रात के लगभग बारह बजे होंगे….विवेक एक स्टॉप पर बस से उतर आया…वह विस्की के नशे में धुत्त था, मगर बिल्कुल मदहोश नहीं था, बहुत खुश भी था। एक बंगले के पिछवाड़े जाकर उसने दीवार फलांगी…अन्दर कूद गया तो चौकीदार के कानों में आवाज पहुंच गई चौकीदार दौड़ कर उधर आया‒वहां था तो अंधेरा, लेकिन चौकीदार को विवेक नजर आ गया जो सैनेटरी पाइप ढूंढ़ रहा था…चौकीदार झपटता हुआ चिल्लाया‒
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“ऐ कौन है? खबरदार।”
विवेक उसकी ओर मुड़ा। तब तक चौकीदार ने टॉर्च जला ली थी‒विवेक ने होंठों पर उंगली रखकर कहा‒
“शिश! खबरदार! शोर मत मचाओ।”
“अरे…तुम कौन हो?”
“अपन इस घर का होने वाला दामाद है…चलो जरा टॉर्च मारने का है…अपन को सैनेटरी पाइप नहीं मिल रहा।”
“सैनेटरी पाइप…किसलिए?”
“अरे भाई…उखाड़ कर नहीं ले जाने का है‒अपन की होने वाली ससुराल का माल है।”
“क्या बक रहे हो?” चौकीदार ने कहा‒”बेबी की शादी तो सेठ गुरनाम जी के बेटे महेश बाबू से हो रही है।”
“अरे, तेरे को कुछ नहीं मालूम…साला, तू बस टॉर्च दिखाने का है। अपन को अंजू को खास बात बताने का है।”
“कौन है अंजू?”
“अबे अंजला…अपन उसे प्यार से अंजू बोलेला है।”
“तुम इस तरह नहीं मानोगे….तुम नशे में हो।” चौकीदार ने लाठी उठाकर वार करना चाहा…उसकी लाठी ऊपर ही थी कि विवेक ने एक जन्नाटेदार थप्पड़ उसकी कनपटी पर मारा और वह औंधे मुंह गिर कर बेहोश हो गया-मगर विवेक खुद झोंक में कई चक्कर खा गया।
फिर रुककर सिर को इधर-उधर झटका और गिरी हुई टॉर्च उठाकर सैनेटरी पाइप को ढूंढ कर ऊपर चढ़ने लगा। ऊपर चढ़कर एक खिड़की से अन्दर पहुंच गया।
बैड पर कंधों तक रजाई ढके गुरनाम सो रहा था‒विवेक ने उसका कंधा हिलाकर पुकारा‒
“ऐ…अंजू!”
सेठ गुरनाम हड़बड़ा कर जल्दी से लैम्प की ओर हाथ बढ़ाकर जोर से बोला‒”कौन है?”
विवेक झपाक से बैड के नीचे घुस गया।
“साला मिस्टेक हो गएला…यह तो अपन की प्रेमिका नहीं, अपन का होने वाला ससुर है।”
“कौन है?” गुरनाम ने जल्दी से उतरते हुए कहा। गाउन पहन कर डोरी बांधता हुआ बैडरूम से बाहर चला आया और नौकर को पुकारता हुआ आगे बढ़ा। विवेक अंजला के कमरे के सामने ही रुक गया।
अंजला ने अंदर से गुरनाम की आवाज सुन ली थी‒उसने जल्दी से दरवाजा खोला‒इससे पहले कि वह कुछ कहती, विवेक झपाक से उसके कमरे में घुस गया। अंजला घबरा कर पीछे हट गई…विवेक ने अन्दर से दरवाजा बंद कर लिया।
“विवेक! इतनी रात में तुम यहां?”
“शिश…!” विवेक ने होंठों पर उंगली रखकर कहा‒”वह साला बुड्ढा खूसट जाग गएला है।”
“व्हाट! तुमने मेरे डैडी को ऐसा कहा!”
“आई एम सॉरी यार…अपन का होने वाला ससुर।”
“मगर तुम इतनी रात में चोरों की तरह क्यों आए हो?”
“तुम्हारे को एक खुशखबरी सुनाने आएला हूं…क्या करूं अपन से सबर नहीं हुआ…इसी समय आ गया…हमसे मिस्टेक हो गया और तुम्हारे डैडी जाग गए…मैं उनके कमरे में घुस गया था।”
“ओ माई गॉड!”
