Maa Kalratri Katha: देवी दुर्गा के सभी रूपों की कथा उनके भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है, मां की महिमा पर विश्वास करने वाले इन दिनों पूरी श्रद्धा से देवी की पूजा और व्रत करते हैं। नवरात्र के सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि कालरात्रि देवी को पूजने से न केवल पाप का नाश होता है बल्कि देवी नकारात्मकता को भी खत्म कर देती हैं उनकी आराधना से शक्ति प्राप्त होती है सभी तरह के संताप का नाश होता है। देवी शुभ फल देने वाली हैं इस कारण उनका नाम शुभंकारी भी है।
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मां कालरात्रि का रूप
असुरों का विनाश करने वाली देवी कालरात्रि का रूप विकराल है। देवी के लम्बे बाल खुले हुए होते हैं। गले में मुण्डमाला पहने हुए देवी के तीन नेत्र हैं। देवी कालरात्रि की चार भुजाएं हैं। एक भुजा में खड्ग है, दूसरी भुजा में लोहे का कांटा है। वहीं दो भुजाएं वरमुद्रा और अभयमुद्रा में हैं। देवी की नासिका से आग निकलती है और देवी का वाहन गधा है।
मां कालरात्रि की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार रक्त बीज नाम का एक दैत्य था जिसने न केवल मनुष्य बल्कि देवताओं के जीवन को भी संकट में डाल रखा था। रक्त बीज को वरदान प्राप्त था की उसके रक्त की बूंद धरती पर गिरते ही उसके जैसा ही एक और दानव पैदा हो जाएगा। देवता इस बात से बहुत दुखी थे। सभी देवता भगवान शंकर के पास अपनी ये समस्या लेकर पहुंचे तब भगवान शंकर के अनुरोध से देवी पार्वती ने अपनी शक्तियों से कालरात्रि देवी का रूप लिया। जब मां कालरात्रि और रक्त बीज के मध्य युद्ध शुरू हुआ तो देवी उसका संहार करके उसका रक्त धरती पर गिरने से पहले ही उसे पी लेती थी। इस रूप में मां कालरात्रि कहलायीं।
कालरात्रि श्लोक
”एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयन्करि।।”
