Damaging Child’s Self-Esteem: चाहे अनुशासन के नाम पर हो या अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए, बच्चे की पिटाई कभी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती, बल्कि यह खुद एक बड़ी समस्या है।
पिछले दो दशकों में किशोर बच्चों में हिंसा की प्रवृत्ति बहुत बढ़ रही है। कुछ अर्सा पहले ऐसे दर्जनों केस देखने को मिले, जब बच्चों ने अपने मित्रों पर जानलेवा हमला किया। बाद में की गई पड़ताल से बड़े ही अजीबो-गरीब तथ्य देखने को मिले। कुछ बच्चे शुरू से ही ऐसे मित्रों की कुसंगति का शिकार थे, जिन्हें हिंसक क्रिया-कलापों जैसे- मारना, पीटना, तोड़ना, फोड़ना, चाकू चलाना, गाली देना आदि में बड़ा ही आनंद आता था।
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इसके अलावा एक और सनसनीखेज मामला देखने को मिला। वह यह था कि हिंसक प्रवृत्ति उन कई बच्चों को माता-पिता से भी विरासत में प्राप्त हुई थी। शोध द्वारा पता लगा कि माता-पिता स्वयं एक-दूसरे से भी मार-पीट करते थे और बात-बे-बात बच्चों पर भी हाथ या हथियार उठा देते थे।
दरअसल बच्चे का मन बड़ा ही कोमल होता है। अगर वह अपने आस-पास गाली-गलौच, मार-पिटाई की बुरी घटनाएं देखता है तो यही उसके आचरण का हिस्सा भी बन जाती हैं। कुछ बच्चे बड़े ही प्रतिभाशाली होते हैं। बुद्धिमान भी कम नहीं होते, लेकिन आत्मविश्वास के मामले में एकदम जीरो साबित होते हैं। उनका प्रदर्शन हमेशा नकारात्मक ही रहता है। असंतोष और उदासी उनमें बहुत गहरे तक अपना असर डाल चुकी होती है, जबकि थोड़े से जागरूक बनकर व थोड़ा सा धैर्य रखकर माता-पिता अपने बच्चे का आत्मविश्वास बनाए रख सकते हैं।
1. सबसे पहले यह खास बात ध्यान में रखनी चाहिए कि बच्चे संवेदनशील होते हैं। अत: उनके सामने छिछोरा व्यवहार व गलत भाषा का प्रयोग कभी न करें। यह कहावत ध्यान में रखें- खरबूजे का बच्चा भी खरबूजा ही बनेगा।
2. अगर बच्चा किसी हिंसक घटना से प्रभावित हो गया है या फिर विद्यालय में मित्र मंडली के व्यवहार से उसकी हिंसा में अचानक रुचि बढ़ गई है तो बच्चे को सहानुभूति व प्यार से बदलने की कोशिश करें। उसे विश्वास दिलाएं कि वह सर्वोत्तम माता-पिता के साथ है और हिंसक आचरण उसके लिए विनाशकारी परिणाम ही लाएगा।
3. बच्चे के बाहरी वातावरण, उदाहरण के लिए पड़ोस के मित्र, रिश्तेदार व स्कूल के मित्रों को ठीक से पहचानें व समझें। बच्चे के साथ ज्यादा से ज्यादा वार्तालाप करें, इससे उसका मन मजबूत होगा और उसकी निर्णय क्षमता पर बड़ा ही सकारात्मक असर पड़ेगा।
4. खतरनाक बातें, गुस्सा, तनाव, किसी के बारे में आपके नकारात्मक विचार, आपसी रंजिश आदि जोर-शोर से आवेश में इनकी चर्चा बच्चों से न करें।
5. चिढ़ना, जलन करना, दु:ख महसूस करना, रोना, दोस्तों की धोखेबाजी आदि ऐसी चीजें हैं, जो सामान्य रूप से सभी के साथ हुआ करती हैं। बच्चों को बार-बार समझाएं कि यह जीवन के अलग-अलग पड़ाव हैं। अपने बचपन की बातें भी उदाहरण के तौर पर बताई जा सकती है।
6. बच्चे के व्यवहार की तुलना कभी गलती से भी किसी बेहतर बच्चे से न करें। इससे उसकी मानसिकता पर नकारात्मक असर पड़ेगा। उसे अपनी स्वाभाविक दिनचर्या या कार्यक्षमता में डूबकर काम करने दें। बच्चे की रचनात्मकता को दबने न दें।
7. बच्चे के मित्र बनें, उसकी छोटी-छोटी उपलब्धियों पर खुलकर प्रशंसा करें। विश्व-भर के बाल-मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहार मनोवैज्ञानिक इस बात पर पूर्णत सहमत हैं कि आत्मविश्वास उन बच्चों में कूट-कूट कर भरा होता है, जो एक रचनात्मक एवं अहिंसक माहौल में रहते हैं। सार यह है कि मार नहीं, प्यार और संतुलित दुलार ही बच्चे को सर्वोत्तम नागरिक बना सकते हैं।
