निर्मला-मुंशी प्रेमचंद भाग - 24

मुंशीजी ने हाथ छुड़ाकर कहा – तुम भी कैसी बच्चों की सी जिद कर रही हो! दस हजार का नुकसान ऐसा नहीं है जिसे मैं यों ही उठा लूं। मैं रो नहीं रहा हूं पर मेरे हृदय पर जो बीत रही है, वह मैं ही जानता हूं।

वह तेजी से कमरे से निकल आये और थाने पर जा पहुंचे। थानेदार उनका बहुत लिहाज करता था। उसे एक बार रिश्वत के मुकदमे से बरी करा चुके थे। उनके साथ ही तफतीश करने आ पहुंचा। नाम था अलायार खां।

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शाम हो गई थी। थानेदार ने मकान के अगवाहे-पिछवाड़े घूम-घूमकर देखा। अन्दर जाकर निर्मला के कमरे को गौर से देखा। ऊपर की मुंडेर की जांच की। मुहल्ले के दो-चार आदमियों से चुपके-चुपके कुछ बातों की, और तब मुंशीजी से बोले – जनाब, खुदा की कसम, यह किसी बाहर के आदमी का काम नहीं। खुदा की कसम, अगर कोई बाहर का आदमी निकले, तो आज से थानेदारी करना छोड़ दूं। आपके घर में कोई मुलाजिम तो ऐसा नहीं है, जिस पर आपको शुबहा हो?

मुंशीजी – घर में तो आजकल सिर्फ एक महरी है।

थानेदार – अजी, वह पगली है। यह किसी बड़े शातिर का काम है, खुदा की कसम!

मुंशीजी – तो घर में और कौन है? मेरे दोनों लड़के हैं, स्त्री और बहिन है! उनमें से किस पर शक करूं?

थानेदार – खुदा की कसम, घर ही के किसी आदमी का काम है, चाहे वह कोई हो। इंशाअल्लाह, दो-बार दिन में मैं आपको इसी खबर दूंगा। यह तो नहीं कह सकता कि माल भी सब मिल जायेगा; पर खुदा की कसम, चोर को जरूर पकड़ दिखाऊंगा।

थानेदार चला गया, तो मुंशीजी ने आकर निर्मला से उसकी बातें कहीं। निर्मला सहम उठी आप थानेदार से यह कह दीजिए, तफ्तीश न करें, आपके पैरों पड़ती हूं।

मुंशीजी – आखिर क्यों?

निर्मला – अब क्या बताऊं! वह कह रहा है कि घर ही के किसी आदमी का काम है।

मुंशीजी – उसे बकने दो।

जियाराम अपने कमरे में बैठा हुआ भगवान को याद कर रहा था। उसके मुंह पर हवाइयां उड़ रही थी। सुन चुका था कि पुलिस वाले चेहरे से भांप जाते हैं। बाहर निकलने की हिम्मत न पड़ती थी। दोनों आदमियों में क्या बातें हो रही हैं, यह जानने के लिए छटपटा रहा था। ज्यों ही थानेदार चला गया और भूंगी किसी काम से बाहर निकली, जियाराम ने पूछा – थानेदार क्या कह रहा था भूंगी?

भूंगी ने पास आकर कहा – थानेदार कहता था, घर ही के किसी आदमी का काम है; बाहर का कोई नहीं है।

जियाराम – बाबूजी ने कुछ नहीं कहा?

भूंगी – कुछ तो नहीं कहा; खड़े ‘हूं-हूं करते रहे। घर पर भूंगी ही गैर है, न और तो सब अपने ही हैं।

जियाराम – मैं भी तो गैर हूं, तू ही क्यों?

भूंगी – तुम गैर काहे हो भैया।

जियाराम बाबूजी ने थानेदार से कहा – नहीं, घर में किसी पर उनका शुबहा तो नहीं है।

भूंगी – कुछ तो कहते नहीं सुना। बेचारे थानेदार ने भले ही कहा – भूंगी तो पगली है, वह क्या चोरी करेगी; बाबूजी तो मुझे फंसाए ही देते थे।

जियाराम – तब तो तू भी निकल गयी। अकेला मैं ही रह गया। तू ही बता, तूने उस दिन घर में देखा था?

