suhagna
suhagna

लगभग दस दिनों से सीमा पर गोलीबारी चल रही थी।बहुत थी नाजुक स्थिति हो गई थी, भारत और पाकिस्तान के बीच कभी भी युद्ध हो सकता था।
शशांक से अंतिम बार बात हुई तो वह ढांढ़स बंधाते हुए भी रो पड़ा था।“शालू, बाबूजी को संभाल लेना प्लीज, बच्चों को प्यार देना और हमारा पुश्तैनी घर तुम्हारी भरोसे ही है। खेती-बाड़ी सब कुछ तुम देख लेना।
अगर भाग्य होगा तो मिलेंगे नहीं तो अगले जन्म में…!!” नहीं चाहते हुए भी शशांक रोने लगा तो शालू भी फूट-फूट कर शालू रो पड़ी थी।
उसने शशांक को यह भी नहीं बताया था कि उसके पिता हॉस्पिटलाइज थे।
जब से भारत और पाकिस्तान के बीच की तनाव की खबर आ रही थी, उनका ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर दोनों हाई हो गया था।
जिसके कारण शरीर का बायां अंग सुन्न हो गया था और वह पक्षाघात के शिकार होकर अस्पताल में भर्ती थे।
घर परिवार,सभी ने मना किया था कि शशांक को इस बात की जानकारी मत दो। वह तनाव में आ जाएगा।
वह वैसे भी टेंशन में ही जी रहा है ।
शालू ने शशांक से यही कहा “सब कुछ ठीक है। बाबूजी भी ठीक हैं और बच्चे भी।तुम टेंशन मत लो।”
शालू की आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, ना तो वह अपने बीमार ससुर से शशांक की बात बता सकती थी और न ही शशांक को उसके ससुर के बारे में!
शशांक ने फोन रख दिया, फिर
शालू ने अपनी आंखों से आंसू पोंछा और किचन में चली गई।
उसेजल्दी-जल्दी खाना बनाना था। दोनों बच्चे स्कूल से आने वाले थे फिर ससुर के पास टिफिन लेकर अस्पताल जाना था। खाना बनाने के बाद बच्चों को खिला-पिला कर पड़ोसन को बोलकर वह ससुर का टिफिन लेकर अस्पताल चली गई।
उसके ससुर रमाकांत जी अस्पताल के बेड पर पड़े हुए थे।उनकी आंख खुली हुई थी। वह टकटकी लगाकर दरवाजे की ओर देख रहे थे।
जैसे ही शालू से नजरें मिलीं उन्होंने आंखों से ही प्रश्न किया।
आंखों आंखों में हुए प्रश्न को समझकर शालू ने रमाकांत जी से कहा “बाबूजी सब कुछ ठीक है।शशांक का फोन आया था।
वह जिस कैडेर में है वहां कोई खतरा नहीं है। सिर्फ अभी छुट्टी नहीं मिल सकती।
आप चिंता मत कीजिए। शशांक बहुत ही जल्दी लौट आएंगे।”
जबरदस्ती मुस्कुराते हुए उसने अपने साड़ी के पल्लू से आंखों के कोर को पोंछ लिया और फिर मुस्कुराते हुए अपने ससुर का खाना निकलते हुए कहा “आप जल्दी से खा लीजिए नहीं तो वह फिर मुझे डांटने लगेंगे कि तुम बाबूजी का ख्याल क्यों नहीं रखती हो?”
रमाकांत जी साफ बोलने में असमर्थ थे क्योंकि उनका मुंह टेढ़ा हो चुका था, जुबान ऐंठी हुई थी तो वह जो कुछ बोलते वह साफ-साफ नहीं निकलता था।
वह तोतली भाषा में इशारा करते हुए “बहू मुझे घर जाना है।”
“हां बाबूजी! शालू उनकी हर बात समझ जाती थी,हम जल्दी ही वापस घर चलेंगे बाबूजी। आप चिंता मत कीजिए।
देखते ही देखते अस्पताल वाले आपको छुट्टी दे देंगे फिर हम घर चलेंगे।
रोहन और दीपक दोनों बेसब्री से आपका इंतजार कर रहे हैं और फिर यह भी तो छुट्टी लेकर आ जाएंगे ना!”
अपने ससुर को खाना खिलाने के बाद उन्हें उनके मुंह पोंछकर हाथ मुंह धुला कर उन्हें वापस बिस्तर पर लेटा दिया।
रात में दवा खिलाने के बाद वह घर लौट आई।
बहुत ही अस्तव्यस्त जिंदगी हो गई थी।
रमाकांत जी ऊपर से ठीक दिखते थे लेकिन उनकी तबीयत ठीक नहीं थी।
डॉक्टर ने छुट्टी देने से इनकार कर दिया था। उनका कहना था
“रमाकांत जी के को किसी भी तरह से टेंशन मत दीजिए नहीं तो कुछ भी हो सकता है। उनकी स्थिति बहुत ही नाजुक है।”
लगभग एक हफ्ता इसी रूटीन में बीत गया था।
कहीं से कोई अच्छी खबर नहीं आ रही थी। जब भी शालू टीवी ऑन कर करती तो भारत पाकिस्तान के तनाव की खबरें मुंह चिढ़ातीं रहतीं।
वह डरकर टीवी बंद कर दिया करती।
फोन भी बंद कर दिया करती, ना जाने कब कौन सी मनहूस खबर उसे सुनाई दे दे।

