Young Women MP in Loksabha: पिछले कुछ एक दशक से भारतीय महिलाएं विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र के साथ राजनीति की ओर भी तेजी से अग्रसर हो रही हैं। हम गौरवान्वित महसूस करते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 74 महिलाओं ने जीत हासिल की है। जिनमें से 16 प्रतिशत महिला सांसद 40 वर्ष से कम उम्र की हैं, जो बेहद प्रशंसनीय है।
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युवाओं की प्रेरणास्रोत

एक समय था जब भारतीय राजनीति में 40 से 45 वर्ष की आयु युवा मानी जाती थी लेकिन आज यह 40 से घटकर सीधा 25 तक पहुंच गई है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है शाम्भवी चौधरी। 18वें लोकसभा चुनाव में शाम्भवी ने बिहार, समस्तीपुर से लोजपा पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस उम्मीदवार सनी हजारी को 1 लाख 87 हजार 251 वोटों से हराया। लोकसभा चुनाव में इतनी भारी जीत हासिल करने वाली वह सबसे कम उम्र की महिला सांसद हैं। शाम्भवी की उम्र इस वक्त 25 वर्ष है। शाम्भवी, नीतीश कुमार के कैबिनेट मंत्री और बिहार के प्रमुख दलित नेता अशोक चौधरी की बेटी हैं। उनके दादा जी कांग्रेस के कद्दावर नेता रह चुके हैं और वह अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी की नेता हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्री राम कॉलेज से स्नातक की डिग्री लेने के बाद शाम्भवी ने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में दाखिला लिया, जहां से उन्होंने समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर किया।
पढ़ाई पूरी करते ही उन्होंने 2022 में बिहार के पूर्व आईपीएस अधिकारी आचार्य किशोर कुणाल के बेटे सायन कुणाल से शादी कर ली। यह एक अंतरजातीय विवाह था, इस विषय में शाम्भवी का मानना है कि उनके माता-पिता का विवाह भी अंतरजातीय था, यहां तक कि उनके परिवार में अंतरधार्मिक विवाह भी हुए हैं। शाम्भवी कहती हैं कि उनके मायके और ससुराल पक्ष में सभी शिक्षित और समझदार हैं। वह मानती हैं कि उनकी सफलता में सबसे बड़ा हाथ उनके पिता सामान ससुर जी का है। उनका कहना है कि ‘कोई भी सपना छोटा या बड़ा नहीं होता, हर सपने को पूरा करने के लिए बस हिम्मत चाहिए, आप सब हिम्मत से काम लें। सबके सहयोग के लिए मैं हमेशा तैयार रहूंगी। युवाओं से हम कहना चाहते हैं कि हमें सिर्फ एक नेता के तौर पर मत देखिए, आपके साथ हम कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना चाहते हैं।’
जिला परिषद् से संसद तक का सफर

पिछले दिनों लोकसभा चुनाव के परिणामों के बीच सोशल मीडिया में एक वीडियो बहुत वायरल हुआ, जिसमें साड़ी पहने और सिर पर पल्लू किए हुए एक महिला ढोल पर नाच रही थी। यह महिला राजस्थान की भरतपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाली संजना जाटव हैं, जिनकी उम्र महज 26 वर्ष है। इन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राम स्वरूप कोहली को 51,983 वोटों से हराया है। हालांकि, पिछले साल कांग्रेस की टिकट पर उन्होंने राजस्थान विधानसभा चुनाव भी लड़ा जहां उन्हें 409 वोट से मात खानी पड़ी। लेकिन इस साल फिर पार्टी ने संजना का हौसला देखकर उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट दिया, सौभाग्य से जीत भी गईं। संजना का जन्म साल, 1998 में राजस्थान के भरतपुर के भुसावर कस्बे के महत्ता पट्टी में हुआ था। उनके पिता हरभजन पेशे से एक ठेकेदार और उपसरपंच थे। हालांकि, संजना एक होनहार छात्रा थीं लेकिन गांव-बिरादरी को देखते हुए उनके पिता ने बारहवीं पास करते ही उनकी शादी राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल की पोस्ट पर कार्यरत कप्तान सिंह से शादी कर दी। कप्तान सिंह के दादा जी भी सरपंच थे और बहुत खुले विचारों वाले व्यक्ति थे। जिसका प्रभाव कप्तान सिंह और उनके पूरे परिवार पर भी था इसलिए उन्होंने संजना को आगे पढ़ाई जारी रखने के लिए कहा।
महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय के गांधी ज्योति कॉलेज से बीए करने के बाद उन्होंने लॉर्ड्स यूनिवर्सिटी, अलवर से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के बाद वह सरकारी नौकरी करना चाहती थीं लेकिन उनकी सास ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। सास की बातों ने संजना को इतना प्रेरित किया कि उन्होंने सरपंच का चुनाव न लड़कर सीधा जिला परिषद् का चुनाव लड़ा। साल 2021 में कठूमर जिला परिषद का चुनाव जीतने के बाद संजना की राजनीतिक समझ और पक्की हो गई, साथ देश के प्रति सेवा का भाव भी गहरा होता चला गया। एक सांसद होने के अतिरिक्त संजना दो बच्चों की मां भी हैं। उनका मानना है कि ‘सांसद बनने के बाद मैं अपने बच्चों को दिल्ली या फिर अलवर लेकर जाऊंगी ताकि उनके करीब रह सकूं।’
वकालत और राजनीति का तालमेल

