सात वर्षीय विहान को अभी कुछ दिनों पहले ही स्कूल में होने वाली डांस प्रतियोगिता के लिए चुना गया था। शुरू में तो विहान काफी खुश था लेकिन पहले दिन अभ्यास के बाद वह जब घर लौटा तो अपनी मां से कहने लगा कि आज डांस के दौरान उसके पेट में दर्द हो रहा था। उसकी मां ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया लेकिन अगले दिन फिर उसने अपने पेट दर्द की बात मां से कही। 4 वर्षीय शनाया जब भी अपने घर में किसी नए व्यक्ति को देखती, परेशान होकर रोने लगती और कमरे में चली जाती। दस साल की महक को परीक्षा के एक दिन पहले से ही उल्टी होने लगती और  बुखार चढ़ जाता।

विहान, शनाया और महक जैसे बच्चों के माता- पिता अपने बच्चों में होने वाले इस भावनात्मक बदलाव को कई दफा समझ नहीं पाते। वे इसे शारीरिक बीमारी समझकर इलाज कराने में जुट जाते हैं। कुछ को मामला समझ भी आता है तो वे इसे अपने लालन- पालन में कमी मानकर चिंता करने में लग जाते हैं। इस तरह के सभी बच्चों के माता- पिता में एक आम बात यह है कि ये कभी भी प्रोफेशनल मदद लेने के बारे में नहीं सोचते हैं। यह कोई बीमारी नहीं बल्कि एंजायटी है, जिसे हिंदी में हम चिंता या घबराहट कहते हैं। नई दिल्ली स्थित कल्पवृक्ष क्लिनिक की साइकोलॉजिस्ट कम मेडिकल काउंसलरडॉ लवलीन मल्होत्राकहती हैं, यह व्यक्ति का प्राकृतिक स्वभाव है और बचपन का एक अहम हिस्सा। हर बच्चा अपने बचपन में इस चरण से गुजरता है, कुछ कम तो कुछ ज्यादा। बच्चे अमूमन कुछ भय और स्थितियों को लेकर इम्यून हो जाते हैं, जो उनके अंदर घबराहट के भाव को बढ़ाता है। जो बच्चे किसी भी तरह के एंजायटी डिसऑर्डर से गुजरते हैं, वे इस तरह की परिस्थितियों से दूर रहने की कोशिश करते हैं। भय का स्तर हम बड़ों की सोच से कहीं ज्यादा मजबूत होता है और यह तब बार- बार बच्चे के अंदर आता है, जब उसका सामना इस तरह की परिस्थिति से होता है।

कई तरह के एंजायटी डिसऑर्डर

 

बच्चों में एंजायटी डिसऑर्डर कई तरह के होते हैं, जिनमें से मुख्य हैं- सेपरेशन एंजायटी, सोशल एंजायटी, जेनेरलाइज्ड एंजायटी और स्पेसिफिक फोबिया। हर तरह का एंजायटी डिसाऑर्डर कुछ विशेष लक्षणों से जुड़ा हुआ है। हालांकि दो मुख्य लक्षण हैं, जो सभी तरह के एंजायटी डिसऑर्डर से जुड़े हुए हैं और हमें इनकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए। यदि एक मां यह ध्यान रख रही है कि उसका लाडला किसी विशेष परिस्थिति या विशेष व्यक्ति से परहेज कर रहा है या उस तरह की परिस्थिति या व्यक्ति का सामना हो जाने पर घबरा रहा है तो जरूरत पड़ती है प्रोफेशनल मदद की। एक हेल्थ प्रोफेशनल ही सही तौर पर बच्चे की मनोस्थिति का आकलन करके माता- पिता को बता सकता है कि क्या उसका बच्चा एंजायटी डिसऑर्डर से गुजर रहा है, यदि हां तो क्यों और इससे उसे दूर करने का क्या समाधान है।

बच्चों में एंजायटी के लक्षण

खराब हो जाने की चिंता

 

