निम्न मध्यवर्गीय प्राइमरी स्कूल की अध्यापिका कविताजी आज ट्रेन के एसी कूपे में बैठने के लिए छोटे बच्चे की तरह उत्साहित थीं। उन्होंने कल्पनालोक में ही विचरण करते हुए ही एसी कूपे की ठंडक के बारे में सोचा था। बेटी की जिद और अनुकम्पा से उन्हें आज यह सौभाग्य मिलने वाला था। वह अपनी उपलब्धि पर गौरवान्वित थीं। उनके अंतर्मन में अभिजात्यवर्ग के साथ कदम मिलाने में अपार संकोच हो रहा था।
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जुनून कुत्ता पालने का – गृहलक्ष्मी कहानियां
कुत्ता पालना हमारे उच्च रहन-सहन का प्रतीक माना जाता है, तो क्यूं न मैं भी इसका भरपूर फायदा लूं। उन्हें घुमाने के बहाने ही सही, खुली हवा का आनंद उठाऊं।
रंग रंगीला इन्द्रधनुष – गृहलक्ष्मी कहानियां
मान्या मेरी बचपन की सहेली थी। स्कूल से लेकर कालेज तक का सफर हमने साथ-साथ तय किया था। गुड्डे- गुड़ियों के साथ खेलते- खेलते हम कब बचपन की दहलीज लाघंकर जवान हो गये, पता ही नहीं चला। मान्या संयुक्त परिवार में बाबा, दादी, चाचा, चाची, माता-पिता सबके साथ रहती थी। अक्सर रविवार को वह साइकिल लेकर मेरे घर चली आती।
खुशियों की दस्तक – गृहलक्ष्मी कहानियां
वृद्ध दंपत्ति का एकमात्र सहारा उनका पुत्र जब परदेस के जीवन में खो गया और अकेलापन वृद्ध दंपत्ति को तिल-तिल कर मारने लगा तब पराये लोगों में उन्होंने अपने जीवन का यथार्थ ढूंढ़ लिया।
सजा से मुक्ति – गृहलक्ष्मी कहानियां
शॉपिंग मॉल में अचानक पलाश और पलक दिखाई दे गए। पलक अपने चिर-परिचित अंदाज में चहकते हुए बोली, ‘हैलो, भीनी कैसी हो?’ मेरे अंदर क्रोध का लावा जमा था, वह लावा बाहर तो निकलना चाह रहा था लेकिन समय व स्थान को देखते हुए खुद पर काबू रखना पड़ा। बड़े रूखे स्वर में कहा, ‘अच्छी […]
सरप्राइज गिफ्ट – गृहलक्ष्मी कहानियां
‘‘जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएं” कहते हुए संजना ने गुलाब का फूल अपनी मॉम रंजना को दिया और गले लग गई, रंजना ने भी उसके सिर पर हाथ रखते हुए आशीर्वाद दिया।
तब तक सोमेश ने भी एक पैकेट रंजना हाथ में देते हुए, ‘‘हैप्पी बर्थ डे, रंजना जी ‘‘कहा तब रंजना ने ‘‘थैंक्स” कहते हुए हाथ जोड़ लिए।
मुर्दाघर की तलाश में – गृहलक्ष्मी कहानियां
उसे लगा कि मैंने उसे पहचान लिया है तो वह दूसरी तरफ सहज भाव से घूम गया, जैसे उसने मुझे देखा ही न हो। फिर तेज कदमों से चलता हुआ सड़क की तरफ पहुंच गया। मैं एक क्षण सोच में पड़ गयी। क्या ये वही है? कहीं मेरी आंखें तो धोखा नहीं खा गई। नहीं ये वही है, लेकिन मुझे देखकर अनदेखा क्यों करके चला गया? मैं तो उसकी दोस्त थी और उसके शहर छोड़ने तक भी थी।
मेरी पहचान – गृहलक्ष्मी कहानियां
काश, मैं भी इन लोगों की तरह ज्यादा पढ़ लिख लेती तो मैं भी कुछ होती। मेरी भी कोई अपनी पहचान होती। ऐसा मज़ाक न बनता मेरा। पर आगे पढ़ती भी तो कैसे। दसवीं के बाद से ही पिताजी को मेरी शादी की चिंता होने लगी थी। मैं आगे पढ़नी चाहती थी। पर गांव में कोई स्कूल भी तो नहीं था दसवीं के बाद पढ़ने के लिए।
सुरक्षा कवच – गृहलक्ष्मी कहानियां
जिस याद को सदा के लिए कोई भूलना चाहे लेकिन विवशता जब उसी याद के परिचायक उसे बार- बार अपनी नजरों के सामने लाने पड़े तो किसी के मन का क्या होता होगा, इसका अंदाजा लगाना हर किसी के लिए संभव नहीं। कुछ ऐसी ही विवशता से सदा जूझती रहती थी भारती। जब वह दफ्तर जाने के लिए तैयार होकर आइने के सामने आती थी तो उसके दिल में कुछ ऐसी हूक उठती कि पलके स्वतः ही भीग जातीं।
स्वयं एक मशाल – गृहलक्ष्मी कहानियां
माथे तक पल्ला, दुबली-पतली काया। और आंखों की निश्चल चमक-होठों पर खेलती अव्यक्त मुस्कान। यही तो पहचान थी उसकी। एक-झटके में ही पूरा समाचार पढ़ गई अलका ‘फसब कंवर गांव में कन्या शिक्षा अभियान से जुड़ी जीवट नारी हैं। महिला उत्थान, गरीबी, बीमारी और समाज सेवा के कार्यों का निरंतर नेतृत्व कर रही हैं।
