Bollywood: ‘धैर्य, दृढ़ता, और पसीना सफलता के लिए एक अपराजेय मिश्रण हैं।’ यह मात्र चंद शब्दों में पिरोए वर्णमाला ही नहीं बल्कि इसको असल जिन्दगी में कुछ बॉलीवुड एक्टर ने साबित करके भी दिखाया है। लगातर मिलती असफलता के बावजूद भी वे खुद को हर बार तराशते रहे और आखिर में जिंदगी ने उन्हें एक नायाब हीरे की तरह पेश ही कर दिया। इसी संदर्भ में कबीर दास का एक दोहा प्रचलित है- “धीरे धीरे रे मना, धीरे सबकुछ होय, माली सीचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होय!”
फिल्मी दुनिया में खुद की पहचान बनाना और पहचान को बरकरार रखना टेढ़ी खीर है। ये वो समुंदर है जहां बेहतर से बेहतर नाव तक डूब जाती हैं। वक्त के साथ खुद को संभाले रहना और निरंतर प्रयास करना ही सफलता की चाभी है। सब्र का फल मीठा होता है यह महज एक कवाहत ही नहीं बल्कि इसका असल जिंदगी में भी बड़ा उदाहरण हमारे बॉलीवुड एक्टर ने सिद्ध करके दिखाया है। हमारे बॉलीवुड के कुछ कलाकारों ने सफलता की एक नई परिभाषा पेश की है।
Bollywood:पियूष मिश्रा-
लेखक गायक, संगीतकार के तौर पर मशहूर पियूष मिश्रा में हुनर की कमी नहीं है। बेशक पियूष एक अच्छे कलाकार हैं पर इनको बॉलीवुड में सफलता मिलने में वक्त लग गया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 1988 में टीवी सीरियल ‘भारत एक खोज’ से शुरुआत की थी। मगर उन्हें काफ़ी टाइम तक पहचान नहीं मिली। साल 2009 में गुलाल फ़िल्म में उनके काम को सराहना मिली और 2012 में आई ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर‘ ने उन्हें काफ़ी प्रसिद्धि मिली। आपको बता दूं कि पीयूष की गैग्स ऑफ़ वासेपुर के दौरान उनकी उम्र 50 के क़रीब थी।
कुमुद मिश्रा-
फिल्मों की चकाचौंध में आने से पहले ही कुमुद थियेटर आर्टिस्ट रहे हैं। उन्होंने बॉलीवुड में अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत 1996 में श्याम बेनेगल की फ़िल्म ‘सरदारी बेग़म’ से की थी। इस फ़िल्म में ओम पुरी और किरन खेर जैसे दिग्गज कलाकारों के होने के चलते उन्हें ज़्यादा पहचान नहीं मिल पायी, लेकिन लम्बे उतार चढ़ाव के बाद उन्हें असली पहचान साल 2011 में आई रणबीर कपूर की फ़िल्म ‘रॉकस्टार’ में ख़टाना भाई के किरदार से मिली। खटानाभाई के किरदार ने कुमुद की किस्मत ही बदल दी। आज कुमुद बॉलीवुड की हर बड़ी फ़िल्म में दिखाई देते हैं। जिन्दगी में समय के पहले कुछ नहीं मिलता है आपको बता दें, जिस वक़्त रॉकस्टार रिलीज़ हुई थी, उस समय कुमुद की उम्र क़रीब 41 वर्ष थी।
अमरीश पुरी-
