Ram Lalla Black Murti: हाल ही में अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा का भव्य समारोह संपन्न किया गया, जिसमें भगवान राम की प्रतिमा को श्रृद्धापूर्वक स्थापित किया गया। इस अवसर पर देश की कई नामचीन हस्तियों को भगवान राम की प्रतिमा को सामने से देखने का अवसर मिला। भव्य आयोजन के बीच जब मूर्ति को लोगों के दर्शन के लिए खोला गया तो सबके मन में उसके चमकदार काले रंग को देख कई सवाल उमड़ पड़े। आखिर खूबसूरत नैन-नक्श वाली भगवान राम की मूर्ति को काला ही रंग क्यों दिया गया। आखिर इसके पीछे क्या वजह है, चलिए जानते हैं इसके बारे में।
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काले पत्थर का विशेष महत्व

छोटे राम लला की मूर्ति का निर्माण कृष्णशिला पत्थर से किया गया है। माना जाता है कि हिन्दू धर्म में इस काले पत्थर का विशेष महत्व है। अपनी असाधारण गुणवत्ता के कारण ये पत्थर हजारों वर्षों तक टिका रह सकता है। यानी ये समय की कसौटी पर खरा उतर सकता है। जैसा कि आप जानते हैं कि हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा के समय पानी और दूध से अभिषेक करने की प्रथा है, जो लंबे समय में मूर्ति को नुकसान पहुंचा सकती थी इसलिए कृष्णशिला पत्थर का चुनाव किया गया, जो मूर्ति की उम्र और अखंडता की रक्षा करेगा।
वेदों में उल्लेख
आपको बता दें कि वाल्मिकी रामायण में भी भगवान राम का वर्णन श्याम वर्ण से किया गया है यानी भगवान राम को श्याम देह वाला बताया गया है। इसलिए रामलला की मूर्ति के निर्माण के लिए कृष्णशिला का चयन महत्व रखता है। प्राचीन ग्रंथों में भगवान राम के स्वरूप का विवरण दिया गया है, जिसमें उन्हें श्यामल रूप में चित्रित किया गया है। जो कि गहरे रंग का प्रतीक है। इसलिए मूर्ति का स्वरूप और ग्रंथों के बीच विशेष संबंध है।
कई अवतार को दर्शाती है

भगवान राम की मूर्ति पांच साल के बालक के रूप में है, जिसकी ऊंचाई लगभग 51 इंच है। रामलला की मूर्ति को इस प्रकार बनाना गया है जो भगवान के कई अवतारों को दर्शाती है। ये पत्थर विशेषतौर पर मैसूर जिले से मंगवाया गया है। काले रंग के दिखने वाले इस पत्थर का नाम कृष्णशिला रखा गया है क्योंकि इसका रंग भगवान कृष्ण के समान है। इस मूर्ति को इस प्रकार डिजाइन किया गया है जिसे देखकर आप एक ही मूर्ति में कई भगवान के दर्शन कर सकते हैं।
पत्थर की खासियत
कर्नाटक के फेमस मूर्तिकार अरुण योगीराज द्वारा इस मूर्ति का निर्माण किया गया है। मूर्ति के लिए इस्तेमाल किया गया काला पत्थर कर्नाटक से लाया गया है। बताया जा रहा है कि इस पत्थर को मैसूर जिले के जयापुरा होबली में गुज्जेगोदानपुरा में रामदास की भूमि से निकाला गया था। रामदास ने बताया कि इस पत्थर का एक हिस्सा जमीन से बाहर की ओर निकला हुआ था और खेती में बाधा डाल रहा था। खेत को समतल बनाने के लिए जमीन की खुदाई की गई, जिसमें एक विशाल चट्टान निकली जिसे क्रेन की मदद से निकाला गया। पत्थर की गुणवत्ता बेहतर पाई गई और इस बात की जानकारी अयोध्या में मंदिर ट्रस्ट को दी गई। जिसने फिर इसका उपयोग मूर्ति बनाने के लिए करने का निर्णय लिया। इस पत्थर पर किसी भी प्रकार के एसिड का प्रभाव नहीं पड़ता। यानी ये मूर्ति कभी भी खराब नहीं हो सकती। कृष्णशिला नीले-भूरे रंग की है और जब इसपर नारियल और जला हुआ कोको पाउडर लगाया जाता है, तो यह काला हो जाता है।