भूंगी – नहीं भैया, तुम तो ठेठर देखने गये थे।

जियाराम – गवाही देगी न?

भूंगी – यह क्या कहते हो भैया? बहूजी तफ्तीश बन्द करा देंगी।

जियाराम – सच?

भूंगी – हां भैया, बारबार कहती है कि तफ्तीश न कराओ। गहने गये, जाने दो, पर बाबूजी मानते नहीं।

पांच-छह दिन तक जियाराम ने भोजन नहीं किया। कभी दो-चार कौर खा लेता, कभी कह देता, भूख नहीं है। उसके चेहरे का रंग उड़ा रहता था रातें जागते कटतीं, प्रति क्षण थानेदार की शंका बनी रहती थी। यदि वह जानता कि मामला इतना तूल खींचेगा, तो कभी ऐसा काम न करता। उसने तो समझा था, किसी चोर पर शुबहा होगा! मेरी तरफ किसी का ध्यान भी न जायेगा; पर अब भण्डा फूटता हुआ मालूम होता था। अभागा थानेदार जिस ढंग से छानबीन कर रहा था, उससे जियाराम को बड़ी शंका हो रही थी।

सातवें दिन संध्या समय जियाराम घर लौटा, तो बहुत चिंतित था। आज तक उसे बचने की कुछ-न-कुछ आशा थी। माल अभी तक कहीं बरामद न हुआ था; पर आज उस माल के बरामद होने की खबर मिल गई थी। इसी दम थानेदार कांस्टेबिल को लिए आता होगा। बचने का कोई उपाय नहीं। थानेदार को रिश्वत देने से सम्भव है, मुकदमें को दबा दे। रुपये हाथ में थे। पर क्या बात छिपी रहेगी? अभी माल बरामद नहीं हुआ, फिर भी सारे शहर में अफवाह थी कि बेटे ने माल उड़ाया है। माल मिल जाने पर तो गली-गली बात फैल जायेगी। वह फिर किसी को मुंह न दिखा सकेगा।

मुंशीजी कचहरी से लौटे तो बहुत घबराए हुए थे। सिर थामकर चारपाई पर बैठ गए। निर्मला ने कहा – कपड़े नहीं उतारते? आज तो और दिनों से देर हो गई है।

मुंशीजी – क्या कपड़े उतारूं? तुमने कुछ सुना?

निर्मला – क्या बात है? मैंने तो कुछ नहीं सुना।

मुंशीजी – माल बरामद हो गया। अब जिया का बचना मुश्किल है।

निर्मला को आश्चर्य नहीं हुआ। उसके चेहरे से ऐसा जान पड़ा; मानो उसे यह बात मालूम थी। बोली – मैं तो पहले ही कह रही थी कि थाने इत्तला मत कीजिए!

मुंशीजी – तुम्हें जिया पर शक था?

निर्मला – शक क्यों नहीं था, मैंने उन्हें अपने कमरे से निकालते देखा था।

मुंशीजी – फिर तुमने मुझसे क्यों न कह दिया?

निर्मला – यह बात मेरे कहने की न थी, आपके दिल में जरूर ख्याल आता कि यह ईर्ष्यावश आक्षेप लगा रही है। कहिए, यह ख्याल होता या नहीं? झूठ न बोलिएगा।

मुंशीजी – संभव है, मैं इंकार नहीं कर सकता। फिर भी उस दशा में तुम्हें मुझसे कह देना चाहिए था। रिपोर्ट की नौबत न आती। तुमने अपनी नेकनामी की तो फिक्र की, पर यह न सोचा कि परिणाम क्या होगा। मैं अभी थाने से चला आता हूं। अलायार खां आता ही होगा। निर्मला ने हताश होकर पूछा – फिर अब?

मुंशीजी ने आकाश की ओर ताकते हुए कहा – फिर जैसी भगवान की इच्छा! हजार-दो हजार रुपये रिश्वत देने के लिए होते, तो शायद मामला दब जाता; पर मेरी हालत तो तुम जानती हो। तकदीर खोटी है, और कुछ नहीं। पाप तो मैंने किए हैं, दण्ड कौन भोगेगा? एक लड़का था, उसकी वह दशा हुई, दूसरे की यह दशा हो रही है। नालायक था, गुस्ताख था, कामचोर था, पर था तो अपना ही लड़का, कभी-न-कभी चेत ही जाता। यह चोट अब न सही जायेगी।

निर्मला – अगर कुछ दे दिलाकर जान बच सके, तो मैं रुपये का प्रबन्ध कर दूं।

मुंशीजी – कर सकती हो? कितने रुपये दे सकती हो?