मोगैंबो खुश हुआ! जैसे फेमस डायलॉग आज बच्चे-बच्चे की जुबान पर रहता है। पर क्या आपको पता है अपने समय के सबसे बड़े विलेन अमरीश पुरी फिल्मों से पहले राज्य बीमा निगम में नौकरी किया करते थे। वह शुरुआत से थियेटर से जुड़े थे, मगर बॉलीवुड में काम नहीं किया। साल 1970 में देवानंद और वहीदा रहमान की फ़िल्म ‘प्रेम पुजारी’ में उन्होंने पहली बार काम किया, तब उनकी उम्र 40 साल से ज़्यादा थी। उसके बाद 1971 में आई फिल्म रेशमा और शेरा में उन्होंने काम किया। यहां तक कि 1984 में हॉलीवुड के मशहूर निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग की फ़िल्म ‘इंडियाना जोंस‘ में जबरदस्त भूमिका निभाई। मगर 1987 में शेखर कपूर की फ़िल्म ‘मिस्टर इंडिया‘ में उनके किरदार मोगैंबो से बॉलीवुड के सबसे बड़े विलन बन गए।
नीना गुप्ता-
माया नागरी मुंंबई में हर किसी की किस्मत चमक नही पाती है उनमें से एक हैं नीना गुप्ता। ये साल 1981 से इंडस्ट्री में एक्टिव हैं। उन्हें ‘वो छोकरी‘ (1994) में एक युवा विधवा की भूमिका निभाने के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था। लेकिन, इसके बाद भी न तो उन्हें पहचान मिली और न ही कोई ढंग का रोल। कहते हैं देर आए दुरुस्त आए उसी तरह साल 2018 में उनकी क़िस्मत बदल गई। ‘बधाई हो’ फ़िल्म ने उन्हें ग़ज़ब की पॉपुलैरटी दिलाई। उस वक़्त वो क़रीब 59 साल की थीं। अब उन्हें अच्छे रोल्स भी ऑफ़र हो रहे हैं और वो लगातार बड़ी-बड़ी फ़िल्मों का हिस्सा भी बन रही हैं।
रोनित रॉय-
बॉलीवुड में हर किसी का सिक्का जम ही जाय ऐसा तो बड़ा मुश्किल है। समय कभी आपका होता है कभी नही पर समय के साथ आगे लगातर लगे रहने से ही सफलता मिलती है। इसका एक बड़ा उदहारण हैं रोनित रॉय। रोनित की पहली फ़िल्म ‘जान तेरे नाम’ साल 1999 में रिलीज़ हुई। फ़िल्म सुपरहिट थी, लेकिन फिर भी रोनित रॉय वो स्टारडम न पा सके, जिसकी उन्हें ज़रूरत थी। उन्हें काफ़ी साल कोई काम नहीं मिला। काम न मिलने के बाद रोनित रॉय ने 2000 में टीवी की ओर रुख़ किया। टेलीविज़न ने भरपूर पहचान दी और छोटे पर्दे का लोकप्रिय स्टार बना दिया। बावजूद इसके बॉलीवुड में उन्हें सफ़लता साल 2010 में ‘उड़ान’ फिल्म से मिली। उस वक़्त उनकी उम्र 40 साल से ज़्यादा थी। उसके बाद से वो लगातार फ़िल्मों में नज़र आ रहे हैं।
नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी-
स्ट्रगल और मेहनत का नाम है फिल्म इंड्रस्टी। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने बरसों बॉलीवुड में काम करने के लिए स्ट्रगल किया है। वो पहले साल 1999 में आई आमिर खान की फ़िल्म ‘सरफ़रोश’ में नज़र आए थे। इसमें भी उनका महज़ मिनट भर का ही रोल था। उसके बाद वो ऐसे ही न नज़र आने वाले रोल ही कर पाए। मगर साल 2012 में आई ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया। जिस वक्त उनको फिल्मी जगत में पहचान मिली, उस वक़्त वो क़रीब 38 साल के हो चुके थे।
पंकज त्रिपाठी-
