गृहलक्ष्मी की लघुकथा प्रतियोगिता में हमें ढेरों लघुकथाएं प्राप्त हुई हैं जिनमें से हमने झांसी की मनिकना मुखर्जी की इस कहानी का चयन किया है।
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मेरी बेटी मेघा – गृहलक्ष्मी कहानियां
सारे विकल्प समाप्त हो चुके थे। अब तो मात्र निर्णय लेना था। किसी की सुनी-सुनाई बात नहीं थी। सुनी-सुनाई पर विश्वास भी नहीं किया कभी। आंखों देखी घटना थी। सब ठीक चल रहा था। कम से कम मेरे हिसाब से। दस वर्ष विवाह को हो चुके थे। एक प्यारी सी 8 वर्ष की बेटी थी। अच्छी नौकरी थी। घर में ऐसी कोई कमी न थी कि किसी मजबूरी के तहत कोई अनुचित कदम उठाना पड़े। कमी होती तो शायद ऐसा न होता।
मूल्याकंन – गृहलक्ष्मी कहानियां
एक कस्बा था और वहां एक लोकप्रिय नृत्यागंना रहती थी। हालांकि उसका नृत्य उच्च कोटि का तो नहीं था फिर भी होली- दीवाली छठे चैमासे उसको बुलावा आ ही जाता था और वह अपने प्रस्तुति दिया करती थी। नृत्यागंना क्योंकि कस्बे में रहती थी इसलिए उसे हर जगह एक सा ही मानदेय मिलता था। कहीं भी बढ़कर कुछ नहीं।
गृहलक्ष्मी की कहानियां : पौत्र जन्म की खुशियां
पत्नी मुक्त मन से पैसा लुटाने में लगी थी। मैंने उसे समझाया था कि वह पौत्री को ही बेटा मान लें, बावजूद उसके भीतर तमन्नाएं उछालें मार रही थीं कि इस बार तो पौत्र ही हो।
गृहलक्ष्मी की कहानियां : नई राह
गृहलक्ष्मी की कहानियां : एक दिन दोपहर के समय फोन की घन्टी बजी, हेलो- रोहित का गम्भीर एक्सीडेन्ट हो गया है। रोहित के पिता ने बड़ी गम्भीर आवाज़ में कहा। हाथ तो उम्र के कारण कांपते ही थे दादा जी के हाथ से रिसीवर गिर कर झूलने लगा। और दादा जी वही घम्म से गिर […]
मां की सीख – गृहलक्ष्मी कहानियां
एक कबूतर ने बालकनी में रखे शू रैक में दो अंडे दिए थे। मां की लाख हिदायतों के बावजूद रिशू और पम्मी वहां बार-बार जाकर देखते कि अंडों से चूजे निकले हैं या नहीं। अचानक एक दिन रिशु की नजर काले बिलौटे पर पड़ी, उसने उसे तुरंत भगा दिया और पम्मी को बताया। यह सुनकर पम्मी भी चिंतित हो गई।
भेदभाव – गृहलक्ष्मी कहानियां
एक तालाब में खूबसूरत मछलियों के साथ मेंढक भी रहते थे। कुछ छोटी मछलियों को छोड़ कर अधिकांश मछलियां मेंढकों को हेय दृष्टि से ही देखती थीं
डर सबको लगता है – गृहलक्ष्मी कहानियां
सुबह की खिलती धूप चारों तरफ फैली हुई थी। गायत्री खिड़की के पास खामोश बैठी शून्य में कुछ निहार रही थी। तभी उसकी निगाहें सड़क पार गिफ्ट हाउस में आते-जाते ग्राहकों पर पड़ी। गायत्री जब भी डिप्रेशन में होती तो सामने वाली शाॅप की तरफ देखती और सोचती कि इसमें आने-जाने वाले लोग किसी-न-किसी के लिए कोई उपहार खरीद रहे हैं और तब उसे लगता है कि दुनिया में आज भी प्यार भरा हुआ है।
कलूटी – गृहलक्ष्मी कहानियां
एक रेलवे प्लेटफार्म जिसमें दूर-दूर तक सिर्फ खामोश दूरियों का अहसास करातीं पटरियां थीं और दिन भर उस सन्नाटे को तोड़ती रेलगाड़ियों की छक-छक की तेज आवाज। दिन भर में उस प्लेटफार्म में कई घण्टों के अंतराल पर मात्र तीन या चार गाड़ियां रुकती थीं, दूसरी सभी सीधी निकल जातीं।
परिणति – गृहलक्ष्मी कहानियां
दर्शन पढ़ाते-पढ़ाते वह ‘स्थित’ प्रज्ञ हो चुकी थी। वो दशा जिसमें ना कोई कामना-तृष्णा मन को भटका सकती है और ना ही कोई सुख-दुःख उसके प्रण को डिगा सकते हैं। स्वनियंत्रण इसी को कहते हैं। इसी पर तो सुधा को गर्व था। जो कुछ उसने भुगता था शायद उसकी परिणति भी यही होनी थी।
