इंटीग्रेटेड स्क्रीनिंग टेस्ट में अल्ट्रासाउंड 10 से 14 सप्ताह के बीच होता है और दूसरा 16 से 18 सप्ताह के बीच होता है। दूसरे ब्लड टेस्ट के बाद जांच के नतीजे दिए जाते हैं। इंटीग्रेटिड स्क्रीनिंग टेस्ट से डाऊन सिंड्रोम केस व न्यूरलटेस्ट डिफेक्ट्स का पता लगाया जा सकता है।
यह क्या है? :- पहली तिमाही की कंबाइंड स्क्रीनिंग की तरह, इंटीग्रेटेड स्क्रीनिंग टेस्ट में अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट दोनों होते हैं, लेकिन इस मामले में अल्ट्रासाउंड (एन टी की जांच), पहला ब्लड टेस्टपीएपीवी की जाँच आदि पहली तिमाही में किए जाते हैं तथा दूसरा ब्लड टेस्ट (क्वैड स्क्रीनिंग की तरह चारों तथ्यों की जांच के लिए) दूसरी तिमाही में किया जाता है। इन तीनों टेस्ट का मिला-जुला नतीजा दिया जाता है। दूसरे स्क्रीनिंग टेस्ट की तरह यह भी प्रत्यक्ष रूप से क्रोमोसोमल समस्याओं की जांच नहीं करता और न ही किसी विशेष स्थिति की जांच करता है यह सिर्फ यही अनुमान देता है कि शिशु को कोई तकलीफ हो सकती है। यह जानकारी मिलने के बाद आप डॉक्टर से मिल कर तय कर सकते हैं, कि आप डायग्नॉस्टिक टेस्ट करवाना चाहेंगे या नहीं।
यह कब होता है? :- यह अल्ट्रासाउंड 10 से 14 सप्ताह के बीच होता है। पहला ब्लड टेस्ट,अल्ट्रासाउंड वाले दिन ही होता है और दूसरा ब्लड टेस्ट 16 से 18 सप्ताह के बीच होता है। दूसरे ब्लड टेस्ट के बाद जांच के नतीजे दिए जाते हैं।
यह कितना सही होता है?:- गर्भावस्था में पहली व दूसरी तिमाही की सम्मिलित जांच के परिणाम,एक तिमाही की जांच से अधिक प्रभावी होते हैं। इंटीग्रेटिड स्क्रीनिंग टेस्ट से 90 प्रतिशत डाऊन सिंड्रोम केस व 80 से 85 प्रतिशत तक न्यूरलटेस्ट डिफेक्ट्स का पता लगाया जा सकता है।
यह कितना सुरक्षित है: -अल्ट्रासाउंड और ब्लड टेस्ट में कोई दर्द नहीं होता। इससे मां या शिशु को भी कोई खतरा नहीं है।
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