चिन्ता में नींद कब आती है? निर्मला चारपाई पर पड़ी करवटें बदल रही थी। कितना चाहती थी कि नींद आ जाये, पर नींद ने न आने की कसम खा ली थी। चिराग बुझा दिया था, खिड़की के दरवाजे खोल दिये थे, टिक-टिक करने वाली घड़ी भी दूसरे कमरे में रख आयी थी, पर नींद का नाम न था। जितनी बातें सोचनी थी, सब सोच चुकी – चिन्ताओं का भी अन्त हो गया, पर पलकें न झपकी, तब उसने फिर लैम्प जलाया और एक पुस्तक पढ़ने लगी। दो ही चार पृष्ठ पड़े होंगे कि झपकी आ गई। किताब खुली रह गई।
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सहसा जियाराम ने कमरे में कदम रखा। उसके पांव थर-थर कांप रहे थे। उसने कमरे में ऊपर-नीचे देखा। निर्मला सोयी हुई थी, उसके सिरहाने ताक पर एक छोटा-सा पीतल का संदूक रखा हुआ था। जियाराम दबे-पांव गया, धीरे-से संदूक उतारा और बड़ी तेजी से कमरे के बाहर निकला। उसी वक्त निर्मला की आंखें खुल गई। चौंककर उठ खड़ी हुई। द्वार पर आकर देखा। कलेजा धक-से हो गया। क्या वह जियाराम है? मेरे कमरे में क्या करने आया था? कहीं मुझे धोखा तो नहीं हुआ। शायद दीदीजी के कमरे में आया हो? यहां उसका काम ही क्या था? शायद मुझसे कुछ कहने आया हो; लेकिन इस वक्त क्या कहने आया होगा? इसकी नीयत क्या है? उसका दिल कांप उठा।
मुंशीजी ऊपर छत पर सो रहे थे। मुंडेर न होने के कारण निर्मला ऊपर न सो सकती थी। उसने सोचा, चलकर उन्हें जगाऊं; पर जाने की हिम्मत न पड़ी। शक्की आदमी हैं, न जाने क्या समझ बैठे और क्या करने पर तैयार हो जायें। कौन जाने, मुझे धोखा ही हुआ हो। नींद में कभी धोखा हो जाता है; लेकिन सवेरे पूछने का निश्चय करने पर भी उसे नींद नहीं आई।
सवेरे वह जलपान लेकर स्वयं जियाराम के पास गयी, तो वह उसे देखकर चौंक पड़ा। रोज तो भूंगी आती थी, आज यह क्यों आ रही हैं। निर्मला की ओर ताकने की हिम्मत न पड़ी।
निर्मला ने उसकी ओर विश्वासपूर्ण नेत्रों से देखकर पूछा – रात को तुम हमारे कमरे में गये थे?
जियाराम ने विस्मय दिखाकर कहा – मैं! भला मैं रात को क्या करने जाता? क्या कोई गया था?
निर्मला ने इस भाव से कहा, मानो उसे उसकी बात का पूरा विश्वास हो गया – हां, मुझे ऐसा मालूम हुआ कि कोई मेरे कमरे से निकला। मैंने उसका मुंह तो न देखा, पर उसकी पीठ देखकर अनुमान किया कि शायद तुम किसी काम से आये हो। इसका पता कैसे चले, कौन था? कोई था जरूर इसमें कोई सन्देह नहीं।
जियाराम अपने को निरपराध सिद्ध करने की चेष्टा कर कहने लगा – मैं रात को थियेटर देखने चला गया था। वहां से लौटा तो एक मित्र के घर लेटा रहा। थोड़ी देर हुई; लौटा हूं। मेरे साथ और भी कई मित्र थे। जिससे जी चाहें, पूछ लें। हां भाई, मैं बहुत डरता हूं। ऐसा न हो कोई चीज गायब हो गई, तो मेरा नाम लगे। चोर को तो कोई पकड़ नहीं सकता मेरे मत्थे जायेगी। बाबूजी को आप जानती हैं, मुझे मारने दौड़ेंगे।
निर्मला – तुम्हारा नाम क्यों लगेगा! अगर तुम्हीं होते तो भी तुम्हें कोई चोरी नहीं लगा सकता। चोरी दूसरे की चीज की की जाती है, अपनी चीज की चोरी कोई नहीं करता।
अभी तक निर्मला की निगाह अपने संदूकचे पर न पड़ी थी। भोजन बनाने लगी। जब वकील साहब कचहरी चले गये, तो वह सुधा से मिलने चली। इधर कई दिनों से मुलाकात न हुई थी, फिर रात वाली घटना पर विचार-परिवर्तन करना था। भूंगी से कहा – कमरे में से गहनों का बक्सा उठा ला।
भूंगी ने लौटकर कहा – वहां तो कहीं संदूक नहीं है। कहां रखा था?