अचानक दरवाजा पीटने के साथ गुरनाम की आवाज सुनाई दी‒
“अंजू…अंजू बेटी…!”
“मर गएला है…आ गया बुड्ढा।”
“जल्दी करो।” अंजला घबराकर बोली…बैड के नीचे छुप जाओ और आंखें झपकाती हुई जम्हाई लेकर बोली‒”क्या बात है डैडी?”
“बेटी…अभी कोई मेरे कमरे में था।”
“कौन था?”
“पता नहीं कौन था…उसने मेरा कंधा हिलाया था…जैसे ही मैंने जाग कर बत्ती जलाई वह गायब हो गया।”
“जरूर आपका भ्रम होगा…कोई सपना देख रहे हो….प्रायः ऐसा होता है जैसे किसी ने झिंझोड़ दिया हो…आप कुछ परेशान भी तो रहते हैं।”
“खैर! बेटी तुम होशियार रहना…कोई गड़बड़ हो तो तुरन्त आवाज दे देना।”
गुरनाम बेटी को आदेश देकर बाहर निकल गए। थोड़ी देर बाद अंजला ने दरवाजा अंदर से बंद किया और बहुत धीमे स्वर में बोली‒”आ जाओ…डैडी गए।”
उत्तर न मिलने पर अंजला ने बैड के नीचे झांक कर देखा तो विवेक खर्राटे भर रहा था…अंजला ने उसे झिंझोड़ कर जगाया।
“अरे बाहर निकलो-तुम बैड के नीचे हो।”
वह बाहर निकल आया।
“अब जल्दी से बताओ….और जैसे छुपकर चोरी से आए हो, वैसे ही बिना खटका किए भाग जाओ‒तुम कोई खुशखबरी सुनाने आए थे ना।”
“अरे हां, खुशखबरी।” वह खुशी से उछल पड़ा‒”अंजू महेश तुमसे शादी करने को सहमत हो गया। है।”
“वह तो पहले ही बात चल रही है…इसमें खुशखबरी क्या है।”
“अरे! वह छः महीने में मर जाएगा।”
“क्या कह रहे हो तुम?”
“डॉक्टरों ने बता दिया है कि उसको कैन्सर है…और लाइलाज…ज्यादा से ज्यादा पांच-छः महीने निकाल पाएगा।”
“विवेक! तुम्हारा इतना अच्छा दोस्त मरने वाला है और तुम खुश हो?”
“अपन के खुश न होने से क्या वह बच जायेगा?”
“अपन अच्छा-बुरा कुछ नहीं जानता…अपन को तो बस यह मालूम है कि अपन तुम्हारे को लव करता है। महेश तुमसे शादी बनाएंगा…छः महीने बाद वह मर जाएगा…फिर तुम अपन के साथ शादी कर लेना।”
“तुम कितने स्वार्थी और कठोर हृदय हो…विवेक! अपना काम निकालने के लिए एक भले-चंगे बचपन के दोस्त के मरने की खबर पर खुश हो रहे हो…क्या तुम्हें भगवान से डर नहीं लगता‒तुम तो उस पर बहुत विश्वास रखते हो। पूजा करते हो…राम नाम का जाप करते हो। ऐसी खबर पर कम से कम तुम्हें तो दुःखी होना चाहिए।”
“आई एम सॉरी अंजू…अब अपन को तुमसे और भी अधिक लव है…अपन यह बात तो सोचा ही नहीं था…सचमुच मैं नीच हूं। तुम मुझे ठुकरा सकती हो निःसंकोच।” अचानक नीचे से शोर की आवाज आई और वह घबरा कर बोला‒”क्या हो गएला…इधर भी उग्रवादी आ गएले।”
अंजला ने जल्दी से खिड़की खोलकर नीचे झांका‒पिछवाड़े को बत्ती जल गई थी….चौकीदार बेहोश पड़ा था। एक नौकर और गुरनाम चिल्ला-चिल्ला कर दूसरे नौकरों को जगा रहे थे।
“अरे-बाप रे!” अंजला ने कहा‒”नीचे तो चौकीदार बेहोश पड़ा है।”
“वह साला अपन को रोकने का कोशिश किएला था और अपन ने उसकी कनपटी पर जोरदार घूंसा मारा था।”
“ये क्या गजब कर दिया तुमने?”
