बच्चों के मन में बनाएँ बचपन की पॉजिटिव मेमोरी
माता पिता और परिवार में साथ रहने वाले सभी बड़ों को बच्चों के सामने कोई भी ऐसा शब्द या बात नहीं बोलनी चाहिए, जो उनके मन में बैठ जाए और एक बुरी याद बन के हमेशा उन्हें परेशान करती रहे |
Parenting Tips: बच्चों के दिलो-दिमाग में बचपन की मेमोरी हमेशा बनी रहती है। बचपन की याद अच्छी हो या बुरी कहीं न कहीं मन में वो बात घर कर लेती है। तभी कहा जाता है कि बच्चे चिकनी मिट्टी से होते हैं, उन्हें जैसा माहौल मिलेगा जैसा हम ढालेंगे वो वैसे ही बन जाएंगे।

इसलिए माता पिता और परिवार में साथ रहने वाले सभी बड़ों को बच्चों के सामने कोई भी ऐसा शब्द या बात नहीं बोलनी चाहिए, जो उनके मन में बैठ जाए और एक बुरी याद बन के हमेशा उन्हें परेशान करती रहे। हमारी कही गयी कड़वी बातें बच्चों के मन में रह जाती हैं और ये बात किसी भी तरह से ठीक नहीं है। बच्चों के सामने इस तरह के शब्द कभी भी इस्तेमाल ना करें।
तुम कुछ नहीं कर सकते

हर बच्चा अलग होता है। सबका अपना-अपना तरीका होता है चीज़ें समझने का रेस्पॉस करने का।कोई स्टडी में काफी ज्यादा अच्छा होता है, कोई एवरेज और कोई स्लो लर्नर होता है। अब ये हम बड़ों को समझना है कि हमें अपने बच्चों के वीक पॉइंट पर काम कैसे करना है। ये नहीं की ज़रा सी बात पर उन्हें डांटा जाए, कम मार्क्स आने पर कुछ पेरेंट्स बच्चों से अक्सर गुस्से में ये कहते नज़र आते हैं कि तुम कुछ नहीं कर सकते, घर पर ही बैठो, स्कूल मत जाओ। इस तरह के व्यवहार से बच्चा अंदर से डरने लगता है, बस वो ही फील कर पाता है कि उस पर इस वक़्त कितना प्रेशर है। बच्चों को प्यार से समझाए उन्हें खुद पर भरोसा करना सिखाएँ।
स्ट्रॉन्ग बच्चे रोते नहीं

बड़ों की तरह बच्चों में भी इमोशंस होते हैं। जब हम बच्चों को रोते हुए देखते हैं, तो जितना जल्दी हो सकें। हम उन्हें चुप करने की कोशिश करने लगते हैं। हमारे बहलाने से उस समय तो बच्चे चुप हो जाते हैं, लेकिन उनके अंदर के इमोशंस वहीं दब जाते हैं। उन्हें लगता है कि शायद रोना गलत है या अपने मन की बात एक्सप्रेस करना भी गलत है। ऐसी सिचुएशन में हमें बच्चों को प्यार से गले लगाना चाहिए। उन्हें कहना चाहिए कि हम समझ सकतें हैं कि आप किसी बात को लेकर परेशान हो, अगर आपको लगता है कि मम्मी-पापा आपकी हेल्प कर सकते हैं, तो हमसे शेयर करो। उन्हें कहें कि क्या पता हमारे पास उसका अच्छा सा सॉल्युशन हो, आपके प्यार भरे शब्द सुन कर बच्चे के चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी।
बाद में बात करेंगे अभी मै बिजी हूँ

माना की पेरेंट्स को भी अपने लिए समय चाहिए होता है लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं है कि हम बच्चों को इग्नोर करना शुरू कर दें। टाइम मैनेज करके हमें बच्चों के साथ भी समय बिताना चाहिए। इससे बच्चों को लगे कि इतना बिजी रहते हुए भी मम्मी-पापा उन्हें समय देते हैं। उनके साथ खेलना, बातें करना पसंद करते हैं। इस तरह बच्चों के साथ आपकी बॉन्डिंग काफी स्ट्रॉन्ग हो जाएगी। बच्चों के मन में हज़ारों सवाल होते हैं। कभी-कभी कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनका कोई जवाब हमें नहीं सूझता है, तो हम कह देते हैं कि जाओ बाद में बात करेंगे। अभी हम बिजी हैं। ऐसा कहने पर बच्चों के नाज़ुक से दिल पर क्या असर पड़ता होगा कभी सोचा है आपने? इस तरह के शब्द कभी भी बच्चों से ना कहें| कुछ जवाब न सूझने पर आप कह सकते हैं की आपका क्वेश्चन तो बहुत ही इंट्रेस्टिंग है, आप मुझे थोड़ा-सा टाइम दो, हम सोचकर अच्छे से आपको इसका जवाब देंगे। बच्चा समझ जाएगा कि उसके सवाल जवाब आपके लिए बहुत मायने रखतें हैं और आप उस पर बहुत ध्यान देते हैं।
ज़रूर तुमने ही शैतानी की होगी

जब बच्चे बाहर जा कर और बच्चों के साथ खेलते हैं, या स्कूल में किसी बच्चे के साथ कोई बात हो जाने पर घर आकर आपको बताते हैं तो आपका ये कहना की “जरूर तुमने ही शैतानी की होगी” बच्चों को डिमोटिवेट करता है। चाहें आप जानते हैं कि आपका बच्चा थोड़ा शैतान है, हो सकता है कि गलती उसकी ही रही हो, लेकिन इस तरह से बच्चों को दोष देना अच्छी बात नहीं है। आप शांत दिमाग से बच्चों को प्यार से पूछ सकते हैं कि क्या हुआ था। अगर तुम सच बताओगे, तो हम कुछ भी नहीं कहेंगे, अगर तुम्हारी गलती भी है, तो हम डांटेंगे नहीं, तुमको समझाएंगे कि इस तरह बिहेव नहीं करते हैं। फिर देखिये आपके प्यार भरे शब्द बच्चे का दिल छू लेंगे और वो कभी भी आपको अपनी बातें बताने में डरेंगे नहीं।
जैसा हम कहेंगे वैसा ही तुम करोगे

बात-बात पर बच्चे पर गुस्सा दिखा कर कहना कि जैसा तुम चाहोगे वैसा नहीं होगा। हम तुम्हारे पेरेंट्स हैं, तुम हमारी हर बात मानोगे। इस तरह के व्यवहार से बच्चा अपना सेल्फ कॉन्फिडेंस खोने लगता है उसे लगता है कि वो इतना कमज़ोर है कि माता-पिता के बिना वो कुछ कर ही नहीं सकता। हर बात में बच्चा पेरेंट्स पर डिपेंड हो जाता है।
छोटे से छोटा फैसला भी खुद नहीं ले पाता है। बच्चों को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश ना करें।उन्हें ठीक तरह से समझाए कि उनके लिए क्या गलत है क्या सही। गुस्से से कही गई किसी भी तरह की बात का असर बच्चे पर नेगेटिव ही होता है। वो अपने आस-पास नेगेटिविटी महसूस करने लगता है। अपना बचपन एन्जॉय करने की जगह वो डरा सहमा रहने लगता है। माता-पिता ही बच्चे का सेफ जोन होते हैं, अगर हम ही इस तरह का व्यवहार करेंगे, तो सोचिये बच्चों पर क्या असर होगा।
