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रंग जो छूटे नाहि – गृहलक्ष्मी कहानियां

अरे भाई, जरा ठीक से रिक्शा चलाओ न। क्या सामान समेत नीचे ही गिरा दोगे। रिक्शा वाला बोला, हम क्या करें, रास्ते में इतने गड्ढे हैं कि झटके तो लगेंगे ही। वो बड़ी मुश्किल से बैठ पा रही थी, कभी अपना बैग तो कभी अपनी अटैची सम्भालती। इतना तो विदेश से कानपुर आने में नही परेशान हुई जितना कि अपनी गली में आने से थक गयी और झुंझलाते हुए बोली कि हद हो गयी, इतने सालों बाद कुछ भी नहीं बदला।

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सीख अनकही – गृहलक्ष्मी कहानियां

पति सोमेश के एक हफ्ते के टूर पर जाते ही पूनम ने भी अपना मन मायके में जाने का बना लिया, क्योंकि दोनों बच्चे भी समर कैैंम्प के लिये गये हुए थे। मन इतना खुश था कि रात को ही मां को फोन करके अपने आने की सूचना भी दे दी।

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बुआ फिर आना – गृहलक्ष्मी कहानियां

छोटी सी मिनी पर इतना सारा पढ़ाई का बोझ, उसपर टीचर और मां की डांट। घर आई मिनी की बुआ ने ऐसा क्या किया कि हमेशा उदास रहने वाली मिनी अब खिलखिलाती रहती। कभी बुआ से कहानी सुनती तो कभी उन्हें कविता सुनाती…

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बिना छांव का दरख़्त – गृहलक्ष्मी कहानियां

अनु जरा जल्दी जल्दी हाथ चला, मुझे देर हो रही है। हां मम्मी, बस काम खत्म होने वाला है , मैंने सब्जी काट दी और किचेन का सारा काम भी निबटा दिया है।

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मुफ्तखोरी की महिमा – गृहलक्ष्मी कहानियां

कई बार तो मुफ्त में मुंह की खानी पड़ती है। मुफ्त में दिमाग खाने वाले हर जगह उपलब्ध हैं। कल ही महंगाई कहने लगी, ‘मैं जान दे दूंगी, पर ठंडे चूल्हे पर आंच नहीं आने दूंगी’, महंगाई की इस जिद का भी मुफ्तखोरी पर कोई असर नहीं दिखता।

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सेवा का सुख – गृहलक्ष्मी कहानियां

पति की मृत्यु के बाद नीलाद्रि के सामने समस्या थी कि वह अपना जीवन अकेले कैसे व्यतीत करे। उसके एक बड़े निर्णय ने उसकी सारी समस्या ही हल कर दी। 

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मां का श्राप – गृहलक्ष्मी कहानियां

रात के करीब डेढ़ बज रहे थे कस्बे में गहन सन्नाटा छाया हुआ था लेकिन सावित्री के घर से बच्चे के रोने की आवाजें लगातार आ रही थीं। बिजली चली गई थी सावित्री ने मिट्टी के तेल की लालटेन जला दी, मगर उसके तीन महीने के मुन्ने का रोना बंद नहीं हो रहा था सावित्री ने बच्चे को चुप कराने का हर संभव प्रयास किया मगर सब बेकार ही रहा।

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पत्नीजी का ‘ऑड-ईवन’ फार्मूला – गृहलक्ष्मी कहानियां

हम पतिधर्म निभाते हुए सुनते रहे। लाचारी में कोई विकल्प होता भी नहीं। नए सिस्टम के अनुसार सोम, बुधवार, शुक्रवार को किचन की जिम्मेदारी पत्नीजी पर और मंगल, बृहस्पति, शनिवार को हमारी। नहीं पता, मेरे हिस्से सम आया या विषम, लेकिन सुनते ही कंपकंपी छूट गई।

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वसीयत और वारिस – गृहलक्ष्मी कहानियां

रमन के इनकार ने काव्या को चिंतित कर दिया था। वह यही सोच कर परेशान थी कि अब वह वसीयत उसके वारिस तक कैसे पहुंचा पाएगी। आखिर क्या थी वसीयत की पहेली और काव्या का बदला…

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सवालों के दायरे में जिंदगी – गृहलक्ष्मी कहानियां

सुनयना कॉलेज से आई ही थी कि घर की हालत देखकर परेशान हो गई। अस्त-व्यस्त पड़ा सामान, नौकरानी के ना आने की चुगली कर रहा था। थकी मांदी सुनयना को गुस्सा तो बहुत आया। किचन में गई तो वॉश बेसिन में पड़े झूठे बर्तन जैसे उसे चिढ़ा रहे थे। इसका मतलब राधा आज भी नहीं आई थी। सुनयना के कॉलेज में सुबह जल्दी क्लासेज होती थी। दोपहर में घर आकर खाना बनाने का मूड ही नहीं होता था। गुस्से को शांत कर अब वह काम में जुट गई। फ्रीज से ब्रेड निकालकर नाश्ते से ही काम चला लिया। कॉलेज की सर्विस आसान थोड़े ही थी। लेक्चर तैयार करने के लिए स्टडी करने में ही वह थक जाती थी।

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