नीचे से चिल्लाने की आवाज आ रही थी।
“वह मेरे कमरे में भी आया था।”
“जरूर कोई बड़ा डकैत है…चारों ओर से बंगले को घेर लो…बचकर न जाए….पुलिस को खबर कर दो। बड़ा खराब जमाना आ गया है…हर रोज हर तरफ लूट-खसोट।”
फिर दायें-बायें के बंगलों की बत्तियां भी जल गईं…अंजला ने घबरा कर खिड़की बंद कर दी और बहुत बुरा मुंह बनाकर मुड़कर विवेक से बोली‒
“यह क्या बला मोल ले ली?”
“क…क…क्या हुआ अंजला?”
“अरे, तुमने चौकीदार को बेहोश कर दिया‒डैडी को जगा दिया….लोग समझ रहे हैं खतरनाक डकैत घुस आए हैं।”
“अरे, क्या मैं सचमुच डकैत हूं?”
“विवेक! तुम समझते क्यों नहीं…सबको पता चल जाएगा कि तुम मुझे मिलने आए हो…वह मेरे कमरे में आकर तुम्हें देख लेंगे…कितनी बदनामी होगी‒मेरे लिए मर जाने की बात है?”
“इसमें बुरी बात क्या है? अपन तुमसे लव करेला है और तुम अपन से…अपन दोनों को शादी करने का है।”
“मगर यह सब तो बाद में होना था…पहले महेश से मेरी शादी होनी थी।”
“अरे बाप रे…यह तो मैं भूल ही गया था।”
“अगर महेश के डैडी को मालूम हो जाए कि तुम मेरे कमरे में पकड़े गए थे तो क्या वह मुझे बहू बना लेंगे।”
“माई गॉड!”
“वैसे भी इस इलाके के लोगों को जब मालूम होगा कि तुम रात को छुप कर मेरे कमरे में आए थे तो मेरी इज्जत क्या रह जाएगी। लोग मुझे भी देवयानी की तरह आवारा नहीं समझने लगेंगे।”
“अब तो ‘मिस्टेक’ हो ही गएली है…अपन क्या करे?”
“तुम किसी दूसरे कमरे में छुप जाओ…स्टोर रूम उचित रहेगा…उधर कोई नहीं आएगा।”
विवेक जल्दी से निकल आया….अंजला उसे स्टोर रूम तक लाई और दरवाजा खोलकर अंदर धकेल दिया और बोली‒”बिल्कुल चुप सामान के पीछे बैठ जाओ। बत्ती मत जलाना।” फिर उसने दरवाजा खींच लिया और विवेक ने अंदर से बन्द कर लिया।
“अरे, अरे क्या रहे हो….अंदर से बंद हो गया तो लोग समझ जाएंगे, तुम वहीं छुपे हो।”
मगर विवेक ने शायद सुना ही नहीं…कदमों की आहटें सुनकर अंजला झपटकर अपने कमरे में आकर दरवाजा बन्द करके रजाई ओढ़ कर लेट गई। कदमों की आहटें उसके पास आकर रुक गई…अंजला का दिल जोर-जोर से धड़क उठा…फिर गुरनाम की आवाज आई….
“अंजला….बेटी अंजला।”
अंजला ऐसे भावों से उठी जैसे गहरी नींद में सो रही हो….गुरनाम ने जोर से पुकार कर कहा‒”अंजला दरवाजा खोलो।”
अंजला उठी…आंखें मल कर लाल कीं…उठकर दरवाजा खोला और बनावटी आश्चर्य से बोली‒”क्या हुआ डैडी?”
“क्या तुमने कुछ नहीं देखा?”
“जी नहीं।”
गुरनाम अंदर घुसे….इधर-उधर देखा तो अंजला ने पूछा‒”आप क्या देख रहे हैं डैडी?”
“बेटी, कोई बदमाश अंदर आया है…वह चौकीदार से सैनेटरी पाइप का पूछ रहा था‒फिर चौकीदार को बेहोश करके ऊपर चढ़ आया।”
“ओ गॉड!”
“वह कह रहा था तुम्हें कुछ खुशखबरी सुनानी है।”
“मुझे…और खुशखबरी…?”
गुरनाम उसे ध्यान से देखकर बोले‒”सच-सच बताओ बेटी, क्या तुम्हारे कमरे में कोई नहीं आया है?”
“ड….ड…..डैडी….भला म….म… मैंने आपसे कभी झूठ बोला है?”
“इसी बात का तो दुःख है कि आज पहली बार तुम मुझसे झूठ बोल रही हो।”
“डैडी!”
