दामू दादा सुमित को मेला घुमा कर घर की ओर लौट रहे थे कि मेले में इतना घूमने के कारण सुमित को भूख सताने लगी थी। दामू दादा चूंकि घर से कुछ खाने का लाए नहीं थे, सो नजदीक की किराने की दुकान से बिस्किट का पैकेट खरीद लिया। चलते चलते पैकेट खोलकर अभी वे सुमित को कुछ बिस्किट दे ही रहे थे कि उन्होंने पीछे देखा कि एक कुत्ता बिस्किट को ललचाई नजरों से देख रहा है। दया भाव दिखाते हुए उन्होंने दो तीन बिस्किट उसकी ओर उछाल दिए और शेष बिस्किट अपने झोले में रख लिए।
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मज़ाक – गृहलक्ष्मी कहानियां
विनय आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था। वह बहुत तेज तर्रार और शरारती लड़का था। सदा कुछ न कुछ शरारत करता ही रहता था, परन्तु कभी भी पकड़ा नहीं जाता था। उल्टा उसके कारण दूसरों को डाट पड़ जाती थी। एक दिन उसने अपने एक मित्र सुरेश की साइकिल के टायर में पिन चुभो दिया।
शक्तिला – गृहलक्ष्मी कहानियां
साबित कर दिया शक्तिला ने कि हिम्मत हो तो कोई नहीं डिगा सकता किसी को भी… और लडक़ी की सबसे बड़ी खूबसूरती है, मुश्किलों से लडऩे का हौसला और सही निर्णय लेने की क्षमता। आज अपने नाम को सार्थक कर लिया था उसने…।
फोटो सास-ससुर की – गृहलक्ष्मी कहानियां
सास-ससुर की फोटो घर में टांगना यानी नई परम्परा का सूत्रपात और नारी को समान अधिकार दिये जाने की दिशा में सराहनीय काम।
नाबालिग अपराधी – गृहलक्ष्मी कहानियां
मनोज अमीर माँ बाप का इकलोता बेटा था। घर में किसी चीज़ की कमी न थी उसकी हर जिद्द पूरी की जाती थी। उसके पिताजी की कई फैक्टरियां थी। उनकी इच्छा थी कि मनोज बडा होकर उनका कारोबार सम्भाले, लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। बचपन से ही मनोज का मन पढाई में नहीं लगता था । सारा दिन पार्क में खेलना,मौज मस्ती करना ही उसे अच्छा लगता था ।
मोहल्ले का इकलौता नल – गृहलक्ष्मी कहानियां
जिस मकान के सामने नल लगा था, उन्हें लोग कह रहे थे आप मजे में रहे। लेकिन अगली सुबह ही उस परिवार को समझ आ गया कि वह किस मुसीबत में पड़ गए हैं..
वीरा या प्रेरणा – गृहलक्ष्मी कहानियां
सुबह शायद चार बजे थे वीरा को नींद नहीं आ रही थी । बार बार सोने की कोशिश करती, पर नींद थी कि उसका दूर दूर तक कहीं पता न था । मन में अनेक संकल्प चल रहे थे कि उठ कर कुछ पढ़ लूं या कुछ व्यायाम ही कर लूं। वीरा को सुबह सुबह प्राणायाम करने की आदत थी । पिछले तीस सालों से यह सिलसिला चालू था । पर अभी तो रात के दो ही बजे थे। इतनी सुबह उठ गयी तो दिन भर थकावट लगती रहेगी । यही सोच बिस्तर पर पिछले एक घंटे से करवटें बदल रही थी ।
रंग जो छूटे नाहि – गृहलक्ष्मी कहानियां
अरे भाई, जरा ठीक से रिक्शा चलाओ न। क्या सामान समेत नीचे ही गिरा दोगे। रिक्शा वाला बोला, हम क्या करें, रास्ते में इतने गड्ढे हैं कि झटके तो लगेंगे ही। वो बड़ी मुश्किल से बैठ पा रही थी, कभी अपना बैग तो कभी अपनी अटैची सम्भालती। इतना तो विदेश से कानपुर आने में नही परेशान हुई जितना कि अपनी गली में आने से थक गयी और झुंझलाते हुए बोली कि हद हो गयी, इतने सालों बाद कुछ भी नहीं बदला।
सीख अनकही – गृहलक्ष्मी कहानियां
पति सोमेश के एक हफ्ते के टूर पर जाते ही पूनम ने भी अपना मन मायके में जाने का बना लिया, क्योंकि दोनों बच्चे भी समर कैैंम्प के लिये गये हुए थे। मन इतना खुश था कि रात को ही मां को फोन करके अपने आने की सूचना भी दे दी।
इंसानियत की खातिर – गृहलक्ष्मी कहानियां
प्लीज मेरी मदद कीजिये भगवान के लिए, प्लीज इंसानियत की खातिर तो मदद कीजिये। कृपा करके आप जाइए, कह कर फटाक की आवाज के साथ दरवाजा बंद हो गया। पाठक जी खोलिए न दरवाजा, क्या करें, कोई हमारी मदद करने को तैयार नहीं है, फिर मिश्रा अंकल आपने तो सब कुछ देखा है कि हमारी बेटी के साथ क्या किया उन लोगों ने, पूरे मोहल्ले वालों ने देखा है, फिर भी कोई मदद के लिए तैयार नहीं है।
