भारत का गुणगान-गृहलक्ष्मी की कविता
Bharat ka Gungaan

Independence Hindi Poem: भारत की इस पावन धरा की, क्या सुनायें दास्तां,
मेरे वतन प्यारे वतन शत् शत् नमन तुमको सदा।

करता हिफाज़त हिमपति,जो हिंद का सिरमौर है‌‌।
पावन बहे भागीरथी, धरती पे जैसे स्वर्ग है।
सागर पखारे नित् चरण,गोदी मे कुदरत की बसा।
ऐसे शिरोमणि देश की,हम क्या सुधारें दास्तां।

जाति धर्म का भेद ना, रहते हैं सब मिलकर यहां।
मन्दिर में हो नित् आरती, मस्जिद में भी होती अजांँ।
खुशहाली चारो ओर है,धन धान्य हर इंसान यहां।
अखण्डता, सौहार्द की,हम क्या सुनायें दास्तां।

श्री राम की भूमि है और श्री कृष्ण का यह धाम है।
श्रवण और गौतम बुद्ध से बेटों का जग में नाम है।
माटी भी है चन्दन जहां, ईश्वर है कण कण मे रमांँ।
देवों की इस पावन धरा की क्या सुनायें दास्तां।

गांधी, सुभाष और भगत से जन्मे यहां रणबांकुरे।
जज़्बा लिए आज़ादी का, जो देश पर ही मर मिटे।
जय हिन्द का नारा लगाती है यहां हर एक जुबांँ।
वीरों की इस दीवानगी की क्या सुनायें दास्तां।

गुरुओं की होती अर्चना, माता पिता की बन्दगी।
तपोभूमि है ऋषियों की यह धरती है गीता ज्ञान की।
सोने की चिड़िया कह पुकारा है इसे सारा जहांँ।
तुलसी कबीरा के लगन की क्या सुनायें दास्तां।

यह मातृभूमि है मेरी इस पर मुझे अभिमान है।
इसके जो काम आये हमारी जान भी कुर्बान है।
यशगान हो मांँ भारती का हो सदा ही वन्दना।
इस कर्मभूमि, जन्मभूमि को नमन मेरा सदा।

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