सामने वाले बंगले में मिसेज प्रधान जाग रही थीं…उन्होंने कोई छाया-सी तुम्हारे कमरे की खिड़की में से अंदर घुसते देखी थी। बात हर तरफ फैल चुकी है बेटी…अगर वह कोई चोर होता तो उसे भागने का काफी समय मिला था।
अंजला के चेहरे की रंगत उड़ गई। गुरनाम फिर बोला‒”सच-सच बता दो बेटी…अब भी कुछ नहीं बिगड़ा।”
“अचानक कमरे के बाहर स्टोर रूम की ओर से नौकरों का शोर गूंजा‒
“पकड़ लिया।”
“पकड़ लिया…चोर को पकड़ लिया।”
अंजला के दिल पर घूंसा-सा लगा। गुरनाम जल्दी से बाहर आए तो नौकरों ने विवेक को पकड़ रखा था…विवेक चिल्ला रहा था‒
“अरे…मैं चोर नहीं हूं…मैं इस घर का होने वाला दामाद हूं।”
“साले!” एक नौकर ने उस पर चपत मारकर कहा‒”सैनेटरी पाइप से चढ़कर आते हैं दामाद‒जिस तरह तू आया है।”
अंजला घबराकर बाहर निकल आई थी…विवेक ने रुआंसे होकर कहा‒”अंजू-प्लीज! इनको समझाओ….पहली बार ससुराल में कदम रखेला है‒मार-पीट का लफड़ा नहीं करना मांगता।”
गुरनाम ने ध्यान से पहले विवेक को फिर अंजला को देखा जिसके चेहरे पर कई रंग आ जा रहे थे। उन्होंने अंजला से कुछ नम्र स्वर में कहा‒”यह क्या कह रहा है बेटी? क्या तुम इसे जानती हो?”
अंजला की खोपड़ी घूम गई…उसने सोचा अगर मैंने हां कर दी तो डैडी मेरी शादी इसके साथ करने पर तुल जाएंगे, इस तरह मैं सुहागिन बनते ही विधवा बन जाऊंगी…उसने जल्दी से कहा‒
“नहीं…नहीं….मैं नहीं जानती कि यह कौन है?”
“हांय! क्या बोला?” विवेक की आंखें निकल पड़ीं। तू अपन को नहीं जानती…साली! अपन जी-जान से तुझे चाहेला है…अपन इतनी मुश्किल से तेरे दिल में जगह बनाएला था‒पर अब समझ में आया-साली तुम लड़की लोग सब एक जैसी होती हैं‒धिक्कार है ऐसे प्यार पर।”
फिर उसने एक झटका मारा तो चारों नौकर इधर-उधर जाकर गिरे। सामने खड़े हुए गुरनाम से विवेक ने हाथ हिलाकर कहा‒”ऐ सेठ! अपन को रास्ता देने का है…अपन एक मिनट नहीं ठहर सकता…अपन का दम घुटता है।”
नौकर फिर उसकी ओर झपटे तो विवेक ‘एक्शन’ में आकर बोला‒”ऐ सालों! खबरदार-अपन किसी पर अकारण हाथ उठाना नहीं मांगता पर अपन ज्यादती ‘इंसल्ट’ भी सहन नहीं करेगा…तोड़ कर रख देंगा एक-एक को।”
“कौन हो तुम?” गुरनाम ने पूछा।
“चल हवा आने दे‒कौन हो तुम? साला थानेदार बनेला है…अरे ऐसा फालतू लड़की काहे को पैदा किएला था जो साली सच्ची मुहब्बत की कदर तक करना नहीं जानती।”
अंजला तड़प कर बोली‒”विवेक तुम समझते क्यों नहीं।”
“अरे…अच्छी तरह समझ गएला अपन।”
“कुछ नहीं समझे तुम…तुम मिट्टी के माधो हो और मिट्टी के माधो ही रहोगे।”
“अरे जा साली‒अपन फौलाद का बना है। मिट्टी की तू है।”
अचानक अंजला का एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा। वह हड़बड़ा कर अपना गाल सहलाने लगा…उसकी आंखें खुली की खुली रह गईं…और वह आंखें फाड़कर बोला‒”साला बचपन से मां की मार खाकर समझेला था…शादी के बाद तेरे थप्पड़ खाने पड़ेंगे।”
इस बीच गुरनाम दोनों को बारी-बारी देख रहा था…नौकर हैरान थे-विवेक ने गुरनाम की ओर देखकर कहा‒
“क्षमा करना ससुर जी…अपन का भेजा साला फिरेला है…यह तो अपन की जान बचाने के लिए झूठ बोलेला है…अपन चलता है।”

उसने एक कदम बढ़ाया ही था कि गुरनाम झटके से बोला‒
“ठहरो!”
