Life Lesson: संसारी और संन्यासी में यही फर्क है कि जो तन और धन की सुरक्षा में लगा है वह संसारी और जो मन और जीवन की सुरक्षा में लगा है वह संन्यासी।
एक पत्नी अपने पति से पूछती है: अगर मैं मर गई तो? पति ने पत्नी के मुख पर हाथ रख दिया और बोला: ऐसी अशुभ बातें नहीं करते। पत्नी को लगा: देखो! ये मुझसे कितना ह्रश्वयार करते है। पत्नी ने फिर कहा: सपोज करो, अगर मैं मर गई तो? पति बोला: फालतू बात करना बन्द करो। पत्नी को लगा: अहा! देखा, ये मेेरे से कितना प्यार करते हैं। पत्नी फिर बोली: कल्पना करो, अगर मैं मर गई तो? पति बोला: ऐसा कैसे हो सकता है? मैं तुम्हें मरने ही नहीं दूंगा। पत्नी को लगा। अहा ये सचमुच में मुझसे कितना प्यार करते हैं। पत्नी ने फिर पूछा: मान लो, मैं मर गई तो? पति बोला: फिर तो मैं पागल ही हो जाऊंगा। ह्रश्वात्नी ने सोचा: देखो ये मुझसे कितना प्यार करते हैं। पत्नी ने आगे फिर पूछा: इसका मतलब तुम दूसरी शादी नहीं करोगे। पति बोला: अब पागल का क्या भरोसा? वह तो कुछ भी कर सकता है। देखा: अन्तत: दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। जिसको तुम प्रेम करते हो, वह महज प्रेम का फ्रेम है।
इसलिए मुनि तरुणसागर की एक बात याद रखना-अपना तन बीवी-बच्चों को दे देना, चल जाएगा। अपना धन सगे-संबंधियों को दे देना, यह भी चल जाएगा लेकिन मन सिवाय ईश्वर के, अपने प्रभु के और किसी को मत देना। अपना दिल जिसमें तुम्हारा दिलवर परमात्मा रहता है, सिवाय प्रभु के और किसी को मत देना। अपना मन दुनिया को दे दिया तो आखिर में धोखा भी खाना पड़ेगा।
संसारी और संन्यासी में यही फर्क है कि जो तन और धन की सुरक्षा में लगा है वह संसारी और जो मन और जीवन की सुरक्षा में लगा है वह संन्यासी। जीवन एक कोहिनूर है। इसके मूल्य को समझिए और इसे महत्त्वपूर्ण बनाइए। विदेशी और भारतीय मूल्यों में काफी अन्तर है। विदेशी मूल्यों में केवल अर्निंग और लर्निंग की सीख मिलती है। जबकि हमारे देश में अर्निंग और लर्निंग के साथ-साथ लिविंग का भी पाठ पढ़ाया जाता है। जीने की कला जीवन को महत्त्वपूर्ण बनाती है।
संसारी की हर बात के पीछे एक राज होता है जो उस राज को समझ लेता है फिर उसे मुनि महाराज बनने में देर नहीं लगती। हर एक का अपना एक स्वार्थ होता है जो उस स्वार्थ को समझ लेता है वह परमार्थ की ओर निकल पड़ता है।
संसार में अधिकारों की बात मत करो, क्योंकि अधिकारों की सच्चाई जानोगे तो पैरो तले की जमीन खिसक जाएगी। संतान को जन्म देने वाली मां कहती है कि इस पुत्र को मैंने जन्म दिया, अत: इस पर मेरा अधिकार है। बाप कहता है कि यदि मैं न होता तो इसका जन्म कहां से होता। अत: इस पर मेरा अधिकार है। बीच में पत्नी आ जाती है, कहती है हटो जी, शादी से पहले तुम्हारा अधिकार हो रहा होगा। अब तो इस पर मेरा अधिकार है। मैं आखिर अपने मां-बाप का घर छोड़कर आयी हूं। एक दिन आदमी मर जाता है। लोग उठकर श्मशान में रख आते हैं। तब श्मशान कहता है, तुम सब वापिस जाओ अब इस पर मेरा अधिकार है, तभी तो मेरे पास आ गया है। मुर्दे को लोग चिता पर रख देते हैं, आग लगा देते हैं। श्मशान की आग कहती है, यह मेरी खुराक है, अत: इस पर मेरा अधिकार है।
मैं पूछता हूं शरीर पर किसका अधिकार है? मां का? बाप का? पत्नी का? श्मशान का? चिताग्नि का? किसका अधिकार है? मुझसे पूछो तो इस शरीर पर सिर्फ भक्ति का अधिकार है, तप का अधिकार है।
तन मिला तुम तप करो, करो कर्मों का नाश।
रवि शशि से भी अधिक है, तुममें दिव्य प्रकाश।
इसलिए अपनी संतान को खूब पढ़ाना-लिखाना, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना किन्तु उस पर अपना अधिकार न जताना। इस बात को मत भूलो कि आपका बेटा बहू की अमानत है। बेटी दामाद की अमानत है। शरीर श्मशान की अमानत है और तेरी आत्मा परमात्मा की अमानत है। एक दिन बेटा बहू का हो जाएगा, बेटी को दामाद ले जाएगा। शरीर श्मशान की राख में मिल जाएगा और आत्मा परमात्मा में खो जाएगी। अमानत को अमानत ही समझिए। उसे अपनी समझना सबसे बड़ी भूल है।
