एमनियोसेंटेसिस टेस्ट आमतौर पर दूसरी तिमाही में 16 से 18 सप्ताह की गर्भावस्था के बीच किया जाता है। इसमें डॉक्टर गर्भ में से एमनियोटिक द्रव का थोड़ा सा नमूना लेते हैं। इसलिए यह टेस्ट समय पर करवाना बहुत जरूरी होता है ।
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गर्भावस्था में भी लें सेक्स का आनंद
गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिलाएं सेक्स करने से कतराती हैं, उनको लगता है कि बच्चे पर इसका असर पड़ता है। लेकिन डॉक्टर्स की मानें तो आप कुछ बातों का ध्यान रखकर गर्भावस्था में भी सेक्स का भरपूर मजा उठा सकते हैं। वो कैसे? आइए जानें-
क्वैड स्क्रीनिंग से जानें गर्भावस्था की जटिलताओं को
क्वैड स्क्रीनिंग में भ्रूण द्वारा बनने वाले चारों पदार्थों की जांच होती है, जो मां के रक्तप्रवाह में मिलते हैं। क्वैड भी जन्मजात विकारों का पता नहीं लगा सकता। यह सिर्फ खतरा भांप सकता है। यदि आपको भी ऐसे नतीजे मिलें तो इस बारे में अपने डॉक्टर से राय लें।
इंटीग्रेटेड स्क्रीनिंग टेस्ट से जानें शिशु की तकलीफ
इंटीग्रेटेड स्क्रीनिंग टेस्ट में अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट दोनों होते हैं, लेकिन इस मामले में पहला ब्लड टेस्ट पीएपीवी की जाँच आदि पहली तिमाही में किए जाते हैं तथा दूसरा ब्लड टेस्ट दूसरी तिमाही में किया जाता है। इन तीनों टेस्ट का मिला-जुला नतीजा दिया जाता है।
गर्भावस्था की पहली तिमाही में अल्ट्रासाउंड स्कैन है जरूरी
गर्भावस्था के शुरुआती कुछ हफ्तों में अल्ट्रासाउंड स्कैन करवाएं जाते हैं, जिसके पीछे कई कारण जैसे- गर्भावस्था की तारीख, भ्रूणों की संख्या, क्रोमोसोमल असामान्यता के खतरे की जांच आदि होते हैं ताकि भ्रूण की सही जानकारी का पता चल सके ।
सिंगल मदर कैसे तय करें प्रेगनेंसी का सफर
पिता का असामयिक निधन या किसी कारणवश अभिभावकों का अलगाव महिला को सिंगल मदर बनने के लिए मजबूर कर देता है। 21वीं सदी में जैसे-जैसे आधुनिकता और तकनीक के आवरण में हम ढलते गए, सामाजिक मान्यताएं बदलतीं गईं। हजारों मुसीबतों के बावजूद एक नहीं, कई मां सामने आईं, जो सिंगल मदर
होकर भी अपने दम पर बच्चे को इस दुनिया में लाईं।
ऐसे करें 35 वर्ष की आयु के बाद प्रेगनेंसी की प्लानिंग
35 के बाद, महिला का प्रेग्नेंट होना थोड़ा सा रिस्की माना जाता है क्योंकि इस उम्र में मां बनने में परेशानियां होने की सम्भावनाएं कम उम्र के मुकाबले थोड़ी ज्यादा होती है। लेकिन जब आप डॉक्टर से लगातार संपर्क में रहती हैं, तो आप स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती हैं।
बुलीमिया से पीड़ित हैं तो गर्भावस्था में 11 बातों का रखें ध्यान
बुलिमिया गर्भावस्था को प्रभावित करता है,क्योंकि बुलीमिया एक तरह का ईटिंग डिसऑर्डर है, जिसमें महिला पहले तो बहुत ज्यादा खाना खा लेती है और बाद में यह सोचकर खाने को बाहर निकाल देती है कि कहीं उसका वेट बढ़ ना जाए। यह स्थिति गर्भवती महिला के स्वास्थ्य को ख़राब करती है इसलिए गर्भावस्था के दौरान बुलीमिया से छुटकारा पाना बहुत जरूरी है।
वजन है कम तो गर्भधारण से पहले वजन बढ़ाएं
गर्भधारण के समय वजन का काफी महत्व होता है। अधिक वजन की समस्या के अलावा कम वजन की समस्या भी गर्भधारण में दिक्कत पैदा कर सकती है, क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान बहुत अधिक वजन बढ़ना और घटना दोनों के ही अपने नुकसान और फायदे हैं।
जानें गैस्ट्रिक बायपास के बाद गर्भावस्था कितनी सुरक्षित
आजकल महिलाएं मोटापे को काम करने के लिए बाइपास सर्जरी का सहारा लेती हैं, क्योंकि इसमें मेहनत नहीं लगती और तुरंत पतले हो जाते हैं। लेकिन अगर आपने बाइपास सर्जरी के बाद गर्भधारण किया है तो कुछ बातों का ध्यान रखना होगा ।