शशांक का फोन आ नहीं रहा था क्योंकि वह अभी सियाचिन बॉर्डर पर था।वहां नेटवर्क रहता ही नहीं तो फोन आने का सवाल ही नहीं था।
दूसरे दिन शालू सो कर उठी। बच्चों को स्कूल भेजने के बाद वह जल्दी से किचन में गई और जल्दी-जल्दी खाना बनाने लगी।

इसी बीच इसका मोबाइल घनघनाने लगा। वह खाना बनाना छोड़ जल्दी-जल्दी भागती हुई आई।
“ हेलो! बोलने से पहले उधर से आवाज आई “आप मिसेज शर्मा बोल रही हैं ?”
“जी जी..!”
“मैं शशांक का दोस्त बोल रहा हूं।मेरा नाम राघव है। अचानक आए हुए एक बहुत ही बड़े एवलॉन्च में शशांक और बहुत सारे लोग लगभग 25 जवान बर्फ के अंदर दफन हो गए हैं।
अब उन्हें निकालने का काम चल रहा है आप भगवान से प्रार्थना कीजिए सब कुछ सही हो, नहीं तो कुछ भी हो सकता है!”

“हे भगवान यह क्या हो गया! यह कैसी मनहूस खबर है?” शालू फोन पर ही जोर से चीखती हुई रोने लगी।
“आप अपने आप को संभालिए मैडम!उधर से कुछ और आती आवाज डिस्कनेक्ट हो गई।
शालू को कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। वह मोबाइल हाथ में लिए जोर जोर से रो रही थी।
अकेला घर, दीवारें काटने को दौड़ रहीं थीं। शालू अपना हाथ सिर पर रखे फूटफूटकर रो रही थी।
“अब क्या होगा? उसके ससुर की क्या गति होगी !वह अपने बेटे को जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं।उसकी डेड बॉडी कैसे देख पाएंगे और मरने की खबर कैसे सुन पाएंगे?
और फिर उसका और उसके बच्चों का क्या होगा?”
बहुत देर तक वह रोते रही। पुरानी बातें उसके आगे चलचित्र से दौड़ने लगी।
जब उसके पिता ज्योति प्रकाश के जिगरी दोस्त रमाकांत जी अपनी पत्नी के साथ सुलोचना के साथ उसके पिता के घर आए थे।
उन्होंने शालू का हाथ मांगते हुए कहा था “यह मेरे घर की दीपक है। मेरे घर की ज्योति, हमेशा ही रोशनी फैलाएगी। मुझे इस दे दो हमारे बेटे से शशांक के लिए।”
जब वह शशांक के साथ सात फेरे लेकर उसकी पत्नी बनकर उसके घर में आई थी तब रमाकांत जी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा था “अखंड सौभाग्यवती रहो बिटिया! हमेशा ही प्रकाश बिखेरते रहना।
अपनी मुस्कुराहट से इस घर की हर बगिया को सींचते रहना।
तुम पर मुझे बहुत ही ज्यादा भरोसा है।”
शालू ने आज तक उनका भरोसा कभी नहीं तोड़ा था।
“,,, और मैं आज भी उनका भरोसा नहीं तोडूंगी।
ना जाने फिर शशांक इस दुनिया में हैं भी या नहीं पर मैं उनके नाम का सिंदूर नहीं पोछूंगी!”
वह जल्दी से स्नान कर आई। आईने के सामने तैयार होकर अपने पूरे मांग में सिंदूर भरकर माथे पर गोल बिंदी लगाई और पूजा कर जल्दी-जल्दी बच्चों को खाना खिलाया। उसने किसी से कुछ भी नहीं बताया और फिर अपने ससुर के लिए टिफिन लेकर चली गई।
आज भी रमाकांत जी दरवाजे पर टकटकी लगाकर देख रहे थे।
उसके अंदर घुसते ही हुआ हल्के से मुस्कुरा कर बोले आंखों से इशारा कर पूछा हमेशा की तरह ।
शालू ने फिर से झूठ कहा” बाबूजी, शशांक बिल्कुल ठीक है। उनके दोस्त का फोन आया था उनके कैडर पर कोई खतरा नहीं है!”
शालू की बात सुनकर रमाकांत जी धीमे से मुस्कुरा दिए जैसे कि शालू की नब्ज और हृदय की गति सब कुछ सुन रहे हों और जान रहे हों ।
शालू उनसे नज़रें चुरा रही थी। वह जल्दी से खाना निकाल उन्हें खिलाने लगी।
अंतिम कौर खिलाने के बाद उन्होंने शालू का हाथ पकड़ लिया और कहा
“ तुम्हारी सास के गुजर जाने के बाद एक पल भी मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं अकेला हो गया हूं।
मुझे बच्चे की तरह तुमने पाला है बिटिया! मेरी सांस का भरोसा नहीं कब टूट जाए! तुम अकेली कैसे रहोगी !
मैंने सारा घर तुम्हारे नाम कर दिया है।बैंक बैलेंस और सब कुछ मेरे मरने के बाद तुम्हें मिल जाएगा !”
उन्होने एक फाइल तकिए के नीचे से निकाल कर उसे देते हुए कहा।
“बाबूजी यह सब क्या है?”

