इस अल्ट्रासाउंड में शिशु के धड़कते दिल, उसकी रीढ़ की हड्डी के मोड़, चेहरे, बाजू व टांगों को पहचान होती है। अधिकतर मामलों में आप इस अल्ट्रासाउंड की 3-डी या 4 डी डिजिटल वीडियो घर ला सकती हैं ताकि उसे परिवार व मित्रों को दिखाया जा सके।
यह क्या है? :- चाहे आप गर्भधारण के बाद पहली तिमाही में या फिर कंबाइंड या इंटीग्रेटिड स्क्रीनिंग टेस्ट में अपना अल्ट्रासाउंड करवा चुकी हैं, लेकिन इसके बावजूद आपको दूसरी तिमाही में यह अल्ट्रासाउंड करवाना होगा क्योंकि इससे भ्रूण के विकास व अंगों की संरचना का पता चलता है। इससे भ्रूण के विकास का भी अनुमान लगाया जा सकता है। इसमें आपके शिशु की ज्यादा बेहतर तस्वीर दिखने लगती है। आजकल अल्ट्रासाउंड की तस्वीरें इतनी साफ होती हैं कि गैर विशेषज्ञ यानी माता-पिता तक सिर से पांव तक पूरी आकृति पहचान सकते हैं। आप इस अल्ट्रासाउंड में डॉक्टर की मदद से अपने शिशु के धड़कते दिल, उसकी रीढ़ की हड्डी के मोड़, चेहरे, बाजू व टांगों को पहचान सकती हैं। हो सकता है कि वह आपको अपना अंगूठा चूसता हुआ भी दिख जाए, हालांकि लिंग की पहचान भी हो जाती है। यदि आप इसे सरप्राइज़ रखना चाहती हैं तो डॉक्टर को पहले ही बता दें। अधिकतर मामलों में आप इस अल्ट्रासाउंड की 3-डी या 4 डी डिजिटल वीडियो घर ला सकती हैं ताकि उसे परिवार व मित्रों को दिखाया जा सके।
यह कब होता है? :- आमतौर पर इसे 18 से 22 सप्ताह के दौरान किया जाता है।
यह कितना सुरक्षित है? :- इसमें कोई खतरा नहीं बल्कि कई फायदे ही होते हैं। डॉक्टर आमतौर पर गर्भावस्था में कई बार अल्ट्रासाउंड परीक्षण की सलाह देते हैं। कुछ विशेषज्ञ ऐसे हैं, जिनके अनुसार विशेष परिस्थितियों में ही अल्ट्रासाउंड होना चाहिए।
अन्य प्रकार की जन्म-पूर्व जांच :- दिन व दिन इस क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है। कई नई दवाएं बाजार में आ रही हैं। अनेक प्रकार के टेस्ट व जाँच भी किए जाने लगे हैं। जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं-
अगले पेज पर पढ़ें पीयूबीएस जाँच के बारे में

परक्यूटेनियस अम्बलीकिल ब्लड सैंपलिंग :- पीयूबीएस जाँच गर्भावस्था के 18 वें सप्ताह में की जाती है। इससे कई रक्त व त्वचा रोगों का पता चल जाता है, जो कि फ्रमनिओसेंटेसिस में पता नहीं चलते यदि एमनिओसेंटेसिस के नतीजे असामान्य हों, तो भी यह जांच होती है। इससे पता चल जाता है कि कहीं शिशु किसी गंभीर रोग के संक्रमण से ग्रस्त तो नहीं है; जैसे-रुबेला, टॉक्सो प्लाजमोसिल, फिक्क डिजीज़। हालांकि ये जाँच नई है पर इसके नतीजे प्रामाणिक ही माने जाते हैं। यह भी एमनिओसेंटेसिस की तरह ही होता बस अंतर इतना है कि अल्ट्रासाउंड की सुई, एमीनायोटिक सैक में डालने की बजाए अजन्मे शिशु के अंबलिकन कॉर्ड की रक्त नलिका में डाली जाती है। इसके नतीजे तीन दिन में मिलते हैं। इस जांच से सम से पहले डिलीवरी होने या तिल्ली फटने का हल्का सा खतरा भी शामिल होता है।
भ्रूण लिंग निर्धारण के लिए मैटरनल ब्लड टेस्ट :- हालांकि यह प्रयोग अवस्था में है लेकिन आनुवांशिक कारणों की स्क्रीनिंग के लिए बेहतर है जो केवल नर शिशु पर ही असर डालते हैं।
स्किन सैम्पलिंग :- भ्रूण की त्वचा का थोड़ा सा नमूना ले कर जांच की जाती है।
एम.आर.आई. :- इससे भ्रूण व उसकी असामान्यता के विषय में पूरी जानकारी मिल को जाती है। शोधकर्ता ज्यादा बेहतर चित्र पाने के लिए शोधरत हैं। गर्भावस्था में इसका प्रयोग पूरी तरह से सुरक्षित है।
कार्डियोग्राफी :- इससे भ्रूण के हृदय की जाँच होती है। यह अल्ट्रासाउंड हृदय में जाने व जाने वाले रक्त प्रवाह को भी दर्शाता है।
भ्रूण स्क्रीन :- कई बार स्क्रीन में कई बार जांच कराने के बाद भी सही नतीजे सामने नहीं आते। तब आप ऐसी चिंता में पड़ जाते हैं, जिससे आप सचमुच बचना चाह रहे थे। इस बारे में डॉक्टर से राय लेने के बाद ही कोई कदम बढ़ाएं। आमतौर पर 90 प्रतिशत महिलाएं पॉजिटिव स्क्रीन के बाद स्वस्थ शिशुओं को जन्म देती हैं।
ये भी पढ़ें –
एमनियोसेंटेसिस टेस्ट से भ्रूण की असमानता का पता चलता है
क्वैड स्क्रीनिंग से जानें गर्भावस्था की जटिलताओं को
सी.वी.एस.टेस्ट कराएं और क्रोमोसोमल समस्याओं का पता लगाएं
आप हमें फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस और यू ट्यूब चैनल पर भी फॉलो कर सकती हैं।
