Hindi Kahani: मैं अपना पसंदीदा रेडीओ शो “ आपकी फ़रमाइश “ सुनती हुई बुझे मन से तैयार हो रही थी ।आज एक लड़का मुझे देखने आ रहा था । वो कौन है , क्या नाम है , कहाँ से आ रहा था …मैं नहीं जानती थी या फिर जानना नहीं चाहती थी ….मैंने तो बस मम्मी -पापा की ख़ुशी के लिए अपनी रज़ामंदी दी थी ।मेरे दिल पर मेरे बचपन का प्यार क़ाबिज़ था ..अत: किसी और को दिल में स्थान देना मेरे वश में नहीं था ।तभी रेडियो पर “ पहला नशा ..पहला खुमार ,नया प्यार है ..नया इंतज़ार “ गीत बजने
लगा ।इस गीत को सुन कर मेरे तैयार होते हाथ रुक गए और आँखें नम हों गयीं । यह गीत मुझे अपने साथ स्कूल के दिनों में ले गया ..मेरे बचपन के प्यार की यादों में खींच ले गया ।
वो दिन भी क्या दिन थे ..बेफिक्र ..मस्ती से भरे हुए ।मैं अपने स्कूल की हाउस कैप्टन थी और वो …वो यानी आकाश मेरे प्रतिद्वंदी हाउस का कैप्टन ।किसी भी प्रतियोगिता में हमारे मध्य अकसर खूब लड़ाई होती …जिसका हाउस जीतता वो ख़ुद को सिकंदर समझता ।हमारे बीच अक्सर नोंक -झोंक होती थी ।स्कूल में खेल दिवस आयोजित होने वाला था ।हम दोनों ही अपने -अपने हाउस को जिताने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे ।उस दिन मुझे तेज़ बुख़ार था पर स्कूल में खेल दिवस होने के कारण छुट्टी लेना मुमकिन नहीं था ,अत: मैं दवाई ले कर स्कूल पहुँच कर तैयारियों में व्यस्त हो गई ।कुछ देर के पश्चात् बुख़ार और कमज़ोरी के कारण मैं बेहोश होकर गिर गई ।थोड़ी देर बाद मेडिकल रूम में अपनी अधखुली आँखों से मैंने उसे चिंतित खड़े देखा ।मुझे करहाते हुए खड़े होने की कोशिश करते देख वो मुझे सहारा देने लगा ।मैं अनिमेष दृष्टि से उसे देख रही थी ।
“ अब कैसी हो तुम…”
“ ठीक हूँ “ झेंपते हुए मैंने बोला
“ तुम भी कमाल करती हो ..जब इतनी तबियत ख़राब थीं तो स्कूल क्यूँ आई ..अरे ये स्कूल की प्रतियोगिता है ,जीवन की नहीं ।और जीवन की भी होती तो भी ऐसे कोई अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करता है “ वो अधिकार के साथ मुझे डाँट रहा था और मैं चुपचाप उसे सुन रही थी ।अपने जीवन में ऐसे अप्रत्याशित क्षण की मैंने कभी कल्पना नहीं की थी जिसने हमारे बीच एक अदृश्य सा रिश्ता जोड़ दिया था ।
“ नायरा ..हाउ आर यू नाउ … मैं तुम्हारे घर से किसी को बुला लेती हूँ ..वो तुम्हें घर ले जाएगा “ मेडिकल रूम में दाखिल होते हुए मेरी टीचर ने मुझसे कहा
“ नाउ आई एम फाइन मैम ..मैं ख़ुद घर चली ….”
