हम सदियों से अपने रीति-रिवाजों को मानते चले आ रहे हैं जिनमें संस्कारों की भी अहम भूमिका है। पुंसवन, जातकर्म, नामकरण, उपनयन से लेकर पाणिग्रहण तक के संस्कार हम करते हैं। यह सारे संस्कार हम सिर्फ इसलिए पूरे करते हैं क्योंकि हमारे पूर्वजों ने भी ऐसा ही किया था। संस्कारों से हमारा जीवन बहुत प्रभावित होता है। संस्कार के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों में जो पूजा, यज्ञ, मंत्रोच्चाण आदि होता है, उसका वैज्ञानिक महत्त्व साबित किया जा चुका है। लेकिन क्या कभी हमने यह सोचने की कोशिश की है कि इन संस्कारों के पीछे वजह क्या है, इनका प्रभाव और लाभ क्या है? और किस तरह ये विज्ञान की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं- आइए जानते हैं। 

संस्कार क्या हैं?

संस्करण या संशोधन का नाम संस्कार है। शरीर पर की जाने वाली क्रियाओं से जो विशिष्टता आ जाती है वही संस्कार हैं। पूर्व विद्यमान पदार्थों के दोषों को हटाकर गुणों को समाहित करने के लिए संस्कार आवश्यक है। संस्कार विहीन व धर्माश्रय विहीन व्यक्ति को पशुवत माना गया है। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि संस्कारों को पूर्ण करने पर ही मानव द्विज कहलाता है। ‘संस्कारात द्विज उच्यते’ द्विज शब्द का तात्पर्य दूसरा जन्म माना जाता है तथा संस्कारों से संस्कारित करना भी पुनर्जन्म कहलाता है। ये संस्कार गर्भाधान के पूर्व से लेकर मृत्यु पर्यंत तक के हैं। उनमें कई संस्कार दोषों को हटाने वाले हैं, तो कई संस्कार गुण डालने वाले हैं। ‘गौतम धर्मसूत्र’ में इनकी संख्या 48 है, लेकिन ‘महाभारत’ के अनुसार मुख्य संस्कारों की संख्या सोलह है। 

जन्म से मृत्यु तक सोलह संस्कार ही वैदिक विधान में महत्त्वपूर्ण माने गए हैं इन सभी संस्कारों के वैज्ञानिक (चिकित्सकीय व भौतिक) तथा आध्यात्मिक आधार हैं। संपूर्ण जीवन संस्कारों पर आधारित है। मृत्यु से पूर्व, मृत्यु के उपरान्त, जन्म से पूर्व व जन्म के उपरान्त धर्मानुसार सभी प्रकार की उन्नति संस्कारों के द्वारा ही संभव है। जीवन भी एक अनुष्ठान है, एक यज्ञ है जिसमें आदि और अन्त तक संस्कारों की प्रधानता है। संस्कारों के बिना जीवन पशु जीवन के समान है।

गर्भाधान संस्कार-संस्कारों में पहला संस्कार गर्भाधान का है संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाली स्त्रियों का गर्भाधान संस्कार किया जाता है। यह ऐसा संस्कार है, जिससे हमें योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान के लिए गर्भ धारण किस प्रकार करें, इसका विवरण दिया गया है। इस संस्कार से कामुकता का स्थान अच्छे विचार ले लेते हैं।

माता-पिता के संयोग से जो सन्तानोपत्ति होती है, उसमें माता के रज में योषाप्राण एवं पिता के शुक्र में वृषाप्राण रहता है। इसमें कितने ही आगन्तुक दोषों के कारण ये प्राण दूषित हो जाते हैं। अन्य कारणों के अतिरिक्त ग्रह दोष, पितृ दोष, नाड़ी दोष, व्याधि दोष, अतिवायव्य दोष इत्यादि के प्रभावों से भी ये प्राण दूषित हो जाते हैं। गर्भस्थापन के समय इन सभी दोषों से मुक्ति के लिए यह संस्कार किया जाता है। मंत्र शक्ति के माध्यम से इन दोषों का बालक के मन पर प्रभाव न पड़े इसलिए यह संस्कार किया जाता है।

पुंसवन संस्कार-गर्भधारण का निश्चय हो जाने पर गर्भस्थ शिशु को पुंसवन नामक संस्कार से अभिषिक्ति किया जाता है। यह संस्कार गर्भस्थापन के तीन माह के अन्दर करने का विधान है। इस संस्कार के माध्यम से वृषाप्राण को बल प्रदान किया जाता है, जिससे पहली संतति पुरुष ही होती है। क्योंकि गर्भाधान काल से लेकर तीन माह तक शिशु लिंग का निर्धारण होता है। इस संस्कार का तात्पर्य केवल पुत्र करना ही नहीं बल्कि गर्भस्थ संन्तान को बल, बुद्धि व स्वस्थ्य मस्तिष्क व उत्तम संस्कारों से युक्त बनाना भी है। इसमें माता-पिता दोनों ही गर्भस्थ बालक के शारीरिक व मानसिक विकास में प्रयत्नशील रहने का व्रत लेते हैं।