“बिटिया तुम नहीं कहोगी तो क्या मुझे पता नहीं चलेगा?तुम्हारे चेहरे के एक एक भाव मैं पकड़ लेता हूं।
भले ही मैं तुम्हारा सगा पिता नहीं लेकिन जब मैं तुम्हें अपनी बेटी बनाकर लाया हूं,बेटी ही मानता हूं तो तुम्हारी एक-एक मुस्कुराहट तुम्हारा एक एक पल का चेहरा मैं पढ़ लेता हूं।
तुम इतने दिनों से मुझसे झूठ बोलती आई हो, मुझे जिंदा रखने के लिए!”

“ बाबू जी…!!! शालू ने अपनी जुबान को बहुत ही मुश्किल से संभाला। वह चुप हो गई कि कहीं वह कमजोर नहीं पड़ जाए।

“तुम्हारे ऊपर चार चार जिम्मेदारियां हैं।इनको निभाते हुए कहीं तुम टूट ना जाओ।
मैंने तुमसे पहले भी कहा था बहू तुम एक ज्योति हो। तुम घर के कोने-कोने में प्रकाश भर सकती हो।
तुमने भर भी दिया और उसी प्रकार से मेरा पूरा घर महक रहा है !!अखंड सौभाग्यवती रहो मेरी बच्ची!! तुम्हारे माता-पिता का कर्ज मैं कभी नहीं उतार पाऊंगा,बस तुम्हें यह आशिर्वाद दे रहा हूं।”

“बाबूजी यह क्या आशीर्वाद दे दिया आपने !!”शालू बोलते बोलते चुप हो गई।
“शशांक ठीक है ना बेटी?”
“हां बाबूजी वह बिल्कुल ठीक हैं!”शालू बिलख उठी बच्चों की तरह!
रमाकांत जी उठकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले” रो नहीं बिटिया नहीं तो तुम्हारी तबीयत खराब हो जाएगी।”

“आप ठीक कहते हैं बाबूजी मैं नहीं रोउंगी।”
“आज जरा बच्चों को लेकर आओ। बड़ा दिन हो गया है उन दोनों को देखे हुए।”

“ठीक है बाबूजी, अभी लेकर आती हूं।”

शालू वापस लौट कर दोनों बच्चों को लेकर आ गई।
रमाकांत जी उन दोनों के सिर पर हाथ फेरते हुए उन्हें भी ढेर सारा आशीर्वाद दिया।
अब तुम लोग घर लौट जाओ।रात हो गई है।
कल सुबह आना।”
“ठीक है बाबू जी ! आप अपना ख्याल रखना।”शालू बच्चों को लेकर घर लौट आई।

रात में ही आर्मी हेडक्वार्टर से फोन आया “शशांक के साथ कई लोगों को बचा लिया गया है लेकिन उनकी स्थिति बहुत ही खराब है।
उन्हें वेंटिलेटर में रखा गया है 24 घंटे के बाद उनकी स्थिति का पता चलेगा।
शालू के चेहरे पर हर्ष मिश्रित दुख की मुस्कुराहट आ गई थी।
उसे यकीन था उसके बाबूजी का आशीर्वाद बेकार नहीं जाएगा।
अब डॉक्टरों ने उन्हें अस्पताल से छुट्टी देने का मन बना लिया था।
बड़ी मुश्किल से 24 घंटे कटे।
फिर से हेडक्वार्टर से फोन आया शशांक खतरे से बाहर है बस कुछ दिनों तक आईसीयू में रहना पड़ेगा।
शालू खुशी से चीख उठी।
“बाबूजी आपका शशांक लौट आया है!मरकर भी जिंदा है वो!”
आज रमाकांत जी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी।
जैसे ही वह घर पर आए शालू ने आरती की थाल लेकर उनका स्वागत किया।
अपने चिर परिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए रमाकांत जी ने उसे आशीर्वाद दिया
“अखंड सौभाग्यवती भव!दूधो नहाओ पूतों फलो!”
शालू ने झुक कर उनके पैर छू लिए।