (दारोगा का हाथ झटककर और उसे एक लात मार कर) तुफ्र है तेरी औकात पर, निस्सन्देह तेरी पैदाइश में फर्क है और अवश्य तू हरामी का पिल्ला है।”
इस आदमी के चेहरे पर यद्यपि नकाब पड़ी हुई थी मगर सिर्फ आवाज ही सुनकर दारोगा ने इसे पहिचान लिया और डर तथा ताज्जुब की निगाहों से इसको देखने लगा। उधर खिड़की से झाँकती हुई जमना, सरस्वती और इन्दुमति ने भी पहिचान लिया कि यही बहादुर हमारा तिलिस्मी मददगार नारायण है।
नारायण की डपट और बातों ने दारोगा का कलेजा हिला दिया। डर के मारे उसका दिल बेतरह उछलने लगा क्योंकि उसके खयाल ने नारायण ने नहीं बल्कि यमराज ने अपने पंजे में उसे दबा लिया था, उसमें इतनी ताकत न रह गई थी कि नारायण की बातों का जवाब देता या उसका मुकाबला करता और अगर ताकत होती भी तो उसके हाथ नारायण से मुकाबला करने के लिए तैयार न होते।
यहाँ पर हम अपने पाठकों को इस नारायण का कुछ परिचय दे देना उचित समझते हैं।
हमारे पाठक जमानिया के राजा गोपालसिंह को बखूबी जानते हैं तथा इन्दिरा के बयान में उनके पिता राजा गिरधरसिंह का भी कुछ जिक्र सुन चुके हैं। इस समय वही राजा गिरधरसिंह जमानिया का राज्य कर रहे हैं और यह कम्बख्त तिलिस्मी दारोगा उन्हीं का प्यारा मुसाहब है, तथा यह नकाबपोश जिसे हम नारायण के नाम से संबोधन कर चुके हैं राजा गिरधरसिंह के छोटे भाई शंकरसिंह हैं।
राजा गिरधरसिंह बिलकुल ही सीधे-सादे और सरल स्वभाव के आदमी हैं। छल-प्रपंच को यह लेश मात्र भी नहीं जानते तथा राज-काज के मामलों और बारीकियों को भी वे अच्छी तरह नहीं समझ सकते, परन्तु उनके छोटे भाई शंकरसिंह बड़े बुद्धिमान, तेज, समझदार और बहादुर आदमी हैं। हिम्मत, उत्साह और जवाँमर्दी इनके रग-रग में भरी हुई है तथा दुष्टों को सजा देने और सज्जनों को प्रसन्न करने में भी वैसे ही दत्तचित्त रहते हैं जैसा कि राजा लोगों का धर्म है। उनकी रिआया का कथन है कि यदि शंकरसिंह जी हमारे जमानिया के राजा हुए होते तो बहुत ही अच्छा था परन्तु नियमानुसार बड़े भाई होने के कारण गिरधरसिंह जी ही जमानिया के राजा हुआ और वहाँ की प्रजा बल्कि स्वयं राजा गिरधरसिंह की इच्छा होने पर भी शंकरसिंह ने धर्म-विरुद्ध कार्य करना और बड़े भाई के रहते राजा बनना स्वीकार नहीं किया। फिर भी राजा हो जाने पर भी गिरधरसिंह अपने छोटे भाई शंकरसिंह की इज्जत करते हैं और एक तौर पर इनसे दबते ही रहते हैं तथा तिलिस्मी मामलों में भी ज्यादा जानकारी शंकरसिंह ही को है।
वह तिलिस्मी दारोगा जिसका असल नाम यदुनाथ शर्मा था इस राज्य के गुरु तथा पुरोहित खानदान का लड़का था अर्थात् इसके बुजुर्ग लोग राजा साहब के बुजुर्गों के गुरु और पुरोहित होते आये हैं और सदैव से इन लोगों को मुसाहिब की इज्जत मिलती आई है। आज भी उसी पुराने संबंध से राजा गिरधरसिंह इसे मानते और इसकी इज्जत करते है।
