नवरात्रि का मतलब मां दुर्गा की नौ दिन तक पूजा और अर्चना करना है। इन 9 दिनों में देवी शक्ति दुर्गा की विभिन्न रीति- रिवाजों, पूजा और उपवास द्वारा पूजा की जाती है। हम में से अधिकतर लोग मां दुर्गा के नौ रूपों के बारे में जानते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि इन 9 रूपों के अलग- अलग मंदिर भी हमारे देश में हैं। नवरात्रि 2021 के इस पावन अवसर पर आज इस आर्टिकल में हम मां दुर्गा के नौ रूपों के उन मंदिरों के बारे में जानेंगे, जहां नवरात्रि के दिनों सबसे ज्यादा भीड़ होती है। 

शैलपुत्री मंदिर, वाराणसी

नवरात्रि का पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन वाराणसी के अलईपुर में स्थित प्राचीन शैलपुत्री मंदिर में पहले दिन से भक्तों की भीड़ उमड़ जाती है। इस मंदिर की मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र करने से भक्तों की सभी मुरादें पूरी होती हैं। साथ ही यह भी मान्यता है कि अगर वैवाहिक जीवन में कोई कष्ट है तो यहां दर्शन करने से दूर हो जाते हैं।

इस मंदिर से जुड़ी एक और खास बात यह है कि यहां पर तीन बार आरती होती है। मां शैलपुत्री को चढ़ावे में नीरियल औऱ सुहाग सामान चढ़ाया जाता है। वाराणसी के इस मंदिर से जुड़ी एक कथा भी बहुत प्रचलित है। कहा जाता है कि मां पार्वती ने हिमवान की पुत्री के रूप में जन्म लिया और जिसके कारण शैलपुत्री कहलाई। आपको बता दें कि शौलपुत्री का वाहन वृषभ है।

ब्रह्मचारिणी मंदिर, वाराणसी

वाराणसी के बाला घाट पर स्थित देवी ब्रह्मचारिणी मंदिर में नवरात्रि के दूसरे दिन भक्तों की भीड़ उमड़ जाती है। इस मंदिर की मान्यता है कि यहां दर्शन करने से व्रत सफल होता है। आपको बता दें कि ब्रह्मचारिणी को देवी पार्वती का अविवाहित रूप माना जाता है। यह देवी हमेशा सफेद रंग के कपड़े पहनती हैं। उनके दाहिने हाथ में जप माला और बाएं हाथ में कमंडल होता है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ उनसे है, जो आश्रम में रहे और पवित्र धार्मिक ज्ञान का प्रतीक हों। देवी ब्रह्मचारिणी मंदिर के बारे में एक कथा प्रचलित है कि मां ने कई सालों तक हिमालय पर भगवान शिव को पति के रुप में प्राप्त करने के लिए कड़ी तपस्या की थी। इसके अलावा पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मचारिणी को हिमालय और मैना की पुत्री भी कहा गया है।

चंद्रघंटा मंदिर, वाराणसी

देवी चंद्रघंटा का मंदिर वारणसी के चौक इलाके में स्थित है। चंद्रघंटा का अर्थ है घंटी के आकार का आधा चांद। चंद्रघंटा को साहस की देवी के रूप में पूजा जाता है। मां के इस रूप के दर्शन और पूजन से नरक से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही सुख, समृद्धि, विद्या, सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। इनके माथे पर घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र बना है। मां सिंह वाहिनी हैं और इनकी दस भुजाएं है। मां के एक हाथ में कमण्डल भी है। 

कुष्मांडा मंदिर, कानपुर

मां कुष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। माना जाता है कि देवी कुष्मांडा ने अपने उदर से ब्रह्मांड को उत्पन्न किया है। कुष्मांडा मां को लाल कपड़े, लाल फूल और लाल चूड़ियां अर्पित करना चाहिए। देवी मां का यह स्वरूप मां अन्नपूर्णा का भी है, जो उदराग्नि को शांत करके डर को भी दूर करती हैं। इनकी पूजा से हर तरह के रोग, शोक और दोष दूर हॉ जाते हैं। इनके आठ हाथ हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। कानपुर नगर के घाटमपुर इलाके में कुष्मांडा देवी का मंदिर है, जो अपने आपमें अनोखा है। 

