आकाश पर आज कुछ अधिक लालिमा थी-रात भर की जलती हुई बत्तियाँ धीरे-धीरे बुझ रही थीं। बम्बई की सुनसान सड़कों पर लोगों की चहल-पहल आरंभ हो रही थी। समुद्र के जल से उठी सलोनी धुंध ऊँची-ऊँची इमारतों पर हल्की-सी लकीर बनाए जा रही थी।
आज वह बहुत दिनों बाद रायसाहब के घर की ओर जा रही थी। वह अब इसे अपना घर कहते हुए भी घबराती थी। रायसाहब और मालकिन का स्नेह अब उसे सपना-सा अनुभव होने लगा। बेला का विचार आते ही वह अज्ञात भय से कांप जाती। फिर भी साहस बटोरकर वह आज उसी घर में जा रही थी-उस व्यक्ति की भांति, जो बार-बार निराशा का सामना करके भी भगवान के मंदिर को नहीं छोड़ता और उसी की शरण लेता है।
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फाटक के पास पहुँचकर वह रुक गई। उसने दृष्टि घुमाकर कोठी के बाग को देखा। फूल, पौधे, क्यारियां सब वैसी ही थीं, पर उसे लगा जैसे सब उससे रूठ गए हों। प्रभात की शीतल वायु के झोंकों ने उसकी पलकों में छिपे आँसुओं को स्पष्ट कर दिया।
उसके भारी पाँव कठिनाई से उठ रहे थे। वह सामने के कमरे में जाने के बदले पिछले बरामदे में रायसाहब के कमरे की पिछली खिड़की पर जा ठहरी। खिड़की का एक किवाड़ खुला था। उसने चोर दृष्टि से भीतर झांका। रायसाहब मेज पर बैठे कुछ लिख रहे थे। पहले तो उसने चाहा कि द्वार खटखटाए, पर फिर इसे उचित न जानकर उल्टे पांव गोल कमरे की ओर लौटी और भीतर आ गई।
वहां कोई न था। वह दबे पांव रायसाहब के कमरे तक जा पहुँची और उनकी कुर्सी के पीछे खड़े होकर उनके देखने की प्रतीक्षा करने लगी।
किसी को अपने पीछे खड़ा अनुभव कर जैसे ही रायसाहब ने घूमकर देखा तो आश्चर्य और प्रसन्नता से वह उछल पड़े। संध्या ने देखा कि उनकी आँखों में आँसू झलक रहे थे। उन्होंने कांपते हाथों से कलम मेज पर रख दी और बढ़कर संध्या को अपने सीने से लगा लिया।
‘पापा! ये आंसू कैसे?’ संध्या ने संभलते हुए कहा।
‘नहीं तो…’ उन्होंने आंसू पोंछते हुए कहा-‘जानती हो मैं तुम्हारा ही नाम लिख रहा था।’
‘किस पर?’
उन्होंने कांपते हाथों से मेज पर से लिफाफा उठाया और उसकी ओर बढ़ा दिया।
‘यह क्या?’
‘ब्याह पर आने का न्यौता-इस पहली को तुम्हारी बेला का ब्याह है।’
‘ब्याह’- उसके कांपते होंठों से धीरे से निकला और धड़कते दिल से उसने लिफाफा खोला।
निमंत्रण पत्र पढ़ते ही उसकी आँखों में आंसू भर आए, पर अधिकार से काम लेते हुए वह उन्हें पी गई और मुस्कराकर बोली-
‘पापा बधाई हो! मैं अवश्य आऊँगी-आपकी बेला के ब्याह पर।’
‘पगली-तुम्हारी भी तो छोटी बहन है।’
‘हाँ-हाँ, पापा मैं कभी उसके अधिकार भूल सकती हूँ’, उसने पापा को सांत्वना देते हुए कहा।
‘जब तुम्हारा नाम लिखने लगा तो आँखों में आंसू छलक आए।’
‘वह क्यों पापा?’ वह रायसाहब के समीप कुर्सी पर बैठते हुए बोली।
‘भाग्य का चक्कर देखकर-कहाँ की ज्योति और कहाँ जाकर जली।’
‘भाग्य ठीक ही करता है पापा-हम इंसान कभी गलत मार्ग पर चलने लगें तो वह अपना लंबा हाथ बढ़ाकर हमें ठीक मार्ग पर डाल देता है।’
‘मन बहलाने के लिए यह विचार अच्छे हैं।’ रायसाहब यह कहते हुए उठे और बोले-‘नाश्ता कर लें-तुम्हारी माँ प्रतीक्षा कर रही होगी।’
‘परंतु पापा…’ वह कहते-कहते रुक गई।
‘हाँ बेटी, कहो क्या कोई बात है?’