मगर इस दारोगा के बुजुर्ग लोग चाहे जैसे भी ने और ईमानदार होते आए हों फिर भी यह बड़ी ही दुष्ट प्रकृति का आदमी है। लालच, बेईमानी, नमकहरामी, बदमाशी, ऐयाशी और दगाबाजी का तो इसे पुतला ही समझना चाहिए, मगर वह अपने भेद और भाव को ऐसा छिपाए और बनाए रहता है कि किसी को इसके ऊपर बदगुमान होने का जरा भी मौका नहीं मिलता। अपनी चापलूसियों से यह राजा गिरधरसिंह को अपना आशिक बनाए हुए था मगर शंकरसिंह इस पर विश्वास नहीं करते और हमेशा इसके भेदों की खोज में लगे रहते हैं, और इसी तरह दारोगा भी इनसे हमेशा चौकन्ना बना रहता है। शंकरसिंह को किसी तरह इस बात का भी पता लग गया था कि दारोगा ने कोई गुप्त कमेटी बनाई हुई है। जिसके सभासद लोग इसी शहर के रहने वाले तथा इसी दरबार के बड़े-बड़े ओहदेदार लोग हैं। यद्यपि उसका ठीक-ठीक पता शंकरसिंह को अभी तक मालूम नहीं हुआ था, तथापि उन्होंने अपने बड़े भाई राजा साहब से इसका जिक्र कर दिया था जिस पर उन्होंने यह कह कर बात टाल दी थी कि यह खबर बेबुनियाद है, हमारा दारोगा ऐसा बेईमान नहीं है बल्कि जती और सती महात्मा आदमी हैं।
शंकरसिंह की तरह दारोगा भी इनसे चौकन्ना बना रहता और इनको अपना जानी दुश्मन समझता हुआ बराबर इस बात की धुन में लगा रहता था कि किसी तरह इन्हें इस दुनिया से उठा दिया जाय, मगर बात यह थी कि जमानिया के सभी आदमी बल्कि दारोगा वाली गुप्त कमेटी के मेंबर लोग भी शंकरसिंह को दिल से प्यार करते थे और इसलिए बेईमान दारोगा की इच्छा पूरी नहीं होती थी।
अब हम अपने किस्से की तरफ झुकते हैं।
शंकरसिंह ने दारोगा को कई कदम पीछे हटाकर उसका हाथ छोड़ दिया और कहा, “दारोगा साहब, यह तो बताइए कि इन बेचारे प्रभाकर सिंह ने आपका क्या बिगाड़ा है जो इनकी जान लेने के लिए तैयार हो रहे हैं?”
दारोगा ने तलवार जमीन पर फेंक दी और हाथ जोड़कर शंकरसिंह के सामने खड़ा होकर बोला, “यद्यपि आपके चेहरे पर नकाब पड़ी हुई है मगर मैं आपको पहिचान गया, मेरा दिल गवाही देता है कि आप मेरे मालिक भैया राजा हैं। अगर मेरा विचार ठीक है तो कृपा करके चेहरे पर से नकाब हटा दीजिए जिसमें मेरी दिलजमयी हो जाय और मैं जी खोल कर जो कुछ कहना है कहूँ, मेरी बातें सुनने के बाद आप मेरे विषय में फैसला करें।”
शंकरसिंह : (नकाब उलट कर) लो मुझे अच्छी तरह पहिचान लो कि मैं कौन हूँ। मैं तुम्हारी सभी बातें सुनने के लिए भी तैयार हूँ मगर पहिले उस बात का जवाब दो मैं कुछ पूछ चुका हूँ अर्थात् प्रभाकर सिंह ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो उन्हें कत्ल किया चाहते थे?
दारोगा : (हाथ जोड़े हुए) प्रभाकर सिंह ने मेरा तो कुछ नहीं बिगाड़ा है मगर हमारे महाराज के साथ और इस राज्य के साथ उन्होंने बहुत बुरा बर्ताव किया है। आपको कदाचित् मालूम नहीं है कि जमानिया तिलिस्म के अन्दर घुसकर इन्होंने बहुत उपद्रव मचाया और बहुत कुछ नियम-विरुद्ध काम किया है, जिसकी सजा ही यह है कि ये कत्ल किये जाएँ। आप खूब जानते हैं कि तिलिस्मी नियम कैसे कड़े हैं।
शंकरसिंह : तिलिस्मी नियमों को जो मैं जानता हूँ वह तुम क्या तुम्हारे बाप भी नहीं जानते होंगे और प्रभाकर सिंह ने तिलिस्म के अन्दर जो कुछ खराबी की है उसे भी मैं खूब जानता हूँ। यह कोई भी नहीं कह सकता कि प्रभाकर सिंह किसी बदनीयती से या अपने किसी फायदे के लिए तिलिस्म के अन्दर आए हों। वास्तव में उन्हें तिलिस्म के अन्दर लाने वाला या लाने का कारण भूतनाथ ही है जो तुम्हारा दोस्त है और जिसकी प्रसन्नता के लिए इस समय तुम अनुचित-से-अनुचित कार्य करने के लिए तैयार हो गये हो। अगर जमना, सरस्वती और इन्दुमति को भूतनाथ धोखा देकर तिलिस्म में फंसा न देता तो प्रभाकर सिंह भी कदापि तिलिस्म के अन्दर न आते। कहो इसके विपरीत कोई बात साबित करने के लिए तुम्हारे पास क्या मसाला है?
