माया को उसके सास-ससुर बात-बात पर ताने मारते। उसका पति तो उसे अधिक दहेज न लाने के कारण रोज तानों के साथ-साथ थप्पड़-मुक्के भी मारने लगा। माया की सुबह गलियों से शुरू होती और शाम लात-घूसे लेकर आती। ये सब सहना तो माया की अब नियति बन गया था। रोज-रोज की दरिंदगी को सहते-सहते माया के आंसू सूख चुके थे…
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सपनों की उड़ान – गृहलक्ष्मी कहानियां
बचपन से एक सपना था, आईआईटी में एडमिशन लेने का, एक विश्वास कि- हां! कुछ करना है। इस विश्वास ने कब जुनून का रूप ले लिया, इसका मुझे खुद भी पता नहीं चला।
नम्मो की शादी – गृहलक्ष्मी कहानियां
जब भी मैं नम्रता की कहानी सुनाना चाहता हूं, कलेजा मुंह को आ जाता है यह भी समझ नहीं आता कि कहां से शुरू करूं पता नहीं वह ऊपर वाला ऐसी निष्ठुर कहानियां रचता कैसे है। क्या पत्थर का दिल है उसका ! आज मैंने मन कड़ा करके यह निश्चय कर लिया है कि आपको नम्मो की कथा सुनाकर ही रहूंगा।
पतझड़ – एक मां ऐसी भी – गृहलक्ष्मी कहानियां
पेड़ का आखिरी पत्ता भी गिर गया था कल। ठूंठ रह गया था आज ,जिसका सूखना तय है। सूखने के बाद लड़की का इस्तेमाल लोग चाहे जिस रूप मे कर सकते हैं। जब तक हरा – भरा था अनगिनत पक्षियों का बसेरा बना, उनके तथा मोहल्ले के बच्चों का क्रीड़ास्थल बना। सावन मे स्त्रियों का झूला लगता था, शाम मे पुरुषों का चर्चा स्थल बनता था।
आशाओं का सूरज – गृहलक्ष्मी कहानियां
महेश एक बहुत ही होनहार और बुद्धिमान बालक था। उसमें सीखने और जानने की अद्भुत ललक थी। उसके हाथों में तो मानो जादू था। वह अपने चित्रों में प्राण डाल देता था। उसके अध्यापक उसकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। वह सुबह स्कूल आने से पहले मंदिर अवश्य जाता था ।
जै हो गैया मैया की – गृहलक्ष्मी कहानियां
शहर की स्वच्छता को चार-चांद लगाते उस सिविल अस्पताल के पिछवाड़े में खाने लायक कुछ ढूंढने वह वह रोज वहां आती थी। वह आती और बड़ी दिलेरी से रोगियों की जूठन या फिर फलों के सड़े गले छिलके तक खाने में वह गुरेज न करती और उस ढेर पर चढ़ती चली जाती, एक ही झटके में, देश के स्वास्थ्य नियमों को ठेंगा दिखाने की नीयत से शायद। इंजेक्शन की सुईयां तो रोगी तक को नहीं चूकती तो फिर उसके नंगे नखों को छलनी करने से क्योंकर कतराती?
गृहलक्ष्मी की कहानियां : नियति
शादी के बाद से ही परित्यक्ता का जीवन व्यतीत कर रही माधवी के पति ने जब वापसी की इच्छा व्यक्त की तो माधवी और उसके बेटे ने जो निर्णय किया, उस पर उसे गर्व था…
गृहलक्ष्मी की कहानियां : अंतर्द्वंद
आज सुबह से ही विभा का दिल बहुत बेचैन था। रह रह कर उसे कुछ अनजाना सा भय सता रहा था। जैसे तैसे करके उसने अपना सारा काम निपटाया और छुट्टी का समय होते ही घर के लिए निकलने की तैयारी करने लगी।
अचार के मर्तबान – गृहलक्ष्मी कहानियां
सड़क के दोनों ओर लगे आम के पेड़ देख मेरा मन गाड़ी की रफ्तार से भी तेज दौड़ने लगा। एकाएक बचपन की यादों में पहुंच गई… कहीं से मां की आवाज भी सुनाई देने लगी। जून का महीना आते-आते जरा भी आंधी-तूफान आ जाए तो उसे देख खिड़की दरवाजे बन्द करती जातीं और तेज-तेज आवाज में बोलना शुरू हो जाता, हाय..! कैसा तेज आंधी-तूफान आने वाला है। हवा के चलते मुए सारे आम तो गिरने लगेंगे। सारी डाल बिना आम के खाली होने लगेगी।