सीमन्तोन्नयन संस्कार- यह संस्कार गर्भ के चौथे, छठवें और आठवें महीने में किया जाता है। यह संस्कार गर्भपात न हो, गर्भ की संन्तान नष्ट न हो तथा गर्भ की संन्तान सुरक्षित रहे व उसे ईश्वर की अनुकम्पा व कृपा प्राप्त होती है इसके लिए किया जाता है। इस संस्कार का प्रयोजन गर्भस्थ बालक की मानसिक शक्तियों को उन्नत करना है। इसे सीमन्तकरण संस्कार अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमंत का अर्थ है- स्त्रियों के सिर की मांग और उन्नयन का अर्थ है- ऊपर उठाना। सिर में विभक्त हुई पांच संधियों को ही मांग कहा जाता है। इस संस्कार में मांग को ऊपर उठाकर यह बताया जाता है कि आज से स्त्री न तो शृंगार करें और न ही पति से शारीरिक सम्पर्क स्थापित करें, क्योंकि ऐसा करने से गर्भपतन की आशंका रहती है। मांग न निकाल कर केश रखना गर्भ के लिए हितकारी होता है। इस संस्कार में देवपूजा द्वारा गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म आएं, इसके लिए मां उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है। भक्त प्रहलाद और अभिमन्यु इसके उदाहरण हैं।

जातकर्म संस्कार- जातकर्म संस्कार शिशु के जन्म लेने के बाद किया जाता है। इससे शिशु की मेधा, आयु, बल की वृद्धि होती है। जिस तरह खान से निकले सोने या मणि को शुद्ध करके उसके दोषों को दूर करके उसे अधिक चमकीला बना दिया जाता है, उसी प्रकार मां के गर्भ में रहने के कारण शिशु में जो दोष-गंदगी रहती है, उसे जातकर्म संस्कार से दूर किया जाता है। जातकर्म संस्कार में सोने की श्लाका को पत्थर पर घिसकर उसमें शहद और घी मिलाकर नालछेदन के पूर्व अनामिका उंगली (तीसरे नंबर की) से शिशु की जिह्वïा पर रखा जाता है। यह क्रिया बच्चे की आयु तथा बुद्धि बढ़ाने वाली रासायनिक औषधि का काम करती है।

नामकरण संस्कार-नामकरण संस्कार से आयु एवं तेज की वृद्धि तथा व्यवहार की सिद्धि होती है। बिना नाम के काम नहीं चल सकता, इसीलिए नामकरण संस्कार का विधान बनाया गया है। जन्म के बाद 11वें या सौवें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। ब्राह्मïण द्वारा ज्योतिष आधार पर बच्चे का नाम तय किये जाने कि परंपरा है। इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाया जाता है। उसके नए नाम से सभी लोग उसके स्वास्थ्य व सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। नामकरण का प्रभाव आगे चलकर बालक पर बहुत गहरा पड़ता है। इससे अधिक व्यक्तित्व का प्रादुर्भाव होता है, इसलिए बालक का नाम व्याकरण सिद्द, शुद्ध एवं सुंदर रखना चाहिए, क्योंकि शब्दों के भी अर्थ होते हैं। जन्म के समय जो नक्षत्र हो, उसके आधार पर नाम रखना चाहिए। ‘मानव गृहस्यं सूत्र’ में भी उल्लेख है कि ‘यशस्यं यनामधेयं देवताश्रयं च’ यानी नाम ऐसा रखना चाहिए जो यशोवर्द्धक या यश का सूचक हो अथवा किसी देवता व नक्षत्र के द्योतक हो। नाम दो रखने चाहिए। एक जन्म नक्षत्र के आधार पर हो, जिसे राशिनाम कहते हैं और दूसरा नाम अपनी रुचि के अनुसार हो।