कुछ बच्चों में जरूरत से ज्यादा सोचने की आदत होती है। उनका मस्तिष्क हर समय चौकन्ना रहता है और यह सोचता रहता है कि मैं जो काम करने जा रहा हूं, कहीं वह गलत न हो जाए। कई दफा उनका मस्तिष्क खतरनाक दिखने वाली चीजों को लेकर भी घबरा जाता है। जैसे- परीक्षा के दौरान हर समय यह सोचना कि कहीं परीक्षा हॉल में मैं सारे जवाब न भूल जाऊं। मैंने आज होमवर्क नहीं किया है, आज जरूर टीचर से डांट पड़ेगी। इस तरह की सोच रखने वाले बच्चों में एंजायटी डिसऑर्डर का स्तर काफी ज्यादा रहता है।

तर्कहीन डर

 

अधिकतर बच्चे बेवजह की चीजों से डरते हैं। कुछ को अंधेरे से डर लगता है तो कुछ को भूत- पिशाच से। अधिकतर बच्चों के लिए यह डर छोटा रहता है। लेकिन जब यही डर गंभीर हो जाए और बच्चों को सामान्य बचपन जीने से मरहूम करने लगे और वे गंभीर घबराहट का शिकार बन जाएं तो इसे फोबिया कहते हैं। बात- बात पर अकेले कमरे में जाने से डरना, बेवजह भूत की बातें करना और  खुद ही डर भी जाना, ये सब एंजायटी की निशानी है। कई दफा माता- पिता ही बच्चों को खाना खिलाने या कोई अन्य काम करवाने के लिए उनके मन में भूत, अंधेरे का डर बैठा देते हैं। वे उस समय यह नहीं सोचते हैं कि यह डर कभी विकराल रूप भी धारण कर सकता है।

डरावना सपना और बिस्तर गीला करना

 

बड़ों को ही नींद न आने की समस्या नहीं होती, बच्चे भी इसका शिकार हो जाते हैं। कुछ बच्चे रात में आसानी से सो नहीं पाते, उन्हें आराम महसूस नहीं होता। वे रात में कई बार उठ जाते हैं कुछ रात में डरावने सपने देखने की बात करके जाग जाते हैं तो कुछ चीखते या रोते हुए जाग जाते हैं। जो बच्चे लगातार एंजायटी डिसऑर्डर का शिकार रहते हैं, उन्हें नॉकटनल एनुरेसिस का सामना भी करना पड़ सकता है। नॉकटनल एनुरेसिस रात को नींद के दौरान बिस्तर गीला करने की समस्या का नाम है। केवल एंजायटी ही इसका कारण नहीं है, अन्य कई मनोवैज्ञानिक कारक भी इसमें शामिल होते हैं। सही तरह से आरामदायक नींद न आने की समस्या का समाधान जरूरी है और इसके लिए विशेषज्ञ की मदद जरूर लेनी चाहिए।

लगातार आश्वासन के बाद भी शांत न होना

 

जब भी एक बच्चा रोना शुरू कर देता है या गुस्से में होता है तो सबसे ज्यादा कमजोर स्थिति में होता है। उसका छोटा सा मस्तिष्क नई चीजों को ग्रहण करना बंद कर देता है। वह भ्रम में पड़ जाता है, डर जाता है और चीजों को समझना छोड़ देता है। वह चाहता है कि हम बड़े समझें कि उस कठिन स्थिति का सामना करना उसके लिए कितना मुश्किल भरा काम है। वह नहीं चाहता कि उसकी भावनाओं का प्रचार किया जाए या उसे डांटा जाए या उसकी अनदेखी की जाए। वह चाहता है कि आप उसे गोद में लें, पुचकारें और उसे धैर्य से सुनने के बाद समझें।

विशेष मौकों पर सिर दर्द और पेट दर्द

 

आपके लाडले ने पेट दर्द की शिकायत की है और आप उसे चिकित्सक के पास लेकर गए हैं। सारे परीक्षण और जांच हो चुके हैं लेकिन पेट दर्द का कारण नहीं पता चला। बावजूद इसके आपका नन्हा पेट दर्द की शिकायत लगातार कर रहा है तो ध्यान देने की जरूरत है। पेट दर्द कब शुरू हो जाता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि परीक्षा के कुछ दिनों पहले पेट में दर्द होने लगता है या स्टेज पर जाने के समय उसका दर्द शुरू हो जाता है? संभव है कि किसी व्यक्ति को देखकरर उसके सिर में दर्द होने लगता हो। उसकी घबराहट के कारण को समझना आपका काम है, आखिरकार उसके रिलैक्स न महसूस करने का क्या कारण है।

