Ramayan
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Overview: रावण ने लक्ष्मण को दी ये तीन शिक्षाएं

जब रावण का अंत हुआ, तब भगवान राम ने लक्ष्मण को उसके पास अंतिम शिक्षा लेने क्यों भेजा? जानिए, वो तीन अमूल्य नीतियां, जो रावण ने मृत्युशैय्या पर लक्ष्मण को सिखाईं, जो आज भी जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सबक मानी जाती हैं।

Lessons from Ravana to Lakshman: रामायण केवल युद्ध और धर्म की कथा नहीं, बल्कि गहराई से देखी जाए तो यह जीवन के प्रत्येक पहलू की शिक्षा देने वाली गाथा है। ऐसा ही एक प्रसंग है जब भगवान राम ने रावण वध के पश्चात लक्ष्मण को उसी रावण के पास शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा। यह घटना सामान्य नहीं थी, यह राम की परिपक्व सोच और गहन जीवनदृष्टि का प्रमाण थी।

एक महान विद्वान भी था रावण

रावण को हम अक्सर एक खलनायक के रूप में जानते हैं, सीता का हरण करने वाला, अहंकारी राजा। लेकिन इसी के साथ वह एक अतुलनीय विद्वान, प्रकांड पंडित, वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता, और परम शिवभक्त भी था। ब्रह्मा से वर प्राप्त करने वाला रावण राजनीति, आयुर्वेद, ज्योतिष और नीतिशास्त्र में पारंगत था। राम इस बात को भली-भांति जानते थे। उन्होंने केवल रावण के कर्मों को दंडित किया, उसके ज्ञान को नहीं नकारा।

शत्रु से नहीं, उसकी भूलों से सीखो

जब रावण मृत्युशैया पर था, राम ने लक्ष्मण से कहा कि जाओ और उससे अंतिम ज्ञान प्राप्त करो। राम जानते थे कि युद्ध भले समाप्त हो गया हो, लेकिन असली संघर्ष तो जीवनभर चलता है, अहंकार और ज्ञान के बीच। रावण इस युद्ध में पराजित होकर भी एक उदाहरण बन गया था।

राम का वाक्य था

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“गुरुं प्रच्छ सुशास्त्रज्ञं रावणं परमं द्विजम्।
नान्यः पण्डिततामेति यथा रावणपुंगवः॥”
अर्थात रावण जितना विद्वान दूसरा कोई नहीं। जाओ, उससे ज्ञान प्राप्त करो।

लक्ष्मण की झिझक और राम की दृष्टि

लक्ष्मण चकित थे। जिस राक्षस के विरुद्ध उन्होंने युद्ध लड़ा, जिसकी वजह से सीता माता का हरण हुआ, अब उसी से शिक्षा लेना, पर राम की दृष्टि भिन्न थी, वह व्यक्ति नहीं, उसके भीतर छिपे ज्ञान को देख रहे थे। जब लक्ष्मण ने रावण से सिर की ओर खड़े होकर प्रश्न किया, रावण मौन रहा। राम ने कहा, “ज्ञान प्राप्त करने जा रहे हो, तो शिष्य बनकर जाओ, शत्रु नहीं। उसके चरणों में बैठो।”

रावण ने लक्ष्मण को दी ये तीन शिक्षाएं

जब लक्ष्मण विनम्रता से बैठ गए, तब रावण ने अपनी अंतिम तीन शिक्षाएं दीं..

  • सद्कार्य को कभी टालना नहीं चाहिए : अच्छे कार्य जितना जल्दी किए जाएं, उतना ही बेहतर होता है।
  • दुष्कर्म को जितना संभव हो, टालते रहना चाहिए : बुरे कार्यों से जितना दूर रहें, उतना ही जीवन शांत रहेगा।
  • शत्रु को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए : आत्ममुग्धता और अति आत्मविश्वास विनाश का मार्ग बनते हैं।

राम की जीत शरीर पर नहीं, विचार पर

रावण का अंत हुआ, उसका शरीर मिट गया, पर उसका ज्ञान अमर रह गया। राम ने यह सुनिश्चित किया कि उसके ज्ञान को मिटाया न जाए। उन्होंने दिखाया कि किसी की गलतियों से घृणा की जा सकती है, लेकिन उसके ज्ञान से नहीं। यही दृष्टिकोण उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनाता है, जहां न्याय के साथ करुणा है, और जहां शत्रुता के बीच भी सीखने की विनम्रता।

शत्रु से भी ज्ञान अर्जित किया जा सकता हैं

आज का युग जहां विचारधाराएं आमने-सामने हैं, जहां असहमति को दुश्मनी बना लिया जाता है, वहां राम का यह दृष्टिकोण बेहद प्रासंगिक हो जाता है। यह सीख देता है कि विचार को व्यक्ति से अलग कर देखना सीखो। सत्य और ज्ञान वहां भी हो सकते हैं, जहां हम उम्मीद नहीं करते हैं, शत्रु से भी किया जा सकता हैं।

राम ने रावण को केवल एक दुष्ट के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक ज्ञानवान के रूप में भी सम्मान दिया। लक्ष्मण को उस ‘पराजित’ रावण से सीखने भेजकर उन्होंने एक नई संस्कृति की नींव रखी शत्रु से भी शिक्षा लेने की। यही रामायण की सबसे सुंदर जीत है, अहंकार पर नहीं, ज्ञान की श्रद्धा पर।

मैं आयुषी जैन हूं, एक अनुभवी कंटेंट राइटर, जिसने बीते 6 वर्षों में मीडिया इंडस्ट्री के हर पहलू को करीब से जाना और लिखा है। मैंने एम.ए. इन एडवर्टाइजिंग और पब्लिक रिलेशन्स में मास्टर्स किया है, और तभी से मेरी कलम ने वेब स्टोरीज़, ब्रांड...