Maa Katyayani Katha: मां दुर्गा के छठे रूप को देवी कात्ययानी कहा गया है इसलिए नवरात्रि में छठे दिन मां कात्ययानी की पूजा किये जाने का विधान है। हिन्दू शास्त्रों की मानें तो ऋषि कात्यायन की पुत्री होने की वजह से इनका नाम कात्यायनी पड़ा। इन्हें ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी बताया गया हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार कार्तिक मास में उत्तर भारत के पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखण्ड में मनाये जाने वाले त्यौहार छठ में इन्हीं की पूजा की जाती है। छठी मैया ही देवी कात्यायनी हैं जिनकी नवरात्रि के छठे दिन साधना की जाती है।
मां कात्यायनी का रूप

देवी का रूप अत्यंत मनमोहक है, उनकी चार भुजाएं हैं जिनमें दाहिनी हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। एक हाथ में खड्ग और दूसरे हाथ में कमल पुष्प लिए हुए हैं। मां कात्यायनी सिंह पर सवारी करती हैं। देवी आज्ञा चक्र का प्रतिनिधित्व करती हैं क्योंकि इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में अवस्थित होता है जिसे योग साधना में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
देवी कात्यायनी से जुड़ी कथा
पौराणिक कहानियों के अनुसार महर्षि कात्यायन ने मां भगवती की कठोर तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया। देवी ने सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक महर्षि की पूजा ग्रहण की और इसके बाद महिषासुर का संहार किया।
एक अन्य कथा कुछ इस प्रकार है कि रम्भासुर का शक्तिशाली पुत्र महिषासुर का तीनों लोकों पर आतंक बढ़ता जा रहा था। उसे त्रिदेव से कोई भय नहीं था था क्योंकि उसे वरदान था कि वह देवता, असुर और मानव किसी से मात नहीं खा सकता। जिस कारण त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने एक शक्ति को उत्पन्न किया। वह शक्ति ही कात्यायनी मां कहलाईं जिन्होंने महिषासुर का वध कर संसार को दानव से मुक्ति दिलाई।
देवी को अमोघ फलदायनी कहा गया है, ब्रज की गोपियों ने श्री कृष्ण को पति स्वरूप पाने के लिए इन्हीं की साधना कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी। तभी से देवी कात्यायनी ब्रज मंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हुई।
मां कात्यायनी का मंत्र
मां कात्यायनी का श्लोक
”चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन ।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥”