दारोगा : आप बड़े हैं और मालिक हैं, मैं आपका गुलाम हूँ, अतएव मुझे उचित नहीं कि मैं आपसे बहस करूँ। मुझे इस बात की कुछ भी खबर नहीं है कि प्रभाकर सिंह इस तिलिस्म के अन्दर क्यों आए? मुझे तो इस बात की खबर लगी कि प्रभाकर सिंह कई औरतों को साथ लेकर तिलिस्म के अन्दर विचर रहे हैं अस्तु मैंने अपने मालिक की भलाई सोच कर इन्हें गिरफ्तार कर लिया…
शंकरसिंह : (बात काट कर) भला यह भी कोई समझाने की बात है? तुम्हें इनके विषय में क्यों कर खबर लगी? क्या तुम्हारे जासूस तिलिस्म के अन्दर घूमा करते हैं? या तिलिस्म का कोई खास शैतान तुम्हें रोज-रोज की खबर सुना जाता है ? या खुद तुम ही नियमित रूप से रोज तिलिस्म के अन्दर घूम-घूम कर उसके दरोदीवार तथा पेड़-पत्तों की खबरदारी किया करते हो और ऐसा करने के लिए महाराज ने तुम्हें ताकीद की है?
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दारोगा : (कुछ लाजवाब-सा होकर) मैं तो पहिले ही कह चुका हूँ कि आपसे बहस करने की मेरी नीयत नहीं है। और न ऐसा करना मेरे लिए उचित ही है।
शंकरसिंह : यह कोई बहस की बात नहीं है। मैं तो सिफ इतना तुमसे पूछता हूँ कि इनके विषय में तुम्हें किसने खबर दी और किसने कहा कि प्रभाकर सिंह तिलिस्म के अन्दर ऊधम मचा रहे हैं।
दारोगा : (कुछ घबड़ाना-सा होकर) जी ई…ई…ई…मुझे कुछ यों-ही-सा खुटका हो गया, और मैं…
शंकरसिंह : (रोककर) बस बस, खबरदार, झूठ बोलना तुम्हारे हक में अच्छा न होगा, तुम ठीक-ठीक जवाब देने के लिए तैयार हो जाओ! (प्रभाकर सिंह की तरफ देखकर) अच्छा कृपा कर आप ही कह जाइए कि इसके फंदे में आप क्यों कर फँस गये?
मगर प्रभाकर सिंह ने इस बात का कुछ भी जवाब न दिया जिस पर शंकरसिंह ने फिर पूछा, “आप मेरी बातों का जवाब क्यों नहीं देते (कुछ आगे बढ़ कर) आपका चुप रहना मुझे ताज्जुब में डालता है। (और आगे बढ़ कर और उनके चेहरे की तरफ गौर से देखकर) क्या आपके चुप रहने की कोई खास वजह है? है यह क्या? आपका शरीर काँपता क्यों है? बस ठीक-ठीक बता! मैं समझ गया, ओ बेईमान, तू कभी प्रभाकर सिंह नहीं है, सच बता तू कौन है? अच्छा मैं तेरे हाथ-पैर खोल देता हूँ!”
इतना कहकर शंकरसिंह ने नकली प्रभाकर सिंह के हाथ-पैर खोल दिये और कहा, “ले अब ठीक-ठीक बोल कि तू कौन है और प्रभाकर सिंह की सूरत बनाने की तुझे क्या जरूरत पड़ी? यह क्या, तू दारोगा की तरफ क्यों देखते हैं? क्या इशारे ही इशारे में उससे सलाह करना चाहता है ? खबरदार, जल्द बोल तू कौन है!”