‘हाँ पापा, एक काम से आई थी।’
‘क्या काम?’ वह दोबारा बैठते हुए बोले।
‘मुझे कुछ रुपयों की आवश्यकता है।’ वह धीमे स्वर में आँखें झुकाते हुए बोली।
‘बस। कहो कितने चाहिए?’ उन्होंने ड्रॉअर से बटुआ निकालते हुए पूछा।
‘इनसे काम नहीं चलेगा।’
‘तो तुम्हें अधिक चाहिए?’ आश्चर्य से उन्होंने पूछा।
‘हाँ पापा, दस हजार ऋण ले रही हूँ-प्रण करती हूँ शीघ्र लौटा दूंगी।’
दस हजार का नाम सुनते ही पल भर के लिए रायसाहब सोच में पड़ गए और फिर संभलते हुए बोले-
‘दस हजार-इतने का क्या करोगी?’
‘जरूरत है, आप मुझ पर विश्वास रखिए। मैं इन्हें किसी व्यापार के लिए ले रही हूँ।’
‘ऐसी तो कोई बात नहीं। और फिर ऋण कैसा? कोई बेटियों को भी ऋण देता है। मैं तो स्वयं अपनी बेटी का ऋणी हूँ।’ उन्होंने ड्रॉअर से अपनी चेक-बुक निकाली और संध्या के नाम दस हजार का चेक काट डाला।
चेक को सावधानी से लपेटते हुए संध्या ने अपने पर्स में रख लिया और भीगी आँखों से मुस्कराते हुए रायसाहब का धन्यवाद करने लगी। रायसाहब की आँखों में भी प्रसन्नता के आंसू छलक आए। क्षण-भर चुप रहकर स्नेह से उसकी ओर देखते हुए वह बोले-
‘संध्या!’
‘जी!’
‘बेला और रेनु मेरी दो आँखें हैं परंतु उनकी ज्योति तुम हो।’ यह कहते हुए उन्होंने उसे फिर सीने से लगा लिया और बोले-‘हाँ, इस विषय में किसी से कुछ मत कहना और किसी व्यापार की सोचो तो मुझसे पूछ लेना।’
‘आपसे पूछे बिना कोई काम न करूँगी।’
इतने में मालकिन भी वहाँ आ पहुँची और संध्या को देखकर अति प्रसन्न हुईं। दोनों संध्या को साथ लेकर नाश्ते के लिए खाने के कमरे में जा बैठे।
रायसाहब ने बेला को भी बुलावा भेजा, परंतु वह नीचे न आई। शायद लज्जा से वह संध्या के सम्मुख आने से घबराती थी। रेनु स्कूल जा चुकी थी।
रायसाहब और मालकिन अभी चाय पी ही रहे थे कि संध्या उठी और सीढ़ियों की ओर बढ़ी।
‘कहाँ?’ रायसाहब ने मुँह से प्याला हटाते हुए पूछा।
‘बेला से मिलने’, उसने मुस्कराते हुए उत्तर दिया और तेज-तेज कदम उठाती ऊपर चली गई।
कमरे का द्वार खोलकर क्षणभर के लिए वह पायदान पर रुक गई और दीवारों को देखने लगी-यहीं वह रहती थी-वहाँ का कुछ भी न बदला था। हर चीज अपने स्थान पर ज्यों-की-त्यों थी, बदले थे तो केवल उसमें बसने वालों के मन, जो एक ही दिशा में चलते-चलते अचानक पृथक हो गए थे।
खाली कमरे में घूमती हुई उसकी दृष्टि बाथरूम के किवाड़ पर रुक गई। बेला अभी-अभी भीतर से निकली। दोनों कुछ समय तक चुपचाप एक-दूसरे को देखती रहीं। दोनों के मन में एक तूफान मौजें मार रहा था। आखिर संध्या ने मुस्कुराकर धीमे स्वर में मौन तोड़ते हुए पूछा-
‘क्या अभी सोकर उठी हो?’
‘हूँ-’ उसने असावधानी से सिर हिलाते हुए उत्तर दिया।
‘नीचे आते डर लगता था क्या?’
‘डर किससे?’
‘शायद सोचती हो दीदी कहीं खा ही न जाए।’
‘तो इसमें झूठ ही क्या है-तुम्हारा अधिकार जो चुराया है।’
‘ऐसा न कहो-तुमने चुराया नहीं-मैंने उपहार में दिया है।’

‘सच दीदी!’ बेला ने बनते हुए कहा और संध्या के कुछ और निकट आ गई। संध्या ने पहले तो चाहा कि उसे गले से लगा ले, पर किसी आंतरिक भावना से रुक गई-उसे लगा जैसे बेला अब पराई हो चुकी है। बेला के गाल पर चुटकी लेते हुए वह बोली-‘देखना, ब्याह पर हमें बुलाना मत भूलना।’
बेला ने लज्जा से आँखें झुका लीं। संध्या का यह वाक्य उसके दिल पर नश्तर का-सा घाव कर गया।
‘वह कैसे हैं बेला!’
‘कौन दीदी!’ आश्चर्य से बेला ने पूछा।
‘तुम्हारे आनंद बाबू।’ संध्या के स्वर में दृढ़ता थी।
नीलकंठ-भाग-15 दिनांक 11 Mar.2022 समय 10:00 बजे रात प्रकाशित होगा ।

