कविता अपने सात साल के बेटे शुभम से परेशान है। कविता की परेशानी शुभम का डर है, उसे रात में अकेले कहीं भी जाने से डर लगता है। अकेले बिस्तर पर सोना तो दूर की बात है, वह दूसरे कमरे में जा तक नहीं सकता। कविता जैसी कई मांएं अपने बच्चों की इस परेशानी को झेलती होंगी और उन्हें इसका कोई हल नजर नहीं आता होगा। कइयों को तो लगता होगा कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा तो कई को यह बात उतनी बड़ी नहीं लगती। यदि समय रहते बच्चों की इस समस्या को सुलझाया नहीं गया तो उनके विकास पर इसका नकारात्मक असर देखा जा सकता है। छोटे बच्चों में इस तरह की समस्या को “फीयर ऑफ द डार्क’ कहा जाता है।

अंधेरे से डरने की शुरुआत अमूमन बच्चों में तब होती है जब उनकी उम्र 3-6 साल के बीच होती है। अधिकतर माता-पिता अपने बच्चे के इस डर को नजरअंदाज कर देते हैं। उन्हें लगता है कि समय के साथ यह डर समाप्त हो जाएगा, जो जरूरी नहीं है कि खत्म हो ही। इसलिए जरूरी है कि समय रहते ही इस डर से अपने बच्चे को बचाने के रास्ते ढूंढे जाएं। 

नाइट लैंप की मदद

आपका बच्चा घुप्प अंधेरे कमरे में जाने के नाम से डरने लगता है। इससे मुक्ति के रास्ते ढूंढने के तहत बेहतर होगा कि उसे रोशनी मिले। अच्छा होगा कि अपने बच्चे के इस डर को कुछ हद तक मिटाने के लिए उसके कमरे में नाइट लैम्प लगा दें। ऐसे में आपका लाडला बीच रात उठेगा तो खुद को अंधेरे में नहीं पाएगा और न ही रोना शुरू करेगा। साथ ही उसे यह भी महसूस होगा कि आप उसका ध्यान रखती हैं, उसे प्यार करती हैं। उसका खुश और शांत रहना आपके लिए कितना जरूरी है, यह जानते ही वह आपसे पहले से कहीं ज्यादा प्यार करेगा।

अपने बचपन का उदाहरण दें

बच्चे को चाहे कोई भी चीज परेशान कर रही हों, मां-पिता का फर्ज बनता है कि वह उस बारे में बच्चे से बात करें। इससे वह आपसे नजदीकी महसूस करेगा और उसका डर सिर्फ यह सोचकर भी खत्म होने लगेगा कि उसके अपने उसके साथ हैं। बच्चे से पूछें कि आखिर उसे अंधेरे में किस चीज से डर लगता है। उसे उदाहरण देते हुए बताएं कि कई दफा वह कोई खास चीज कैसे किसी के मन में बस जाती है और परेशान करना शुरू कर देती है। और वही बात अंधेरे के रूप में डराती है। आप चाहें तो अपने बचपन की कुछ घटनाएं बताकर उसे समझा सकती हैं। इससे उसे महसूस होगा कि आप हवा में बातें नहीं कर रहीं बल्कि आपके साथ भी ऐसा घटित हो चुका है। उसे लगेगा कि उसे कोई समस्या नहीं बल्कि यह बहुत मामूली बात है। अंधेरे के डर को मामूली समझकर भी वह उससे खुद पार पाने की कोशिश करेगा।

टीवी पर लगाम कसें

बच्चों को टीवी देखना कितना पसंद है, यह बताने की जरूरत नहीं है। दरअसल टीवी पर इन दिनों इतनी हिंसा भी परोसी जाती है, जो बच्चों के अंतर्मन में कहीं गहरे तक बस जाती है। यही हिंसात्मक या डरावनी चीजें रात के अंधेरे में उसके दिमाग पर हावी होकर उसे परेशान करना शुरू कर देती हैं। यदि आपका बच्चा आपसे कहता है कि उसे भूत या ऐसी ही सुपरनैचुरल शक्तियों से डर लगता है तो उसे धमाकने या खुद डरने या हंसने की बजाय उसे समझाएं कि ऐसा कुछ भी नहीं होता। पूरी संभावना है कि आपके समझाने पर उसे महसूस होने लगेगा कि वह गलत है। उससे प्यार से बातें करें, उसे भगवान या भूत से भी ज्यादा शक्तिवान शक्ति के बारे में बताएं। उसे यह समझाएं कि ईश्वर सबसे ज्यादा शक्तिशाली हैं और उनके सामने कोई नहीं टिकता। उसके पास भगवान की एक तस्वीर रखें ताकि उसे यह महसूस हो कि कोई उसकी रक्षा कर रहा है। चाहें तो सबसे बड़ी शक्ति का भान कराने के लिए उसे अपने जीवन की कोई घटना भी सुना सकती हैं, जिसमें सकारात्मक बातें हों। अपने बच्चे को डरावनी व भूतहा फिल्में देखने से मना कीजिए। टीवी पर ज्यादा हिंसा या इसी तरह के आक्रामक दृश्य देखने से परहेज कीजिए। कुछ बच्चे तो रंगे हुए चेहरों से भी डर जाते हैं। उन्हें सिर्फ कार्टून देखने की इजाजत दीजिए।

