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चिंता की चिता जला दो: Muni shri Thoughts
Muni shri Thoughts

Muni shri : एक छोटा-सा वक्तव्य है। वक्तव्य भले ही छोटा सा है लेकिन उसमें जीवनभर की सीख है। वक्तव्य है ‘जो चला गया उसके लिए मत सोचो। जो नहीं मिला उसकी कामना मत करो और जो मिल गया उसे अपना मत मानो।Ó दुख अपनापन में है। अपना मानने में है। एक जैनाचार्य हुए आचार्य कुन्दकुन्द। उनका यह मार्मिक वक्तव्य है-
एगो मे ससदो आदा, णाण् दंसणलक्खणो।
सेसा मे बाहिरा भावा, सव्वे संजोग लक्खणा॥

मैं एक हूं, अकेला हूं और शाश्वत है। ज्ञान-दर्शन मेरा लक्षण है। मैं शरीर नहीं हूं। मैं जो हूं, वह हूं। बनना मिटना मेरा स्वभाव नहीं। बनता-मिटता है शरीर। जन्मता-मरता है शरीर। मैं एक शाश्वत आत्मा हूं। एगो मे ससदो आदा। मैं एक हूं। एक में बहुत ताकत होती है। एक बहुत बलवान है। वह अपराजेय है, अजित है।
ताश के पत्तों के बारे में जिनको थोड़ी-सी जानकारी है। उन्हें पता होगा कि नहले को दहला हरा देता है। दहले को गुलाम हरा देता है। गुलाम को बेगम हरा देती है। बेगम को बादशाह हरा देता है। बादशाह को इक्का हरा देता है लेकिन इक्के को? इक्के को कोई नहीं हरा पाता। वह अजेय है। तुम इक्का हो बाकी दुनिया कक्का है। सिर्फ तुम ही तुम्हारे हो बाकी सब पराये हैं। इसीलिए जो मिल गया उसे अपना मत मानो। जो नहीं मिला उसकी कामना मत करो और जो चला गया उसके लिए मत सोचो।
आप पति पत्नी के साथ नहीं रहता बल्कि चिन्ता के साथ रहता है। पत्नी पति के साथ नहीं रहती, बल्कि चिंता के साथ रहती है। माता-पिता, बच्चे के साथ नहीं रहते बल्कि चिंता के साथ रहते हैं। बच्चे के जन्म के साथ मां-बाप की चिंता शुरू हो जाती है। बच्चा पैदा हुआ तो उसके खिलौने की चिंता। थोड़ा बड़ा हुआ तो स्कूल भेजने की चिन्ता, स्कूल जाने लगे तो उसकी पढ़ाई की चिन्ता, पढ़ने लगे तो परीक्षा की चिन्ता, परीक्षा हो जाए तो परीक्षा फल की चिन्ता। चिन्ता आदमी के पीछे छाया की तरह लगी है।
बेटा और थोड़ा बड़ा हुआ तो विषय को लेकर चिंता, मनपसंद विषय मिल जाए तो फीस की चिंता, कॉलेज की शिक्षा पूर्ण हो जाए तो नौकरी की चिंता, नौकरी मिल जाए तो छोकरी की चिन्ता, मतलब उसके विवाह की चिन्ता। शादी हो जाए तो उसके बच्चों की चिन्ता। फिर मकड़जाल शुरू। इस तरह आदमी की चिन्ता तभी खत्म होती है जब उसकी चिन्ता जल उठती है। चिन्ता चिता तक है। मैं कहता हूं कि अपनी चेतना को जगा लो और चिन्ता की चिता जला दो।
ध्यान रखो: जो चला गया, उसके लिए मत सोचो और जो नहीं मिला उसकी कामना मत करो और मिल गया उसे अपना मत मानो।
जानना महत्त्वपूर्ण नहीं है, मानना महत्त्वपूर्ण है। कितना सुना-यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, उसे कितना जिया-यह महत्त्वपूर्ण है। कितना खाया-यह महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि कितना बचाया-यह महत्त्वपूर्ण है।
एक सज्जन कह रहे थे: भोजन को खाने में मजा आता है और भजन को गाने में मजा आता है। अगर इस बात को मैं अपने शब्दों में कहूं तो यों कहूंगा कि अमृत को पीने में मजा आता है और प्रवचन को जीने में मजा आता है। तुम्हें मालूम होगा कि बैलगाड़ी में सांड नहीं जोते जाते। जोतोगे तो तुम गिरोगे ही, सांड भी मुश्किल में पड़ेगा और गाड़ी तो चकनाचूर होनी ही है। पाप का अंजाम कभी भी अच्छा नहीं होता।
जो दूसरों के लिए अपनी आहुति देता है उसके लिए ईश्वर के घर से आहुतियां समर्पित की जाती हैं। मेहनत करो, मेहनत एक दिन जरूर रंग लायेगी। दुनिया का सबसे बड़ा जेवर अपनी मेहनत है। जो हाथ सेवा के लिए उठते हैं वे प्रार्थना करने वाले ओठों से अधिक पवित्र हैं। कहते हंै न कि सेवा करोगे तो मेवा जरूर मिलेगा।

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