जब शंकरसिंह ने देखा कि नकली प्रभाकर सिंह उनकी बातों का कुछ जवाब नहीं देते तब उन्होंने पीछे की तरफ घूमकर देखा और जोर से चार दफे सीटी बजाई, सीटी की आवाज के साथ ही चार आदमी उसी झाड़ी के अन्दर से निकलकर शंकरसिंह के पास चले आये जिसमें से स्वयं शंकरसिंह प्रकट हुए थे। शंकरसिंह की आज्ञा पा दो आदमी तो खड़े हो गये, एक आदमी नकली प्रभाकर सिंह के पास जा खड़ा हुआ, और एक आदमी पानी लेने के लिए कहीं चला गया जो बात-की-बात में पानी से भरी हुई गगरी लेकर वहाँ मौजूद हुआ।
शंकरसिंह ने अज्ञा दी कि नकली प्रभाकर सिंह का चेहरा पानी से साफ किया जाय। उसी समय उसका चेहरा साफ किया गया और असली सूरत पर निगाह पड़ते ही आश्चर्य में आकर शंकरसिंह बोल उठे, “अख्खाह! आप जैपाल सिंह सिंह हैं!!”
शंकरसिंह : (दारोगा की तरफ देखकर) जब अपने दोस्त जैपाल को तूने प्रभाकर सिंह बना रखा है तो इसमें कोई खास बात जरूर है और निश्चय है कि तेरा तलवार का हाथ उठाना इसे मारने के लिए न था बल्कि किसी को धोखा देने के लिए था। (कुछ सोचकर और इधर-उधर देखकर) तुम जिसको धोखा दे रहे थे वह जरूर कहीं पास ही में होगा।
ऊपर की दरीची में से जमना, सरस्वती और इन्दुमति बड़ी दिलचस्पी के साथ यह तमाशा देख रही थीं, इस बात का पता लग जाने पर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई कि प्रभाकर सिंह वास्तव में प्रभाकर सिंह न थे बल्कि दारोगा का कोई दोस्त था और हम लोगों को धोखे में डालने के लिए यह ढंग रचा गया था अस्तु उन्होंने जब शंकरसिंह को किसी खोज में चारों तरफ निगाहें दौड़ाते देखा तो जमना ने हाथ उठाया। उसी समय शंकरसिंह की भी निगाह उन तीनों पर जा पड़ी, उन्होंने बड़ी खुशी के साथ अपना हाथ उठाकर जवाब दिया और तब यह भी कहा, “घबड़ाना नहीं, अब मैं आ पहुँचा हूँ।”
इसके बाद शंकरसिंह ने पुन: दारोगा की तरफ देखकर कहा, “देखते हो उस (ऊपर की तरफ हाथ का इशारा करके) दरीची में से कौन झाँक रहा है? भला इन तीनों औरतों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? तुम साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि यह सब कार्रवाई केवल गदाधरसिंह की मदद के लिए की गई है! बोलो वास्तव में यही बात है या नहीं?”
दारोगा ने शंकरसिंह की बात का कुछ भी जवाब न दिया और सिर नीचा करके जमीन की तरफ देखने लगा। शंकरसिंह ने क्षणमात्र तक कुछ विचार किया और इसके बाद पुन: दारोगा से कहा, “अच्छा मैं इस समय तुम दोनों को छोड़ देता हूँ, इस मामले का फैसला भाई साहब (महाराज) के सामने ही किया जाएगा, और इस समय तुम मुझे अपने साथ जमना, सरस्वती और इन्दुमति के पास ले चलो जो उस दरीची में से झाँक कर तुम्हारी बेईमानी का तमाशा देख रही हैं।”
“चलिए मैं आपको ले चलता हूँ” कहकर दारोगा मकान की तरफ रवाना हुआ। शंकरसिंह उसके साथ-साथ चलने लगे।
वह दारोगा का मकान कुछ अजीब ढंग का बना हुआ था, देखने वाला यही कहेगा कि इस मकान का भी किसी तिलिस्म से संबंध है मगर ऐसी बात न थी। दारोगा ने सिर्फ अपनी ही कारीगरी और बुद्धिमानी से इस मकान को तैयार कराया था। इस मकान में कई दालान, कई कमरे, कई कोठरियाँ, कई तहखाने और कई सुरंगें बनी हुई थीं। एक-एक कमरे और कोठरी में जाने के लिए कई रास्ते थे। किसी अनजान आदमी को यदि अकेले उस मकान में छोड़ दिया जाए तो वह घूमता-ही-घूमता परेशान हो जाय और घबड़ा जाय तथा उसे बाहर निकलने के लिए रास्ते का पता न लगे। शंकरसिंह को आज से पहिले इस मकान में आने का कभी इत्तिफाक न पड़ा था, अस्तु वे इस मकान की कैफियत को देखकर आश्चर्य करने लगे। जैसे-जैसे दारोगा उन्हें कोठरियों, कमरों और दालानों में घुमता था तैसे-तैसे उन्हें उसकी चालबाजी और बदनीयती का खयाल बढ़ता जाता था। दारोगा यह नहीं चाहता था कि शंकरसिंह को जमना, सरस्वती और इन्दुमति के सामने ले जाय और इसीलिए वह उन्हें अंदाज से ज्यादा घुमता और चक्कर दिलाता हुआ धीरे-धीरे ऊपर की तरफ लिए जा रहा था!
