Hawan Vidhi: वन एक बहुत ही पवित्र एवं असरकारक कर्मकांड है। इसके अच्छे परिणाम प्राप्त हो इसके लिए जातक को इसे पूर्ण श्रद्धा व समर्पण के साथ करना चाहिए। मन में यज्ञ के प्रति औपचारिकता का भाव नहीं दृढ़ संकल्प व आदर का भाव होना चाहिए।
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इस सृष्टि को रच कर जैसे ईश्वर हवन कर रहा है वैसे मैं भी करता हूं।
यह यज्ञ धन देने वाला है, इसे प्रतिदिन भक्ति से करो, उन्नति करो।
हर दिन इस पवित्र अग्नि का आधान मेरे संकल्प को बढ़ाता है।
मैं इस हवन कुंड की अग्नि में अपने पाप और दु:ख फूंक डालता हूं।
इस अग्नि की ज्वाला के समान सदा ऊपर को उठता हूं।
इस अग्नि के समान स्वतन्त्र विचरता हूं, कोई मुझे बांध नहीं सकता।
अग्नि के तेज से मेरा मुखमंडल चमक उठा है, यह दिव्य तेज है।
हवन कुंड की यह अग्नि मेरी रक्षा करती है।
यज्ञ की इस अग्नि ने मेरी नसों में जान डाल दी है।
एक हाथ से यज्ञ करता हूं, दूसरे से सफलता ग्रहण करता हूं।
हवन के ये दिव्य मन्त्र मेरी जीत की घोषणा हैं।
मेरा जीवन हवन कुंड की अग्नि है, कर्मों की आहुति से इसे और प्रचंड करता हूं।
प्रज्जवलित हुई हे हवन की अग्नि! तू मोक्ष के मार्ग में पहला पग है।
यह अग्नि मेरा संकल्प है। हार और दुर्भाग्य इस हवन कुंड में राख बने पड़े हैं।
हे सर्वत्र फैलती हवन की अग्नि! मेरी प्रसिद्धि का समाचार जन-जन तक पहुंचा दे!
इस हवन की अग्नि को मैंने हृदय में धारण किया है, अब कोई अंधेरा नहीं।
यज्ञ और अशुभ वैसे ही हैं जैसे प्रकाश और अंधेरा। दोनों एक साथ नहीं रह सकते।
भाग्य कर्म से बनते हैं और कर्म यज्ञ से। यज्ञ कर और भाग्य चमका ले।
इस यज्ञ की अग्नि की रगड़ से बुद्धियां प्रज्जवलित हो उठती हैं।
यह ऊपर को उठती अग्नि मुझे भी उठाती है।
हे अग्नि! तू मेरे प्रिय जनों की रक्षा कर!
हे अग्नि! तू मुझे प्रेम करने वाला साथी दे। शुभ गुणों से युक्त संतान दे!
हे अग्नि! तू समस्त रोगों को जड़ से काट दे!
अब यह हवन की अग्नि मेरे सीने में धधकती है, यह कभी नहीं बुझ सकती।
नया दिन, नयी अग्नि और नयी जीत।
