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जी हां! मैं हाई स्कूल पास हूं। होने को तो मैं इंटर और बी.ए. भी पास हूं पर सबसे खास बात ये है कि मैं हाई स्कूल पास हूं। जब हमारे प्रदेश में हाई स्कूल का परिणाम सत्रह प्रतिशत गया था, मैं उस समय का हाई स्कूल पास हूं।

कहते हैं पहला सावन, पहला प्यार और पहला बोर्ड उसकी तो फीलिंग ही कुछ और होती है। बोर्ड तो इंटर में भी दिए थे पर कसम से पहले बोर्ड में जितना डर लगा उतना कभी न लगा।
हम तो उस जमाने के हाई स्कूल हैं जहां पास होना भव सागर पार करने जैसा था। पास हो गए, वही बड़ी बात थी डिवीजन और परसेंटेज कौन पूछे। पूरे खानदान का सीना छप्पन इंच का हो जाता, पूरे मोहल्ले में लड्डू बंट जाते थे। माता जी आंखों में आंसू भरे भगवान के हाथ जोड़े शुक्रिया करना नहीं भूलती। हमें तो आज तक हाई स्कूल का रोल नम्बर भी याद है पांच लाख चौरासी हजार पांच सौ इकतालीस, सच बताएं इस चौरासी नम्बर ने हमें चौरासी लाख देवी-देवताओं की याद दिला दी थी।
ऊपर से इन रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने अलग खून पी रखा था। पता नहीं रिश्तेदारों को हम भाई-बहनों से क्या दुश्मनी थी, देखने में तो हम तब भी शरीफ ही दिखते थे। बड़े भाई साहब से एक तड़कता-भड़कता ट्रांसलेशन तो छोटे भैया से गणित का सवाल दाग दिया जाता। बड़े भैया छत और छोटे भाई न जाने क्यों जमीन की तरफ उन सवालों का जवाब ढूंढने लगते। हमारे हाथ-पांव बिना सवाल के ही फूलने लगते, कलेजा मुंह को आने लगता धौकनी दस फीट दूर से ही सुनी जा
सकती थी।
बोर्ड के नाम पर तो हमसे ज्यादा तो हमारी माता जी डरी हुई थीं, भई आखिर उन्हें भी तो मोहल्ले में मुंह दिखाना था!
पढ़ाई के साथ पूजा का समय और व्रत-अनुष्ठान की संख्या बढ़ने लगी। नहाने के बाद सूर्य भगवान को जल, पास के मंदिर में भोले नाथ के चक्कर की संख्या अचानक से बढ़ गई थी। सुना था भोले नाथ अपने नाम के अनुरूप बहुत भोले हैं और हम जैसे मासूम और भोले-भाले बालकों पर अपनी कृपादृष्टि बनाये रखते हैं। हम किसी तरह का कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे, अपनी किस्मत को लिखने के लिए हमने सारे टोटके अपना लिए थे। चिड़ियों को दाना, कौवे को रोटी, काले कुत्ते को दूध और गौ माता को घास खिलाना हमारे रोज की आदत में शुमार हो गया। माता जी हमारी भक्ति देखकर मन ही मन बहुत खुश थी, कभी-कभी तो खुशी से उनकी आंखें भी छलक आतीं। और फिर रिजल्ट का दिन भी आ गया। एक तो रातों की नींद वैसे ही गायब थी, उस पर घड़ी-घड़ी माता जी का ये पूछना पास तो हो जाएगा न, ने भूख भी गायब कर दी थी।
अखबार वाले को एक हफ्ते पहले ही सहेज दिया था पर वो करवा चौथ के चांद की तरह गायब था। हर आहट पर लगता कि वो आया, इतना इंतजार तो पिता जी ने महीने की तनख्वाह आने के लिए भी नहीं किया होगा जितना अखबार के लिए होता था। फाइनली जिसका मुझे नहीं सारे मोहल्ले को था इंतजार वो घड़ी आ ही गई। पूरा का पूरा मोहल्ला उस पर टूट पड़ा। उन दिनों रिजल्ट वाले अखबार को कमर में खोंसकर किसी ऊंची जगह या चबूतरे पर चढ़ जाते। फिर वहीं से नम्बर पूछा जाता और रिजल्ट सुनाया जाता, आठ लाख पैंतीस हजार एक सौ इकतालीस फेल, बयालीस फेल, सैतालिस फेल, छियासी सप्लीमेंट्री!
कोई मुरव्वत नहीं, पूरे मुहल्ले के सामने घनघोर वाली बेइज्जती।
उन दिनों रिजल्ट दिखाने की फीस भी डिवीजन से तय होती थी, लेकिन फेल होने वालों के लिए ये सेवा पूर्णतया नि:शुल्क होती। जानते थे मरे को और क्या मारना, घर वाले कूटने के लिए वैसे ही शस्त्र ढूंढने लगते। जो पास हो जाता, उसे ऊपर जाकर अपना नम्बर देखने की अनुमति होती। टॉर्च को घुमा-घुमाकर या हथेली पर पीट-पीटकर उसकी रोशनी बढ़ाने की कोशिश करने के बाद उस अविश्वसनीय शब्द पास शब्द को अपनी आंखों से देखने की ललक को न रोक पाने वाले मन, कपकपाते हाथों से अखबार और प्रवेश-पत्र से मिलाकर नम्बर पक्का किया जाता और फिर 10, 20 या 50 रुपये का पेमेंट कर पिता-पुत्र माउण्ट एवरेस्ट शिखर पर विजय पताका फहरा कर गर्व के साथ नीचे उतरते।
बात यही खत्म नहीं होती जिनका नम्बर अखबार में नहीं होता उनके परिजन अपने बच्चे को कुछ ऐसे ढांढस बंधाते, ‘अरे, कुम्भ का मेला है क्या, जो बारह साल में आएगा और न ही लिप ईयर वाला कैलेंडर जो सोच-सोचकर आएगा, अगले साल फिर दे देना एग्जाम…।
पूरे मोहल्ले में रतजगा होता। चाय और पकौड़ियों के दौर के साथ चर्चाएं चलती, अरे फलाने के लड़के ने तो पहली बार में ही हाई स्कूल पास कर लिया, भगवान जाने ये हमारी पढ़ाई का कमाल था या फिर भोले नाथ की कृपा एक ही बार में निकल लिए और माता जी के माता रानी अवतार से बच गये। ठ्ठ

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