एमनियोसेंटेसिस टेस्ट का इस्तेमाल आनुवांशिक स्वास्थ्य स्थितियों की पुष्टि करने के लिए किया जाता है। इसके करने का सबसे आम कारण यह जानना होता है कि शिशु में कहीं डाउंस सिंड्रोम तो नहीं है। कई बार, गर्भावस्था में अन्य संभावित समस्याओं के बारे में पता लगाने के लिए भी एमनियोसेंटेसिस की सलाह दी जाती है।
यह क्या है? :- भ्रूण के आसपास घिरे हुए एमनिओटिक द्रव्य में भ्रूण कोशिका रसायन व माइक्रोआर्गेनिकज्म की मदद से विकसित हो रहे शिशु के बारे में काफी जानकारी ली जा सकती है जैसे-जेनेटिक मेकअप, वर्तमान तथा परिपक्वता की स्थिति। प्रसव पूर्व निदान में यह जांच काफी महत्वपूर्ण होती है। यह तब की जाती है, जब :-
- जब किसी स्क्रीनिंग टेस्ट के नतीजे असामान्य आएं तो भ्रूण के एमनिओटिक द्रव्य की जांच बहुत जरूरी हो जाती है,ताकि पता लग सके कि कहीं भ्रूण में कोई असमानता तो नहीं!
- यदि माँ की आयु 35 से अधिक है तो शिशु डाऊन सिंड्रोम से ग्रस्त हो सकता है, तब डॉक्टर की राय से यह जांच की जाती है।
- घर में पहले ही एक शिशु जन्म ले चुका है, जो क्रोमोसोमल असामान्यता से ग्रस्त है; जैसे सिंड्रोम, मेटावॉलिक डिसआर्डर या एंजाइम डेफीशियेंसी वगैरह!
- अगर मां किसी एक्स लिंकड जेनेटिक असामानता जैसे-हीमोफीलिया से ग्रस्त है।
- टॉम्सोप्लाजमोसिस, फिफथो डिज़ीज,साइटोमैगालो वायरस या किसी अन्य से भ्रूण संक्रमण की संभावना है।
- गर्भावस्था में बाद में, भ्रूण के फेफड़ों की जांच अनिवार्य हो जाती है।
यह कैसे होता है? :- आपको पीठ के बल लिटाकर, अल्ट्रासाउंड की मदद से शिशु और प्लेसेंटा का पता लगाया जाता है ताकि डॉक्ट रइस प्रक्रिया में उन्हें साफ तौर पर देख सकें। हो सकता है कि लोकल एनस्थीसिया का इंजेक्शन देकर पेट के निचले हिस्से को सुन्न किया जाए लेकिन यह इंजेक्शन की प्रक्रिया अत्यधिक दर्द देने वाली होती है। इसलिए डॉक्टर इसे नहीं लगाते। आपके गर्भाशय में एक लंबी खोखली सुई पहुंचाई जाती है और उसमें थोड़ा एमनिओटिव द्रव्य लिया जाता है।(भ्रूण अपने-आप उस द्रव्य की फिर से पूर्ति कर लेता है)। इसके साथ-साथ अल्ट्रासाउंड भी होता रहता है ताकि गलती से भी भ्रूण को किसी प्रकार की चोट न पहुंचे या उसे सुई न चुभे। इस पूरे तरीके में आधा घंटा लगता है जबकि द्रव्य लेने में मुश्किल से 1-2 मिनट लगते हैं। यदि आप आर एच निगेटिव हैं तो आपको एमनिओसेंटेसिस के बाद आरएच ओगैमइम्यून ग्लोबूलिन का इंजेक्शन दिया जाता है ताकि आरएच से जुड़ी समस्याएं खड़ी न हो जाएं।
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यह कब होता है? :- यह गर्भावस्था के 16 से18 सप्ताह के बीच होता है, लेकिन कई बार 13 या 14 या फिर 23 या 24 वें सप्ताह में भी किया जा सकता है। 10 से 14 दिन में जांच के नतीजे आ जाते हैं। कई प्रयोगशालाओं में फिश तकनीक (फलोरोसेंट इन सिटूहाइब्रीडिजेशन) का प्रयोग किया जाता है। जिसमें कोशिकाओं के निश्चित क्रोमोसोम के नंबर झटपट गिने जा सकते हैं। यह एमनीओसेंटेसिस नमूने में भी झटपट नतीजे पाने के लिए किया जा सकता है। चूंकि यह नतीजे पूरे नहीं होंगे इसलिए लैब में दूसरी क्रोमोसोमल जांच भी की जा सकती है। यह टेस्ट आखिरी तिमाही में भी किया जा सकता है ताकि भ्रूण के फेफड़ों की परिपक्वता जांच हो सके।
यह कितना सही होता है? :- यह 99 प्रतिशत से अधिक सही होता है। एक सामान्य फिश टेस्ट करीब 98 प्रतिशत सही होता है।
यह कितना सुरक्षित है? :- यह पूरी तरह सुरक्षित माना जाता है। 1,600 में से 1 मामले में गर्भपात की संभावना हो सकती है। इस प्रक्रिया के बाद कुछ घंटे तक पेट में हल्की ऐंठन या दर्द महसूस हो सकता है। कुछ डॉक्टर इसके बाद आराम की सलाह देते हैं और कुछ नहीं! कभी-कभी हल्का रक्तस्राव या द्रव्य का स्राव हो सकता है। हालांकि थोड़े आराम से यह ठीक हो जाएंगे लेकिन अपेक्षित सावधानी बरतना न भूलें।
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