अपने खास अंदाज और बेहतर कलाकारी के चलते आज पंकज त्रिपाठी को कौन नहीं जानता है। रन, अपहरण, ओमकारा और रावण जैसी फ़िल्मों में कैमियो करने के बाद, अनुराग कश्यप की गैंग्स ऑफ़ वासेपुर ने पंकज त्रिपाठी को भी एक बड़ी पहचान दिलाई। सुल्तान के रोल में उन्होंने दर्शकों का दिल जीत लिया। फ़िल्म रिलीज़ के वक़्त उनकी उम्र भी क़रीब 36 साल की थी। आज तो उन्हें कालीन भइया के नाम से बच्चा-बच्चा जानता है।
बोमन ईरानी- अपनी दमदार एक्टिंग और और खास अंदाज के साथ बॉलीवुड में कदम रखने वाले काफी उम्रदार व्यक्ति बोमन ईरानी थे। इन्होंने फ़िल्मों में काफ़ी लेट एंट्री की और आते ही छा भी गए। उन्होंने राजू हिरानी की मुन्ना भाई एमबीबीएस के साथ 44 साल की उम्र में बॉलीवुड में अपनी शुरुआत की और तब से पीछे मुड़कर नहीं देखा। फिर क्या उसके बाद एक से बढ़कर एक हिट्स देते गए और बॉलिवुड में अपने पैर जमा लिया। मैं हू न से लेकर थ्री इडियट्स तक वो हर रोल में कमाल करते हैं, आज वो लोगों के मोस्ट फ़ेवरेट एक्टर्स के तौर पर दिलो में राज करते हैं।
संजय मिश्रा-
कभी-कभी व्यक्ति अपने मन का काम न मिल पाने की वजह से इस इंड्रस्टी को छोड़ देता है पर कुछ लोग अपनी ज़िद में लगे रहते हैं। ऐसे ही उनमें से एक संजय मिश्रा है, जो काफ़ी वक़्त से बॉलीवुड में छोटे-मोटे रोल करते आ रहे हैं, उन्हें हर रोल में पसंद भी किया गया। फिर भी सही वक्त न रहने के चलते वो कोई बड़ा नाम नहीं बना पाए, हालांकि, ऑल द बेस्ट में उनकी कॉमेडी ने उन्हें काफ़ी पॉपुलर बना दिया। इससे पहले मोस्ट कॉमेडी फिल्म धमाल में भी उनके क़िरदार को काफ़ी पसंद किया गया था। लेकिन ये भी उन्ही अभिनेताओं की श्रेणी में आते है जिनकी सफलता उनकी खास उम्र के बाद मिली। संजय की ये सभी फ़िल्में तब आईं, जब संजय की उम्र 40 साल से ज़्यादा हो चुकी थी। फ़िल्म आंखों देखी ने तो संजय को काफ़ी बड़ा एक्टर बना दिया, अब वो हर कॉमेडी फ़िल्म में खास पहचान के तौर पर नज़र आते हैं।
किरण खेर-
आज फेमस इंडिया गॉट टैलेंट की जज और बॉलिवुड अदाकारा किरण खेर किसी पहचान की मोहताज नही है लेकीन शायद ही कोई जानता हो कि किरण खेर ने अपने करियर की शुरुआत 1980 के दशक में की थी। शादी के बाद अपने परिवार और बच्चों की परवरिश की ज़िम्मेदारी को महत्त्व देते हुए उन्होंने फ़िल्मी करियर छोड़ दिया था। बाद में उन्होंने श्याम बेनेगल की सरदारी बेगम के साथ वापसी की। 1997 में किरण खेर को इस फ़िल्म के लिए नेशनल फिल्म समारोह में स्पेशल ज्यूरी अवार्ड दिया गया। इसके बाद 2000 में बारीवाली के लिए उन्हे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हुआ इन सब के बावजूद भी, उन्हें दर्शकों के बीच पहचान संजय लीला भंसाली की देवदास से मिली। साल 2002 में आई इस फ़िल्म में उन्होंने सुमित्रा(पारो की मां) का रोल निभाया था। ये भी उस वक्त पहचान हासिल कर पाई जब इनकी उम्र क़रीब 50 साल की थी।