क्या करें पेरेंट्स

 

डॉ लवलीन मल्होत्राके अनुसार, यदि आपका बच्चा किसी घबराहट या डर का सामना कर रहा है तो उसे स्वीकार करें। इस तरह की परिस्थिति किसी कमजोरी का लक्षण नहीं है। उसे और उसकी मनोस्थिति को समझने की कोशिश करें। प्रोफेशनल मदद के लिए आगे बढ़ें, स्कूल काउंसलर या मनोवैज्ञानिक की मदद लें।

अपने बच्चों के सामने सोच- समझकर बर्ताव करें। घर में हमेशा सकारात्मक और सुरक्षित वातावरण बनाए रखें।

रोजाना की उपलब्धियों के लिए प्रोत्साहन के बोल बोलें। अपने लाडले की उपलब्धियों को प्रोत्साहित करने के साथ ही सेलिब्रेट करें। उपलब्धि चाहे छोटी ही क्यों न हो, उसके बड़े स्तर पर सेलिब्रेट करें।

यदि परीक्षा में नंबर कम आए तो डांटने- मारने की बजाय उन्हें समझाएं कि पढ़ाई क्यों जरूरी है।

बच्चे के साथ पर्याप्त समय व्यतीत करें। उनके साथ खेलें, उनसे तमाम तरह की बातें करें।

बच्चों के भावनाओं को समझें। उन्हें शांत होने दें। समझाएं कि ऐसा सबके साथ होता है।

जब वह रिलैक्स हो जाए तो तार्किक तरीके से समझाएं। गहरी सांस लेने के लिए उत्साहित करें।

बच्चा पहले से ज्यादा शरमा रहा है या डर रहा है तो काउंसलर या न्यूरोलॉजिस्ट से मिलना जरूरी है।

गुड टच- बैड टच समझाएं।

क्या न करें पेरेंट्स

 

अपने बच्चे की स्थिति के लिए स्वयं या स्वयं के पैरेंटिंग स्टाइल को न कोसें।

आपके लाडले को जिस स्थिति से घबराहट होती है, उससे उन्हें दूर रहने के लिए न कहें।

उन्हें बोलें कि उन्हें सामान्य तौर पर व्यवहार करना है, न कि अपनी भावनाओं को छिपाना है।

अपने बच्चे की कभी भी किसी दूसरे बच्चे या उनके अपने भाई- बहन से तुलना बिल्कुल न करें। उनकी तरह बनने के लिए कभी न कहें।

भूलकर भी कभी अपने बच्चे के सामने झगड़ा न करें। आप भले ही अंग्रेजी में झगड़ा कर रहे हों और सोचें कि उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है, बच्चा आपकी भाव- भंगिमाओं को देखकर सब समझ जाता है।

अपने बच्चे की उपस्थिति में परिवार या दोस्तों को उनकी स्थिति के बारे में बात न करें।

कब समझें कि हो रही है एंजायटी

 

डॉ लवलीन मल्होत्राके अनुसार, पेरेंट्स के लिए यह जरूरी है कि वे सही समय पर अपने बच्चों को समझें। आपका बच्चा कब एंजायटी का शिकार हो रहा है, इसे समझने के लिए बच्चों पर निम्न ध्यान देना चाहिए-

वह चीजों पर ध्यान नहीं केंद्रित कर पा रहा है।

लगातार उसे कहीं न कहीं दर्द हो रहा हो, जैसे- सिर दर्द या पेट दर्द।

किसी बात पर बेहोश हो जाना या रोने लगना।

स्कूल जाने से कतराना।

अचानक से टैंट्रम्स दिखाने लगना।

छोटी- छोटी बातों पर चिड़चिड़ करना।

भूख में कमी या खाने के तरीके में बदलाव।

बिस्तर गीला करने की समस्या।

रात में बुरे सपने देखकर रोने लगना।

बार- बार शुशु और पॉटी जाना।

किसी विशेष चीज या परिस्थिति से परहेज करना।

सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने से मना कर देना।

मूड स्विंग की समस्या, अचानक गुस्सा आ जाना।

 

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