विवेक जहां खड़ा था वहीं रुक गया…गुरनाम ने पूछा‒
“कब से जानते हो तुम एक-दूसरे को?”
“कौन-से दूसरे को?”
“मैं अंजला की बात कर रहा हूं।”
“कौन अंजला?”
“तुम्हारी प्रेमिका अंजला।”
“अरे…अपन की कोई प्रेमिका नहीं है‒अपन चलता है।”
इस बार गुरनाम ने रिवाल्वर निकाल लिया‒”आगे बढ़े तो गोली मार दूंगा।”
“अरे जाओ…अपन कोई गीदड़ नहीं है जो इस ठांए-ठूं से डर जाएंगा…मारने का है तो मारो।”
“मैं तुम्हें और अंजला को गोली मार दूंगा।”
“अरे! तो मारो ना।” विवेक ने कहा, फिर एकाएक चौंक कर बोला‒”हांय…अंजला को…नहीं…नहीं उसको नहीं मारने का…तुम अपन को मारो‒अपन तुमसे शिकायत नहीं करेगा।”
“चलो…मेरे साथ चलो।”
“किधर?”
“अपने घर…अभी जाकर तुम्हारे घरवालों से बात पक्की करनी है।”
“अपन का कोई घरवाला है ही नहीं”
“कोई तो होगा?”
“अपन की मां है‒वह तो देखते ही डंडा लेकर दौड़ेंगी‒बड़ी कड़क है…यह छोकरी अपन को उनसे पहले भी पिटवा चुकी है।”
“मैं तुम्हारी मां से शादी की बात करूंगा।”
“क्या बोला बुड्ढे।” विवेक ने गुर्राकर गुरनाम का गिरेबान पकड़ लिया…”तू साला…अपन की मां से शादी करेगा।”
“हाथ हटाओ…मैं तुम्हारी और अंजला की शादी की बात करूंगा।”
“आई एम सॉरी‒ऐसा बोल ना।” विवेक उसका कॉलर ठीक करता हुआ बोला‒”अपन दिमाग का थोड़ा कमजोर है।”
“नहीं डैडी।” अंजला ने जल्दी से कहा‒”मैं इसके साथ शादी नहीं करूंगी।”
“क्या?” विवेक ने खुश होकर कहा‒”एक समझदार छोकरी विधवा किएला है तुमने…वह बोलती है अपन से शादी नहीं करेगी।”
“बेटी! तुम इससे प्यार करती हो ना?” गुरनाम ने बेटी से पूछा।
“नहीं डैडी‒यह मुझसे करता है…मैं इससे प्यार नहीं करती।”
“तो शादी के बाद करने लगोगी…यह शादी तो दोनों को करनी ही पड़ेगी।”
“काहे को?” विवेक ने कमर पर हाथ रखकर कहा‒”अपन का लाइफ क्या फिजूल का है?”
“तुम जिस तरह इतनी रात गए मेरी बेटी के कमरे में घुसे हो‒उसके कारण उसकी कितनी बदनाम हुई है‒सारे पड़ोसियों को पता चल गया है।”
“अरे चलने दो यार…अपन का दोस्त सब संभाल लेगा।”

“कौन दोस्त?”
“यह भेद की बात है…अपन नहीं बताएंगा…यहीं खुशखबरी सुनाने तो इतनी रात गए यहां आएला था।”
“अंजला को क्या मरने का है…अपन नहीं करेंगा इससे शादी-फादी…समझ गया?”
“पकड़ लो इसे।” गुरनाम ने नौकरों से कहा…और दूसरे क्षण नौकरों ने उसे घेर कर पकड़ लिया।
“ऐ सेठ! अपन से ‘फ्री स्टाइल’ नहीं कराने का।”
“तुम चलते हो मेरे साथ या मैं मांरूं गोली अंजला को।”
“ऐ साला! तुम बाप है या जल्लाद…अपनी इकलौती बेटी को गोली मारेंगा।”
“इतनी बदनामी के बाद हर बाप यही करेगा।”
“अंजला!” विवेक रुआंसी आवाज में बोला।
“डैडी! मैं नहीं कर सकती शादी इससे।”
“अबकी बार कह कर देखो…मैं अपने सिर में गोली मार लूंगा।”
“डैडी!”