वकालत और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं क्योंकि दोनों ही जगहों पर आपके शब्दों का बड़ा ही महत्व है। शायद यही वजह है कि भारतीय राजनीति में अक्सर बड़े नेता पेशे से या तो डॉक्टर हैं या फिर वकील। इसी क्रम में समाजवादी पार्टी की युवा नेता प्रिया सरोज का नाम भी इन दिनों सुॢखयों पर है। जिसकी वजह है उनका भारतीय जनता पार्टी के सीनियर नेता भोलानाथ को 18वें लोकसभा चुनाव में 35,850 वोटों से हराना। उत्तर प्रदेश की मछलीशहर लोकसभा सीट से चुनाव जीतने वाली प्रिया की उम्र इस वक्त 25 वर्ष है। उनका जन्म 23 नवंबर 1998 में उत्तर प्रदेश वाराणसी शहर में हुआ था लेकिन उनकी स्कूली पढ़ाई दिल्ली के एयर फोर्स गोल्डन जुबली इंस्टीट्यूट से हुई है। दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए करने के बाद प्रिया ने अमेटी लॉ कॉलेज से वकालत पढ़ाई पूरी की। हालांकि प्रिया के लिए समाज सेवा और राजनीति में कोई खास अंतर नहीं है। वह दोनों को एक ही चीज मानती हैं, उनके अनुसार राजनीति और वकालत दोनों केवल जनता की सेवा करने का माध्यम मात्र हैं। प्रिया उत्तर प्रदेश के तीन बार के सांसद और वर्तमान विधायक तुफानी सरोज की बेटी हैं और पिछले 7 वर्षों से अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली पार्टी सपा में एक कार्यकर्ता के रूप में अपनी सेवा दे रही थीं। फिलहाल रिया सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रही हैं।
रिया का मानना है कि सांसद बनने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि अन्य क्षेत्रों की तरह महिलाओं को राजनीति में भी आना चाहिए, इस तरह वह देश और समाज में अपनी सहभागिता दिखा सकती हैं। रिया कहती हैं, ‘आज भी कई जगहों पर महिलाओं की स्थिति बहुत खराब है, अशिक्षित होने के कारण वह अपनी बात रखने से डरती हैं। आलम यह है कि वह वोट देंगी या नहीं इस पर भी वह खुलकर नहीं बताती हैं। उनके अपने कोई विचार नहीं हैं। उनका पति जहां कहता है वह वहां वोट डाल देती हैं, मेरे ख्याल में यह तो उनका मूल अधिकार है। मेरा उद्देश्य है कि उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया जाए ताकि वह देश की राजनीति में खुलकर अपने विचार रख पाएं।’ उनका कहना है कि कानून की पढ़ाई करने से पहले ही उन्होंने सोच लिया था कि उन्हें राजनीति में ही आना है लेकिन उन्हें लगा कि कानून की पढ़ाई करने से उन्हें इस क्षेत्र में काफी लाभ हो सकता है। इसके जरिये वह महिलाओं को बता सकती हैं कि संविधान ने उन्हें क्या-क्या अधिकार दिए हैं। रिया मानती हैं राजनीति समाज सेवा करने के लिए सबसे अच्छा प्लेटफॉर्म है इसलिए युवाओं को राजनीति में जरूर आना चाहिए। इससे देश का विकास बहुत तेजी से होगा।
राजनीति ने मुखर बनाया

फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना लेकिन पहनावा और हाव-भाव एक दम सादगी से भरा हुआ, ये हैं 27 वर्ष की इकरा चौधरी, समाजवादी पार्टी की युवा नेता और कैराना से चुनी दूसरी महिला सांसद। इकरा से पहले उनकी मां तबस्सुम हसन भी यहां से सांसद रह चुकी हैं। उनके पिता मुनव्वर हसन और दादा चौधरी अख्तर हसन भी कैराना से सांसद रह चुके हैं। एक तरह से कैराना चौधरी परिवार का राजनीतिक गढ़ माना जाता है यही वजह है कि इस लोकसभा चुनाव में इकरा ने कैराना से 69,116 वोटों पर जीत हासिल की। इकरा का राजनीतिक सफर साल 2016 में हुआ था। उन्होंने अपना पहला चुनाव जिला पंचायत के तौर पर लड़ा था जिसे वह 5 हजार वोटों से हार गई थीं। इसके बाद उन्होंने अपने भाई नाहिद हसन के लिए भी कैम्पेनिंग की थी। इस बीच वह वकालत करने लंदन चली गईं। लंदन से लौटने के बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान कैराना में अपनी पकड़ मजबूत बनाने में लगा दिया जिसके नतीजे 2024 के लोकसभा चुनाव में नजर आए।
इकरा का कहना है पंचायती चुनाव हार जाने के बाद उनका मनोबल थोड़ा कम हो गया था लेकिन उनकी मां ने उन्हें प्रोत्साहित किया। इकरा कहती हैं, ‘मैं बहुत संकोची स्वभाव की हूं, यहां तक कि कॉलेज के दिनों में मुझे अपनी बात रखने से डर लगता था। लंदन जाने के बाद भी मुझ में कोई खास बदलाव नहीं आया। कोर्ट में बोलते समय भी मैं कई बार नर्वस हो जाती थी। मेरे लिए बहुत मुश्किल होता था लोगों के बीच जाकर कुछ बोल पाना।’ इकरा की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के क्वीन्स मेरी स्कूल से हुई है। बीए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज लेडी श्री राम से किया। इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी की और आगे की पढ़ाई के लिए लंदन चली गईं जहां से उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से इंटरनेशनल लॉ एंड पोलिटिक्स में मास्टर डिग्री ली। संसद बनने के बाद इकरा का एक ही उद्देश्य है कैराना के किसानों के लिए आवाज उठाना। इस विषय में उनका कहना है, ‘चुनाव में आवेदन करने के साथ ही मैंने मन में ठान लिया था कि अपने क्षेत्र के लोगों के लिए संसद में आवाज उठाना है, विशेषकर किसानों के लिए।’