निष्क्रमण या सूर्यदर्शन संस्कार-निष्क्रमण का अर्थ है, बाहर निकलना। बालक को चौथे महीने में घर से बाहर निकलने पर बाहरी परिवेश में प्रवेश कराने पर यह संस्कार किया जाता है। जन्म के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। इसमें शिशु को सूर्य का दर्शन करवाया जाता है- ‘अर्कस्येक्षा मसि चतुर्थ के।’ कहा जाता है कि तीन महीने तक बच्चे को घर के अंदर रखना चाहिए। उसे सूर्य का दर्शन नहीं करवाना चाहिए। क्योंकि पहले तीन मास तक शिशु की आंखें कोमलतावश सूर्य का प्रकाश सहन करने में असमर्थ होती हैं। इससे पहले उसकी आंखों को सूर्य के प्रकाश से हानि पहुंच सकती है। तीन महीने तक शिशु की आंखों में शक्ति का संचय हो जाने पर मध्यम क्रम से घर के दीपक की ज्योति देखने में अभ्यस्त हो जाने पर उसकी आंखें बाहरी प्रकाश में गमन के योग्य हो जाती हैं। तब शिशु को सूर्य दर्शन करवाया जाता है। इस संस्कार से सूर्य की जीवन शक्ति और घर से बाहरी शुद्ध वायु का भी बच्चे के अंदर संचार होता है। 

 

अन्नप्राशन संस्कार-शिशु जब छह महीने का हो जाता है तब उसके अच्छे विकास और स्वास्थ्य के लिए अधिक पोषक आहार की जरूरत होती है, क्योंकि उस समय मां का दूध शिशु के लिए पर्याप्त नहीं होता है। गर्भ में रहते हुए बच्चे के पेट में गंदगी चली जाती है, अन्नप्राशन संस्कार बच्चे को शुद्ध भोजन करवाने का प्रसंग होता है। बच्चे को सोने-चांदी के चम्मच से खीर चटाई जाती है। यह संस्कार बच्चे के दांत निकलने के समय अर्थात् 6-7 महीने की उम्र में किया जाता है। इस संस्कार के बाद बच्चे को अन्न खिलाने की शुरुआत हो जाती है।

शास्त्रों के अनुसार अन्न को जीव का प्राण कहा है। इसलिए इस महीने में बालक का पाचन तंत्र भी अन्न को ग्रहण करने योग्य हो जाता है। अन्न से केवल शरीर का पोषण ही नहीं होता बल्कि मन बुद्धि, तेज, आत्मा का भी पोषण होता है। शुद्ध और सात्विक व पौष्टिक अन्न को ही आजीवन ग्रहण करने के व्रत लेने हेतु इस संस्कार को संपन्न कराया जाता है।

मुंडन या चूड़ाकरण संस्कार-बच्चे की उम्र के पहले वर्ष के अंत में या तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष के पूर्ण होने पर बच्चे के बाल उतारे जाते हैं, जिसे वपन क्रिया संस्कार, मुंडन संस्कार या चूड़ाकर्म संस्कार कहा जाता है। माता के गर्भ से आए हुए शिशु के बाल अशुद्ध होते हैं, शिशु के गर्भ के बालों के साथ बहुत से रोगाणु सिर में रहते हैं। जिसके कारण उसके तेज की वृद्धि नहीं होती। उन केशों को मुंडवाकर शिखा रखी जाती है। शिखा से आयु एवं तेज की वृद्धि होती है। इससे बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है।

कर्णवेध संस्कार-जिस बालक का चूड़ाकरण संस्कार हो गया हो उसका कर्णवेधक संस्कार करना चाहिए। कर्णवेध का अर्थ है- कान छेदना। यह संस्कार जन्म के छह माह बाद से लेकर पांच वर्ष की आयु के बीच किया जाता था। यह परंपरा आज भी कायम है। इसके दो कारण हैं, एक आभूषण पहनने के लिए। दूसरा कान छेदने से एक्यूपंक्चर होता है। इससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होता है।

इस संस्कार में सर्वप्रथम दाहिने कान का वेधन किया जाता है तथा बाद में बायें कान का। दाहिना कान ब्रह्मïशक्ति से पूर्णर् तेजस्वी होने तथा बायां कान क्षात्र शक्ति से पूर्ण होने का द्योतक है। इस संस्कार में ईश्वर से कामना की जाती है कि बालक शास्त्र एवं शस्त्र दोनों में ज्ञान समृद्ध हो। ज्ञान एवं बल दोनों का समुचित विकास हो।

उपनयन संस्कार-उप यानी पास और नयन यानी ले जाना। गुरु के पास ले जाने का अर्थ है, उपनयन संस्कार। इसे यज्ञोपवीत संस्कार भी कहा जाता है। इस संस्कार में बालक को जनेऊ पहनाकर गुरु के पास शिक्षा अध्ययन के लिए ले जाया जाता था। आज भी यह परंपरा है। जनेऊ में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता-ब्रह्मï, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। फिर हर सूत्र के तीन-तीन सूत्र होते हैं। ये सब भी देवताओं के प्रतीक हैं। आशय यह  है कि शिक्षा प्रारंभ करने से पहले देवताओं को मनाया जाए। जब देवता साथ होंगे, तो अच्छी शिक्षा आएगी ही। उपनयन संस्कार माघ मास, फाल्गुन मास, चैत्र मास वैशाख में करना शुभ होता है। इससे बच्चा धनवान, भाग्यवान, दृढ़  प्रतिज्ञावाला, बुद्धिशाली अथवा विद्धान होता है।

