Yagya Niyam: विशेष यज्ञ के लिये यजमान तथा आचार्य ब्रह्मï आदि को एक सप्ताह पूर्व से ही ब्रह्मïचर्य से रहना आरम्भ कर देना चाहिए।
यज्ञ के दिनों उपवास पूर्वक फल, दूध, अथवा हविष्यान्न लेकर रहें ।
यज्ञ के दिनों अपना अधिकांश समय साधना, उपासना, स्वाध्याय, भगवत भजन में ही लगाएं। सांसारिक विचार एवं कार्य यथा संभव कम ही किये जावें।
यज्ञ करने के लिए स्नान करके धुले हुए वस्त्र पहन कर ही बैठना चाहिए। पाजामा अथवा मोजे पहन कर यज्ञ में बैठना निषिद्ध है।
सम्भव हो तो हवन करने वाले सब लोग कंधे पर पीला दुपट्टे धारण करके बैठें।
बड़े यज्ञ में सबको नये यज्ञोपवीत धारण करके बैठना चाहिए।
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सब लोग शान्त चित्त से एकाग्रता पूर्वक यज्ञ भगवान का ध्यान करते हुए हवन करें। इधर-उधर सिर मोड़कर देखना, आंखें नचाना, बीच-बीच में बातें करते जाना, हंसना आदि निषिद्ध है। पैरों को ऊपर-नीचे करके आसन तो बदल सकते हैं, पर बैठना पालती मार कर ही चाहिए। घुटने मोड़कर, उकडू, एक, ऊपर एक के नीचे अथवा अन्य बेढंगे प्रकारों से बैठना वर्जित है।
हवन में बैठने के लिये हाथ-पांव मुंह धोकर बैठें। शरीर पर या जेब में चमड़े का बना बटुआ आदि कोई वस्तु अथवा तम्बाकू, सिगरेट, पान आदि कोई नशीली चीज नहीं रखनी चाहिए। हो सके तो हवन के दिनों चमड़े के जूते भी न पहनें क्योंकि आजकल 99 प्रतिशत चमड़ा हत्या किए हुए पशुओं का ही आता है।
यज्ञ में भाग लेने वाली महिलाएं, भी भारतीय वेषभूषा में रहें, सादा लिवास पहनें व सिर को ढका रखें। रजोदर्शन के दिनों में अथवा जिनका बालक 40 दिन से छोटा हो, उन्हें हवन में भाग नहीं लेना चाहिए।
यज्ञ की वस्तुओं को यज्ञ के अतिरिक्त अन्य किसी काम में नहीं लाना चाहिए। हवन की अग्नि, दीपक, जल, पान आदि को सांसारिक कार्यों में लेना उचित नहीं है।
सब लोग एक स्वर से, एक गति से मंत्र बोलें। किसी का कंठ नीचा, किसी का ऊंचा, कोई जल्दी, कोई तेजी से बोले, यह ठीक नहीं।
सामग्री को कुण्ड में झोंकना नहीं चाहिए और न कुण्ड से बाहर ही बखेरना चाहिए। सावधानी से तथा श्रद्धापूर्वक थोड़ा आगे झुककर आहुति छोड़नी चाहिए। अग्नि को देव मानकर उनके आदर का ध्यान करते हुए जैसे भोजन परोसते हैं, वैसे हाथ को ऊपर मुख रख कर आहुति देनी चाहिए।
सामग्री पांचों उंगलियों से नहीं होमी जाती। अंगूठा और तर्जनी को छोड़कर मध्यमा, अनामिका अथवा तीसरी कनिष्ठ को भी मिलाकर इन पर सामग्री लेनी चाहिए और अंगूठे का सहारा देकर धीरे से अग्नि में छोड़ना चाहिए।
जिस समय मन्त्र के अन्त में स्वाहा का उच्चारण हो, उसी समय सबको आहुति छोड़नी चाहिए, पहले पीछे नहीं।
घी हवन वाले स्रवा की पीठ को, घृत पात्र के किनारे से पहले से पोंछ लिया करें, ताकि मेखलाओं पर घी टपकता न जाया करे।
घृत की आहुति देने के बाद स्रवा को लौटाते हुए एक बूंद घी प्रणीता पात्र में टपकाना चाहिए और साथ-साथ इदम् गायर्त्यै इमं न मम्बोलना चाहिए।
