आकाश पर आज कुछ अधिक लालिमा थी-रात भर की जलती हुई बत्तियाँ धीरे-धीरे बुझ रही थीं। बम्बई की सुनसान सड़कों पर लोगों की चहल-पहल आरंभ हो रही थी। समुद्र के जल से उठी सलोनी धुंध ऊँची-ऊँची इमारतों पर हल्की-सी लकीर बनाए जा रही थी। आज वह बहुत दिनों बाद रायसाहब के घर की ओर जा […]
