किशोरावस्था में बच्चे अक्सर काफी गुस्सैल स्वभाव के हो जाते हैं। बचपन में जो बच्चे माता-पिता की एक आवाज पर दौड़े चले आते हैं, वे बड़े होने पर बात-बात पर बहस करने लगते हैं। बड़ों की बातें सुनना बंद कर देते हैं, कई बार तो बहुत ही आवेग में आकर जवाब देते हैं। इस स्थिति में माता-पिता को बहुत ही सावधानी से उन्हें संभालने की जरूरत होती है। आपका एक गलत कदम इस प्यारे से रिश्ते में तनाव भर सकता है। अगर आप भी ऐसी ही किसी परेशानी को फेस कर रहे हैं तो कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
- अपना नजरिया बताएं, बच्चों का सुनें

किशोरावस्था में माता-पिता को हमेशा एक सकारात्मक रणनीति बनाकर बच्चे को संभालना चाहिए। सबसे जरूरी है बच्चों के तर्क शांति से सुनना। जब आप ऐसा करेंगे तो आधी परेशानी तो उसी समय हल हो जाएगी। आप भले ही बच्चों की राय से असहमत हों, लेकिन उन्हें एक दम से नहीं नकारें। इससे वे दुखी होते हैं। इसकी जगह आप उन्हें अपनी राय बताएं और बीच की राह चुनने की कोशिश करें। इससे बच्चों को भी सम्मान महसूस होगा।
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- सीमाएं तय करें और बच्चों को बताएं

हर रिश्ता सम्मान और सहमति की डोर से बंधा रहता है। इसलिए बच्चों का दोस्त बनाने के चक्कर में ऐसा न हो कि वे आपका सम्मान करना ही छोड़ दें। ऐसे में स्पष्ट सीमाएं बनाएं। आप खुद भी इनका अनुसरण करें और बच्चों को भी इनकी पालना करना बचपन से ही सिखाएं। इससे न बच्चे आपका अपमान करेंगे, न ही आपको उन पर चिल्लाने की जरूरत पड़ेगी। अपने विचारों को सुदृढ़ करें। जिससे बच्चे को खुद पता हो कि उसे अपना नजरिया साफ रखना होगा। इससे संघर्ष के हालात नहीं बनेंगे।
- बताएं, पूरी नहीं होगी हर इच्छा

एकल परिवारों में अक्सर एक या दो बच्चे होते हैं। ऐसे में माता-पिता हमेशा उनकी हर मांग और इच्छा पूरी करने के लिए जी जान से जुटे रहते हैं। बच्चों की इच्छा पूरा करना माता-पिता का फर्ज भी है। लेकिन ध्यान रखें कि कहीं ऐसा करके आप उन्हें जिद्दी तो नहीं बना रहे। जी हां, बच्चों की हर सही या गलत इच्छा को मानना ठीक नहीं है। अक्सर माता-पिता बचपन से ही बच्चों की आदत खुद बिगाड़ देते हैं। और किशोरावस्था में जब बच्चों की मांग बढ़ती है तो यह बहस और लड़ाई का कारण बन जाती है। इसलिए बच्चों को बचपन से सिखाएं कि हर इच्छा पूरी नहीं की जा सकती। हां, जो जरूरी है वो तुम्हें मिलेगा। ऐसा करने पर बच्चा अपने दिल और दिमाग दोनों में अपनी सीमा खुद तय करना सीख जाएगा। उसे शांति से यह भी बताएं कि आप उसकी मांग क्यों पूरी नहीं कर रहे। ऐसा करने पर वह आपको समझेगा।
- शब्दों का करें ठीक से चयन

आमतौर पर गुस्से में इंसान सामने वाले को कुछ भी बोल देता है और जब बात बच्चों की होती है तो माता-पिता उन्हें कैसे भी डांट देते हैं। लेकिन आपके बोले गए ये शब्द बच्चे के आत्मसम्मान को छलनी कर देते हैं। इससे उनका आत्मविश्वास भी कमजोर हो जाता है। इसलिए चाहे बच्चा कितने भी गुस्से में क्यों न हो, आप पलट कर गुस्से में उसे कुछ गलत न बोलें। आप इस स्थिति को जब प्यार और शांति से हैंडल करेंगे तो बच्चा थोड़ी देर में अपने आप शांत हो जाएगा। जब वह शांत हो जाए, तब आप उसे अपना पक्ष भी बताएं और पूरे तर्कों के साथ बताएं।