निर्मला – कितना दरकार होगा?

मुंशीजी – एक हजार से कम में तो शायद बातचीत न हो सके। मैंने एक मुकदमें में उससे 1000 रु लिये थे। वह कसर आज निकालेगा।

निर्मला – हो जायेगा। अभी थाने जाइए।

मुंशीजी को थाने में बड़ी देर लगी। एकान्त में बातचीत करने का बहुत देर में मौका मिला। अलायार खां पुराना घाघ था। बड़ी मुश्किल से अण्टी पर चढ़ा। पांच सौ रुपये लेकर भी एहसान का बोझ पर लाद ही दिया। काम हो गया। लौटकर निर्मला से बोले – लो भाई, बाजी मार ली। रुपये तुमने दिये, पर काम मेरी जबान ही ने दिया – बड़ी-बड़ी मुश्किलों से राजी हो गया। यह भी याद रहेगी। जियाराम भोजन कर चुका है?

निर्मला- कहां, वह तो अभी घूमकर लौटे ही नहीं।

मुंशीजी- बारह तो बज रहे होंगे।

निर्मला- कई दफे जा-जाकर देख आयी। कमरे में अंधेरा पड़ा हुआ है।

मुंशीजी- और सियाराम?

निर्मला- वह तो खा-पीकर सोए है।

मुंशीजी- उससे पूछा नहीं, जिया कहां गया?

निर्मला- वह तो कहते हैं, मुझसे कुछ कहकर नहीं गये।

मुंशीजी को कुछ शंका हुई। सियाराम को जगाकर पूछा – तुमसे जियाराम ने कुछ कहा नहीं, कब तक लौटेगा। गया कहां है?

सियाराम ने सिर खुजलाते हुए और आंखें मलते हुए कहा – मुझसे कुछ नहीं कहा।

मुंशीजी – कपड़े सब पहनकर गया है?

सियाराम जी नहीं, कुर्ता और धोती।

मुंशीजी – जाते वक्त खुश था।

सियाराम – खुश तो नहीं मालूम होते थे। कई बार अन्दर आने का इरादा किया, पर देहरी ही से लौट गए। कई मिनट तक सायबान में खड़े रहे। चलने लगे; तो आंखें पोंछ रहे थे। इधर कई दिन से अक्सर रोया करते थे।

मुंशीजी ने ऐसी ठण्डी सांस ली, मानो जीवन में अब कुछ नहीं रहा और निर्मला से बोले – तुमने किया तो अपनी समझ में भली ही के लिए, पर शत्रु भी मुझ पर इससे कठोर आघात न कर सकता था। जियाराम की माता होती, तो क्या यह संकोच करती? कदापि नहीं।

निर्मला – जरा डॉक्टर साहब के यहां क्यों नहीं चले जाते? शायद वहां बैठे हों। कई लड़के रोज आते हैं, उनसे पूछिए शायद कुछ पता चल जाये। फूंक-फूंक कर चलने पर भी अपयश लग ही गया।

मुंशीजी ने मानो खुली हुई खिड़की से कहा – हां, जाता हूं और क्या करूंगा।

मुंशीजी बाहर आये तो देखा, डॉक्टर सिन्हा खड़े हैं। चौंककर पूछा – क्या आप देर से खड़े हैं?

डॉक्टर – जी नहीं, अभी आया हूं। आप इस वक्त कहां जा रहे हैं? साढ़े बारह हो गये हैं।

मुंशीजी – आप ही की तरफ आ रहा था। जियाराम अभी तक घूमकर नहीं आया। आपकी तरफ तो नहीं गया था?

डॉक्टर सिन्हा ने मुंशीजी के दोनों हाथ पकड़ लिए और इतना कह पाए थे, ‘भाई साहब अब धैर्य से काम… कि मुंशीजी गोली खाए हुए मनुष्य की भांति जमीन पर गिर पड़े।