निर्मला ने चिढ़कर कहा – एक बार में तो तेरा काम ही कभी नहीं होता। वहां छोड़कर और जायेगा कहां? अलमारी में देखा था ?
भूंगी – नहीं! बहूजी, अलमारी में तो नहीं देखा, झूठ क्यों बोलूं।
निर्मला मुस्करा पड़ी। बोली – जा देख, जल्दी आ।
एक क्षण में भूंगी फिर खाली हाथ लौट आयी अलमारी में भी तो नहीं है। अब जहां बताओ, वहां देखूं।
निर्मला झुंझलाकर यह कहती हुई उठ खड़ी हुई – तुझे ईश्वर ने आंखें ही न जाने किस लिए दी। देख, कमरे में से लाती हूं कि नहीं।
भूंगी भी पीछे-पीछे कमरे में गयी। निर्मला ने ताक पर निगाह डाली, अलमारी खोलकर देखी। चारपाई के नीचे झांककर देखा, फिर कपड़ों का बड़ा सन्दूक खोलकर देखा। बक्स का कहीं पता नहीं। आश्चर्य हुआ, आखिर बक्स गया कहां?
सहसा रातवाली घटना बिजली की भांति उसकी आंखों के सामने चमक गई। कलेजा उछल पड़ा। अब तक निश्चिन्त होकर खोज रही थी। अब ताप-सा बढ़ आया। बड़ी उतावली से चारों ओर खोजने लगी। कहीं पता नहीं! जहां नहीं खोजना चाहिए था, वहां भी खोजा। इतना बड़ा संदूक बिछावन के नीचे कैसे छिप जाता; पर बिछावन भी खोलकर देखा। क्षण-क्षण मुख की क्रांति मलिन होती जाती थी। प्राण नहीं में समाते जाते थे। अन्त को निराश होकर उसने छाती पर एक घूंसा मारा और रोने लगी।
गहने ही स्त्री की सम्पत्ति होते हैं। पति की और किसी सम्पत्ति पर उसका अधिकार नहीं होता है। इन्हीं का उसे बल और गौरव होता है। निर्मला के पास पांच-छः हजार के गहने थे। जब उन्हें पहनकर निकली थी, तो उतनी देर के लिए उल्लास में उसका हृदय खिला रहता था। एक-एक गहना मानों विपत्ति, और बाधा से बचाने के लिए एक-एक रक्षास्र था। अभी रात ही उसने सोचा था, जियाराम की लौंडी बनकर वह न रहेगी। ईश्वर न करे वह किसी के सामने हाथ फैलाए। इसी खेवे से अपनी नाव को भी पार लगा देगी और अपनी बच्ची को भी किसी न किसी पार पहुंचा देगी। उसे किस बात की चिन्ता है। इन्हें तो कोई उससे छीन न लेगा। आज ये मेरे श्रृंगार हैं, कल को मेरे आधार हो जायेंगे। इस विचार से उसके हृदय को कितनी सान्त्वना मिली थी। वही सम्पत्ति आज उसके हाथ से निकल गई।
अब वह निराधार थी। संसार में उसे कोई अवलम्ब, कोई सहारा न था! उसकी आशाओं का आधार जड़ से कट गया। वह फूट-फूटकर रोने लगी। ईश्वर! तुमसे इतना भी न देखा गया! मुझ दुखिया को तुमने यों ही अपंग बना दिया था, अब आंखें भी फोड़ दी! अब वह किसके सामने हाथ फैलाएगी, किसके द्वार पर भीख मांगेगी? पसीने से उसकी देह भीग गई। रोते-रोते आंखें सूज गई। निर्मला सिर नीचे किए रो रही थी! रुक्मिणी उसे धीरज दिला रही थी, लेकिन उसके आंसू न रुकते थे। शोक-ज्वाला कम न होती थी।
तीन बजे जियाराम स्कूल से लौटा। निर्मला उसे आने की खबर पाकर विक्षिप्त की भांति उठी और उसके कमरे के द्वार पर आकर बोली – भैया, दिल्लगी की हो तो दे दो। दुखिया को सताकर क्या पाओगे?