इसी तरह घूमते-फिरते वे एक ऐसे दरवाजे के पास पहुँचे जिसमें बहुत बड़ा ताला लगा हुआ था और उसी की बगल में एक और भी छोटा-सा दरवाजा था जिसके दोनों पल्ले खुले हुए थे। वहाँ पर दारोगा रुक गया और उसने शंकरसिंह की तरफ देखकर कहा, “जरा-सा आप यहाँ पर खड़े रहने की तकलीफ गँवारा कीजिए तो मैं जाकर इस दरवाजे को खोलने के लिए ताली ले आऊँ क्योंकि वे तीनों औरतें इसी के अन्दर हैं।”
इसके जवाब में शंकरसिंह न मालूम क्या सोच कर कुछ देर तक तो दारोगा का मुँह देखते रहे और तब बोले, “खैर कोई चिंता नहीं आप जाइए और ताली लेकर जल्द आइए।”
दारोगा फुरती के साथ उस दूसरे छोटे दरवाजे के अन्दर घुस गया और शंकरसिंह वहाँ खड़े रहकर उसके आने का इंतजार करने लगे। ज्यों-ज्यों दारोगा के आने में देर होती थी त्यों-त्यों शंकरसिंह का क्रोध बढ़ता जाता था और इस बात का भी शक हो रहा था कि वह हमें धोखा देकर यहाँ से निकल भागा।

घंटे-भर तक शंकरसिंह चुपचाप वहाँ खड़े रह गए और दारोगा लौट कर नहीं आया अंत में वे बहुत झुँझलाए और वहाँ से दारोगा की खोज में चल खड़े हुए। जिस छोटे दरवाजे के अंदर दारोगा घुस गया था उसी दरवाजे के अन्दर शंकरसिंह भी चले गये मगर आने-जाने के लिए उन्हें कोई रास्ता नहीं मिला क्योंकि उस दरवाजे के अंदर घुसने के बाद वे एक ऐसी कोठरी में पहुँचे जिसके दोनों बगल और भी दरवाजे थे मगर वैसे भी इस समय बंद थे। शंकरसिंह झुंझलाते हुए कोठरी में से बाहर निकले और मकान के बाहर हो जाने के लिए उद्योग करने लगे।
मगर वास्तव में यह मकान भूलभुलैया था। शंकरसिंह को घूमते हुए कई घंटे बीत गये, यहाँ तक कि सूर्य भगवान अस्ताचल की तरफ चले गए और उस मकान के अन्दर अंधकार ने धीरे-धीरे अपना दखल जमाना शुरू कर दिया।
घूमते-फिरते उन्हें कई बंद दरवाजे भी मिले जिन्हें देखकर उन्होंने समझा कि यह दारोगा की शैतानी है, भागते समय उसने उन दरवाजों को बंद कर दिया जिनके जरिए से बाहर हो जाने की उम्मीद हो सकती थी अस्तु उन्होंने पुन: घूमना आरम्भ किया मगर जब कोठरियों और कमरों में पूरा अंधकार छा गया तब लाचार होकर एक ठिकाने बैठ गए और चिंता करने लगे कि अब क्या करना चाहिए।