“ डोंट वरी मैम ..मैं नयरा के घर के पास रहता हूँ ,
मैं उसे घर छोड़ दूँगा “ मेरी बात पूरी होने से पहले ही आकाश बोल पड़ा
“ गुड ..गेट वेल सून नायरा “ कह कर मैम चली
गई ।आकाश ने अत्यंत ज़िम्मेदारी के साथ मुझे मेरे
घर छोड़ कर माँ को सारा वृतांत सुना दिया और मुझे तबियत ठीक होने तक स्कूल ना आने का सख़्त निर्देश देकर चला गया ।
वो तो चला गया किंतु मेरे हृदय पटल पर अपने प्यार की लौ जला गया ।दो-चार दिनों के पश्चात मैं स्वस्थ हो कर स्कूल चली गई ।खेल दिवस में हम दोनों के हाउस के बीच टाई हो गया ।अब हम दोनों की नोंक -झोंक हँसी -दोस्ती में परिवर्तित हो गई
थी ।मेरे हृदय के हाल से बेख़बर वो मुझे अपना सबसे अच्छा दोस्त समझता था , इसलिए मैंने भी कभी दोस्ती की रेखा का कभी उलंघन नहीं किया ।मम्मी -पापा को भी वो और उसका शालीन स्वभाव बहुत पसंद था ।वो जब भी हमारे घर आता तो मुझसे ज़्यादा मम्मी -पापा से बातें करता ..धीरे -धीरे उसने हमारे परिवार में अपना विशेष स्थान बना लिया ।
उन दिनों मैं फ़िल्म “ जो जीता वही सिकंदर “ का गीत “ पहला नशा ..पहला खुमार ,नया प्यार है ….” अक्सर सुनती क्यूँकि मुझे लगता जैसे ये गीत मेरे लिये ही बना हो । मैं अपने एकतरफ़े प्यार के नशे में झूम रही थी ।वक्त पंख लगा कर उड़ रहा था ।हमारी बारहवीं कक्षा का स्कूल का वो दिन आ गया जब हम सभी को एक -दूसरे से बिछड़ कर अपने -अपने जीवन के नये अध्याय में प्रवेश करना था ।बारहवीं कक्षा के विद्यार्थी स्कूल के अंतिम दिन अपनी -अपनी क़मीज़ों पर अपने सभी दोस्तों ,सहपाठियों से एक शुभ कामनाओं संदेश लिखवाते हैं ताकि जीवन के सबसे अमूल्य स्कूल लाइफ की यादों को वो अपनी क़मीज़ पर क़ैद कर सकें ।उस दिन हम सभी एक -दूसरे की क़मीज़ पर शुभ -कामनाओं के संदेश लिख रहे थे ।कोई कभी ना बिछड़ने का लिख रहा था , कोई आने वाले बोर्ड की परीक्षा के लिए शुभ कामना ,तो कोई भावी जीवन के लिए ।मेरी निगाहें उसे ढूँढ ही रही थी की वो अचानक मेरे पास आया और बोला “ नायरा तुम भी लिख
दो “ मैंने उसके भावी जीवन के लिए शुभ संदेश लिख दिया ।थोड़ी देर बाद हम सभी भारी हृदय और नम आँखों से एक दूसरे से विदा ले रहे थे ,तभी वो मेरे पास आया और बोला “ नायरा ..चलो मैं तुम्हें घर छोड़ दूँ “
रास्ते में हमारे बीच मौन पसरा हुआ था ।
“ नायरा ..तुमसे कुछ कहना था ..”कह कर उसने मौन तोड़ा ।
“ हाँ ..बोलो “
“ नायरा .. मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि तुम्हारे हृदय की भावनाओं को …” मैं हैरानी से उसे देखने लगी
“ हाँ ..नायरा ….. तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त हो ।
देखो नायरा … हम दोनों को ही अपने जीवन के उदेश्य को पूरा करना है …अपने सपनों को पूरा करना है ..कुछ बनना है । नायरा , ये बचपने ,लड़कपन की उम्र और ……..हमें हमारे सपनों से भटका देगी ।और फिर …तुम्हारे मम्मी -पापा का मुझपर जो विश्वास है …मैं उसे तोड़ नही सकता ….उनके मान -सम्मान को ठेस नहीं पहुँचा सकता । मेरा ज़मीर मुझे ये करने की कदापि सहमति नहीं देगा नायरा ..आई होप यू विल अंडरस्टैंड ।”
मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रही थी ।आँखों के कोरों में गीलापन था ।एक तरफ़ मेरा दिल टूट रहा था पर दूसरी तरफ़ उसकी परिपक्वता पर मुझे फ़क्र भी हो रहा था ।
“ मेरे पापा का ट्रांसफ़र हो गया है ।हम एग्जाम के बाद पुणे शिफ्ट हो जाएँगे ।हम हमेशा आपस में टच में रहेंगे ..… अब तो इंटरनेट की मेहरबानी की वजह से आपस में जुड़े रहना बहुत सरल हो गया है ।नायरा ..मेरी शुभ कामनाएँ हमेशा तुम्हारे साथ
रहेंगी । वादा करो कि तुम ख़ूब मन लगा कर
पढ़ोगी और अपने सपने को हासिल करोगी ..प्रॉमिस मी “ मुझसे प्रॉमिस लेकर उसने बातचीत पर विराम लगा दिया ।
उसको जाते हुए देख एक क्षण मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मेरी साँसे उसके साथ जा रही हो किंतु दूसरे ही क्षण मुझे उसे दिया हुआ अपना वादा याद आ गया ।
उस दिन के बाद हम दोनों अपने भविष्य के निर्माण में लग गए ।कुछ वर्ष तो हम दोनों टच में रहे …फिर धीरे -धीरे अपनी -अपनी व्यस्तताओं के कारण वो भी कम हो गया …ना के बराबर ।भागते वक़्त के साथ हम किशोरावस्था से युवावस्था में प्रवेश कर अपने -अपने लक्ष्य को प्राप्त कर चुके थे ।घर में मेरे विवाह की बातें होने लगी थी ।मेरे हृदय में तो मेरे लड़कपन का प्यार क़ाबिज़ था …पर वो एकतरफ़ा था ,यही सोच कर भारी मन से मैंने मम्मी -पापा को हाँ कर दी थी , और आज एक लड़का मुझे देखने आने वाला था ।
“ नायरा …“ मम्मी की आवाज़ मुझे मेरी यादों से वापिस वर्तमान में ले आयी ।
“ नायरा …बेटा लड़का उस कमरे में है ।तुम अंदर कमरे में जाकर आपस में बात कर लो , अगर तुम्हें पसंद आएगा तभी निर्णय लेंगे “ मम्मी मुझसे बोली
मैं कमरे में गई तो लड़का खिड़की के बाहर देख रहा था ।उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी ।
“ देखिए .. जीवन की नयी शुरुआत करने से पहले मैं आपसे कुछ कहना चाहती थी ..” मैंने संकोचते हुए कहा
“ बोलिये ..”
“ मैं अपने स्कूल लाइफ में एक लड़के से प्यार करती थी , वो मेरे बचपन का प्यार आज भी मेरे हृदय पर क़ाबिज़ है ..किंतु वो सिर्फ़ एक तरफ़ा था …यानी मेरी तरफ़ से …” कहते कहते मेरा स्वर रुआँसा सा हो गया और आँखें नम हो गई ।
“ तो अब तुम उस एकतरफ़े प्यार को दोतरफ़ा कर लो ..” ये कहते कहते जब वो पलटा तो मैं जड़वत हो गई , मन -मश्तिष्क शून्य हो गये ।सामने आकाश था ..
वो मेरे पास आया और मेरे माथे पर अपने प्यार का निशान अंकित कर दिया ।
इससे पहले मैं कुछ बोल पाती ,पीछे से मुझे हँसने की आवाज़ आयी ।
“ नायरा …कैसा लगा हमारा सरप्राइज ! अरे हमें तो आकाश शुरू से ही पसंद था ..और ये सारा प्लान भी इसी का ही था …” मम्मी बोलीं
मैं किंकतर्व्यविमूढ़ सब देख रही थी और अपने भाग्य पर इतरा रही थी …..मेरे बचपन का प्यार मेरा जीवन साथी जो बन गया था ।