जियाराम एक क्षण के लिए कातर हो उठा। चोर-कला में उसका यह पहला ही प्रयास था। वह कठोरता, जिससे हिंसा में मनोरंजन होता है, अब तक उसे प्राप्त न हुई थी। यदि उसके पास संदूक होता और फिर इतना मौका मिलता कि उसे ताक पर रख आये, तो कदाचित वह उस मौके को न छोड़ता, लेकिन सन्दूक उसके हाथ से निकल चुका था। यारों ने उसे सराफे में पहुंचा दिया था और और औने-पौने बेच भी डाला गया। चोरों को झूठ से सिवा और कौन रक्षा कर सकता है? बोला – भला अम्माजी, मैं आपसे ऐसी दिल्लगी करूंगा? आप अभी तक मुझ पर शंका करती जा रही है। मैं कह चुका कि मैं रात को घर पर न था; लेकिन आपको यकीन ही नहीं आता। बड़े दुःख की बात है कि मुझे आप इतना नीचे समझती हैं।
निर्मला ने आंसू पोंछते हुए कहा – मैं तुम्हारे ऊपर शक नहीं करती भैया! तुम्हें चोरी नहीं लगती। मैंने समझा, शायद दिल्लगी की हो।
जियाराम पर वह चोरी का सन्देह कैसे कर सकती थी? दुनिया यही तो कहेगी कि लड़के की मां मर गई है, तो उस पर चोरी का इल्जाम लगाया जा रहा है। मेरे मुंह में ही तो कालिख लगेगी!
जियाराम ने आश्वासन देते हुए कहा – चलिए, मैं देखूं, आखिर ले कौन गया? चोर आया किस रास्ते से?
भूंगी – भैया, तुम चोरों को आने की कहते हो। चूहे के बिल से तो निकल आते है, यहां तो चारों ओर ही खिड़कियां है!
निर्मला – सारा घर तो छान मारा; अब कहां खोजने को कहते हो?
जियाराम – आप लोग सो भी तो जाती हैं, मुर्दों से बाजी लगाकर।
चार बजे मुंशीजी घर में आये, तो निर्मला की दशा देखकर पूछा – कैसी तबीयत है? कहीं दर्द तो नहीं है? – यह कहकर उन्होंने आशा को गोद में उठा लिया।
निर्मला कोई जवाब न दे सकी। फिर रोने लगी।
भूंगी ने कहा – ऐसा कभी नहीं हुआ था। मेरी सारी उम्र इसी घर में कट गई। आज – तक पैसे की चोरी नहीं हुई। दुनिया यही कहेगी कि भूंगी का काम है। अब तो भगवान ही मेहरबानी रखे।
मुंशीजी अचकन के बटन खोल रहे थे। फिर बटन बन्द करते हुए बोले – क्या हुआ? क्या कोई चीज चोरी हो गई?
भूंगी – बहूजी के सारे गहने उठ गए।
मुंशीजी – रखे कहां थे?
निर्मला ने सिसकियां लेते हुए रात की सारी घटना बयान कर दी; पर जियाराम की सूरत के आदमी के अपने कमरे से निकालने की बात न कही। मुंशीजी ने ठण्डी सांस भरकर कहा – ईश्वर भी बड़ा अन्यायी है। जो मरे है, उन्हीं को मारता है। मालूम होता है दुर्दिन आ गए हैं। अगर चोर आया तो आया किधर से? कहीं सेंध नहीं पड़ी और किसी तरह से आने का रास्ता नहीं। मैंने तो कोई ऐसा पाप नहीं किया, जिसकी मुझे यह सजा मिल रही है। बार-बार कहता रहा, गहने का सन्दूक ताक पर मत रखो, लेकिन कौन सुनता है?
निर्मला – मैं क्या जानती थी कि यह गजब टूट पड़ेगा।
मुंशीजी – इतना तो जानती थी कि सब दिन बराबर नहीं जाते। आज बनवाने जाऊं, तो दस हजार से कम नहीं लगेंगे। आजकल अपनी जो दशा है, तुमसे छिपी नहीं; खर्च-भर को मुश्किल से मिलता है, गहने कहां से बनेंगे? जाता हूं पुलिस में इत्तला कर आता हूं पर मिलने की कोई उम्मीद न समझो।
निर्मला ने आपत्ति के भाव से कहा – सब जानते हैं कि पुलिस में इत्तला करने से कुछ न होगा, तो क्यों जा रहे हैं?
मुंशीजी – दिल नहीं मानता, और क्या? इतना बड़ा नुकसान उठाकर चुपचाप तो नहीं बैठा जाता।
निर्मला – मिलने वाले होते तो जाते ही क्यों? तकदीर में न थे, तो कैसे रहते?
मुंशीजी – तकदीर में होंगे, तो मिल जायेंगे, नहीं तो गए हैं ही।
मुंशीजी कमरे से निकले। निर्मला ने उनका हाथ पकड़कर कहा – मैं कहती हूं मत जाओ। कहीं ऐसा न हो, लेने के देने न पड़ जाये।