“ले चलो इसे कार तक।”
नौकर धकेलते हुए विवेक को कार तक ले गए और वह अंजला, अंजला ही चिल्लाता रह गया।
कार बस्ती के बाहर रुकी तो विवेक की मां रीमा देवी सोंटी लिए टहल रही थी। विवेक खुश होकर सेठ से बोला‒
“अ गया मजा…साले अब तुम्हारे को भी पता चलेंगा।”
कार रुकते ही विवेक दोनों हाथ फैलाकर मां की ओर बढ़ता हुआ बोला‒”मां! अपन को बचा ले मां।”
रीमा देवी विवेक को देखते ही उस पर टूट पड़ी‒”कमीने यह वक्त है शरीफ लड़कों के घर आने का।”
“अरे मां-सुन तो सही।”
तब तक गुरनाम भी उतरकर खड़े हो चुके थे…विवेक जल्दी से उनके पीछे छुप गया और रीमा देवी की एक सोंटी गुरनाम की टांगों पर भी पड़ गई।
“आया मजा!” विवेक खुश होकर बोला‒”मां एक और।”
“नहीं बहनजी…सुनिए तो सही।”
“नहीं सुनना मां…बुड्ढा पागल है‒जबरदस्ती अपनी छोकरी मेरे गले मढ़ रहा है।”
रीमा देवी ने गुरनाम को ऊपर से नीचे तक देखा और पूछा‒”कौन हैं आप?”
“मैं बताता हूं।” विवेक ने कहा‒”यह सेठ गुरनाम है…तेरे साथ शादी की बात करने की कहेला…सठिया गया है बुड्ढा।”
“बहन जी सुनिए तो सही…मैं अंजला का बाप हूं‒आपका बेटा साढ़े बारह बजे चोरों की तरह सैनेटरी पाइप द्वारा अंजला के कमरे में घुस आया, उसे कोई खुशखबरी सुनाने के बहाने…हम सब जाग उठे…अड़ोस-पड़ोस में शोर मच गया…मेरी इज्जत और नाम को बड़ा धक्का लगा है…और इस बदनामी से बचने का एक ही उपाय है कि इन दोनों की शादी हो जाए। यह मेरी बेटी अंजला से प्यार करता है।”
“झूठ बोलेला है यह मां…अपनी बेटी को मेरे सिर मंढ़ना चाहेला है।”
“बहन जी। ये दोनों एक-दूसरे को प्यार करते हैं‒अगर आपने मेरी बेटी को अपनी बहू स्वीकार नहीं किया तो मुझे स्वयं आत्महत्या करनी पड़ेगी।”
“क्या बात करता है साला…आत्महत्या करने के लिए इतना बड़ा कलेजा चाहिए‒अपन इसके मरने के डर से शादी नहीं करने का।”
रीमा ने विवेक को सोंटी दिखाकर कहा‒”अरे! तेरा इतना साहस मां के सामने झूठ बोला है‒अंजला जैसी प्यार करने वाली लड़की तो चिराग लेकर ढूंढे से नहीं मिलेगी…और तू खुद अंजला से प्यार करता है…।” फिर वह गुरनाम से नम्रता से हाथ जोड़कर बोली‒”अंजला तो हीरा है…आपको यह नालायक अंजला के लिए कैसे पसंद आ गया?”
“मां!” विवेक बोला‒”अपन तो प्यार का नाटक करेला था…इस आदमी के दिमाग का जरूर कोई स्क्रू ढीला है।”
मां ने सोंटी मारकर कहा‒”बकवास बन्द कर…होने वाले ससुर के साथ बदतमीजी करता है।”
गुरनाम ने रीमा देवी से कहा‒”तो आपको यह रिश्ता स्वीकार है…बहन जी?”
“भाई साहब! अंजला को तो मैं पहले ही बहू स्वीकार कर चुकी हूं।”
“आप धन्य हैं बहन जी! आपने मुझे एक बहुत बड़ी बदनामी और आत्महत्या से बचा लिया है।”
“आइए…अंदर चलकर मुंह मीठा कर लीजिए…पहली बार आए हैं…आपको वैसे ही नहीं जाने दूंगी…बिना नाते की साधारण रस्म के।”
जब वह दोनों आगे बढ़ गए तो साथ आए नौकर आश्चर्य से विवेक को देखने लगे…वह बेहोश पड़ा हुआ था।