उपहार की मदद

यूं तो बच्चे कई खेल खेलते हैं लेकिन आप उसके साथ ऐसा खेल खेलिए जो उसके डर को हमेशा के लिए टाटा-बायबाय कर दे। कुछ मिनटों के लिए ही सही, उसे कमरे में अकेले लेटने के लिए कहें। खुद दरवाजे पर खड़े रहिए। उसे यह अहसास दिलाएं कि जब भी उसे डर लगे, वह दौड़कर आप तक पहुंच सकता है। धीरे-धीरे इस समय को बढ़ाते रहिए, यदि पहले दिन आप उसे दो मिनट के लिए अकेले रहने देते हैं तो दूसरे दिन यह अवधि पांच मिनट कर दीजिए। अकेले रहने के लिए उसे उपहार दीजिए। उपहार भी कुछ ऐसा जो उसे तुरंत न मिले, बल्कि कुछ समय बाद मिले। उपहार के लिए भी खेल खेलिए। एक निश्चित समय तक यदि वह अकेले कमरे में रह लेता है तो उसे एक स्टार दीजिए। इस तरह जब उसके पास स्टार की संख्या दस हो जाए तो उसे एक छोटा उपहार दीजिए।

परिवार में लड़ाई- झगड़े से दूरी है जरूरी

परिवार में होने वाले छोटे-मोटे झगड़े भी बच्चों के नाजुक मन पर असर करते हैं। जाहिर सी बात है असर नकारात्मक ही होगा। अधिकतर माता-पिता इस बात को समझ ही नहीं पाते थे कि उनकी लड़ाई का नकारात्मक प्रभाव उनके बच्चे के दिमाग पर गहरे से असर कर रहा है। अधिकतर मामलों में बच्चा अपने परिवार में होने वाले लड़ाई-झगड़े की वजह से भी अंधेरे में जाने से डरने लगता है, इसलिए जरूरी है कि ऐसी परिस्थिति से बचना चाहिए और अपने बच्चे को अहसास दिलाना चाहिए कि वह सुरक्षित और स्वस्थ माहौल में है।

रचनात्मक गतिविधियों पर जोर

कई बार देखा जाता है कि माता-पिता अपने बच्चे के इस डर के बारे में उसके सामने ही औरों से बातें करते हैं। यह ठीक नहीं है। इससे बच्चे के आत्मविश्वास में कमी आती है, उसे महसूस होता कि कुछ ऐसा है जो उसे सबके बीच कमजोर करता है। यदि यह भावना एक बार बच्चे के मन में आ गई तो फिर  उसे निकालना संभव नहीं। उसके डर को निकालने की बात तो दूर ही है। बच्चे के डर को उसके मन से निकालने के लिए उसका ध्यान बांटने की कोशिश करें। अपने बच्चे को उन रचनात्मक गतिविधियों के प्रति प्रेरित करें, जो उसे पसंद है। धीरे-धीरे उसके मन से डर दूर होगा और उसे लगेगा कि आप उसकी अच्छाइयों को देखते हैं, मान देते हैं न कि उसकी कमियों को। 

अकेले सोने की आदत है सही

डरने वाले बच्चों को अपने माता-पिता के बिस्तर में घुसने की आदत हो जाती है। शुरू में तो उन्हें लगता है कि चलो कोई बात नहीं, बड़े होने पर वे समझा लेंगे। लेकिन ऐसा नहीं है, यदि एक बार बच्चे को यह आदत लग गई तो इसे छुड़ाना बेहद मुश्किल है। आदत छुड़ाने के लिए न तो उसे धमकाएं और नही जबरन उसे उसके कमरे में धकेल दें। बल्कि होना तो यह चाहिए कि आप प्यार से उसके कमरे में जाएं, उसे उसके बिस्तर पर लिटाएं और खुद वहीं बैठे रहें। जब वह सो जाए तो अपने कमरे में चले आएं।

(मैक्स अस्पताल के मेंटल हेल्थ एंड बिहेवयरल साइंसेज के डायरेक्टर एंड हेड डॉ समीर मल्होत्रा से बातचीत पर आधारित)

 

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