स्कन्दमाता मंदिर, वाराणसी

देवी स्कंदमाता को नवरात्रि के पांचवे दिन पूजा जाता है। स्कंदमाता मंदिर जैतपुरा, वाराणसी में स्थित है। स्कन्दमाता कार्तिकेय भगवान की मां हैं। स्कंदमाता आकाश तत्व की द्योतक हैं। इनमें मातृत्व है और यह सभी तातवों की मूल बिन्दु स्वरूप हैं। इनकी चार भुजाएं हैं और दाहिने ओर की भुजा में भगवान स्कन्द यानी कार्तिकेय गोद में हैं। दाहिने तरफ की नीचे वाली भुजा में कमल फूल है। बाये ओर एक भुजा में वरमुद्रा और दूसरे में कमल फूल है। 

कात्यायनी मंदिर, कर्नाटक

कात्यायनी कात्यायन की पुत्री है। कात्य गोत्र के महर्षि कात्यायन ने कठिन तपस्या करके भगवती पराम्बा से अपनी बेटी के रूप में जन्म लेने का वरदान मांगा था। उनकी बेटी के रूप में जन्म लेने की वजह से इनका नाम कात्यायनी पड़ा। नवरात्रि के छठे दिन कात्यायनी मां की पूजा की जाती है। कर्नाटक के अवेरसा में स्थित श्री कात्यायनी बानेश्वर मंदिर कात्यायनी मां का एक प्रसिद्ध मंदिर है।  इसके अलावा कात्यायनी देवी का मंदिर दिल्ली के छतरपुर मंदिर में, कात्यायनी मंदिर अलापुझा में, श्री कात्यायनी पीठ मंदिर, वृंदावन और कात्यायनी मंदिर, कोल्हापुर भी है। 

कालरात्रि मंदिर, वाराणसी

कालरात्रि देवी की पूजा नवरात्रि के सातवें दिन की जाती है, जो सभी राक्षसों का विनाश करती हैं। इसलिए इन्हें शत्रु नासक और रक्षा की देवी माना जाता है। कालरात्रि मां का मंदिर वाराणसी में स्थित है, जो प्राचीन है और यहां काफी भीड़ होती है। इस मंदिर में बलि चढ़ाने की परंपरा है लेकिन यह बलि नारियल की चढ़ाई जाती है। 

महागौरी मंदिर, लुधियाना

महागौरी की पूजा नवरात्रि के आठवें दिन की जाती है। महागौरी मां के पास वह शक्ति होती है जिससे वह अपने भक्तजनों की सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं। इनकी उपासना से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। वह हर तरह से पुण्य और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है। महागौरी देवी मंदिर वाराणसी और लुधियाना दोनों जगह स्थित है। लुधियाना, पंजाब के शिमलापुरी में स्थित यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां महागौरी स्वयंभू हैं। 

सिद्धीदात्री मंदिर, मऊ

सिद्धिदात्री देवी पार्वती मां का नौवां रूप है और नवरात्रि के दिन पूजा- अर्चना की जाने वाली नौ रूपों का अंतिम रूप। कहा जात अहै भगवान शिव ने सिद्धिदात्री देवी से ही 8 सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी  वजह से ही भगवान शिव का नाम अर्द्धनारीश्वर पड़ा क्योंकि सिद्धिदात्री के कारण ही शिव जी का आधा शरीर देवी का बना था। सिद्धिदात्री मां की पूजा और उपासना करने से अक्षत सिद्धि, नाव निधि, बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है। देवी सिद्धिदात्री मां के मंदिर वाराणसी, मऊ, देवपहाड़ी- छत्तीसगढ़, सतना- मध्य प्रदेश और सागर- मध्य प्रदेश में स्थित हैं। वाराणसी में इनका अति प्राचीन मंदिर मैदागिन गोलघर इलाके के सिद्धमाता में स्थित है। 

Leave a comment