केशांत संस्कार-इसका अर्थ है केश यानी बालों का अंत करना, उन्हें समाप्त करना। विद्या अध्ययन से पूर्व भी केशांत संस्कार किया जाता है। मान्यता है, गर्भ से बाहर आने के बाद बालक के सिर पर माता-पिता के दिए बाल ही रहते हैं। इन्हें काटने से शुद्धि होती है। शिक्षा प्राप्त के पहले शुद्धि जरूरी है, ताकि मस्तिष्क ठीक दिशा में काम करे। विद्या एवं गुरु के प्रति निष्ठा एवं संयम का महत्त्व इस संस्कार से अनायास ही प्रकट होता है।

विद्यारंभ संस्कार-जीवन को सकारात्मक बनाने के लिए शिक्षा जरूरी है। शिक्षा का शुरू होना ही विद्यारंभ संस्कार है। बालक को सर्वप्रथम अक्षरों की पहचान करवाने के लिए अक्षरारंभ संस्कार किया जाता है। अक्षर ज्ञान की प्राप्ति के बाद विद्यारंभ संस्कार किया जाता है। सबसे पहले गणित अंक विद्या का प्रारंभ करवाना शुभप्रद होता है। विद्यारंभ के लिए गुरुवार का दिन सर्वश्रेष्ठ है।

विद्यारंभ संस्कार सुयोग्य आचार्य द्वारा संपन्न कराया जाता है। शास्त्रों में दो प्रकार की विद्यायें बताई गई हैं। एक विद्या जिसकी मनुष्य की आत्मोन्नति का साधन है। दूसरी सांसारिक विद्या है जो जीवन निर्वाह में अनिवार्यता होती है। शास्त्रों में दोनों ही ज्ञान को महत्त्वपूर्ण माना गया है।

समावर्तन संस्कार-इसका अर्थ है फिर से लौटना। आश्रम में शिक्षा प्राप्ति के बाद ब्रह्मïचारी को फिर दीन-दुनिया में लाने के लिए यह संस्कार किया जाता था। इसका आशय है, ब्रह्मïचारी को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षों के लिए तैयार करना।

पाणिग्रहण या विवाह संस्कार-पाणिग्रहण संस्कार सांसारिक अव्यवस्था को दूर करने वाला सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण एवं पवित्र संस्कार है। इसे विवाह या परिणय संस्कार भी कहते हैं। अपने वंश व कुल की श्रेष्ठता अनवरत बनी रहे, अक्षुण्ण बनी रहे, वंशानुगत गुणों की सुरक्षा एवं अभिवृद्धि के लिए समाजोचित व वर्णोचित विवाह करना ही श्रेष्ठ माना गया है।  इस संस्कार में मनपसंद साथी का चुनाव कर लड़का-लड़की का पारंपरिक रीति-रिवाजों और कुलधर्म के अनुसार पाणिग्रहण संस्कार किया जाता है। इस संस्कार के कारण वे जीवनपर्यंत एक-दूसरे का साथ निभाने के लिए बाध्य होते हैं।

वानप्रस्थ व संन्यास ग्रहण संस्कार-कुछ आचार्यों के मतानुसार विद्यारम्भ और केशान्त को संस्कार नहीं माना गया है। उनके स्थान पर वानप्रस्थ और संन्यास ग्रहण करने को संस्कार माना गया है। शास्त्रों व पुराणों में इनका विषद वर्णन मिलता है।

अंत्येष्टि संस्कार-इसका अर्थ है, अंतिम यज्ञ। मनुष्य की मृत्यु के उपरान्त ही इस संस्कार का विधान है। जो स्थानानुसार, परिवेशानुसार थोड़े बहुत अन्तर के साथ देखने को मिलता है। इस संस्कार को योग्य आचार्यों के द्वारा मृत व्यक्ति के कुटुम्बीजनों (पुत्र-पौत्रादिक) द्वारा संपन्न किया जाता है। इस संस्कार की उपयोगिता तथा आवश्यकता परमावश्यक है। प्रत्येक धर्म में अंतिम संस्कार या अन्त्येष्टि संस्कार का विधान है।  आज भी शवयात्रा के आगे घर से अग्नि जलाकर ले जाई जाती है। इससे चिता जलाई जाती है। आशय है विवाह के बाद व्यक्ति ने जो अग्नि घर में जलाई थी, उसी से उसके अंतिम यात्रा की अग्नि जलाई जाती है। मृत्यु के साथ ही व्यक्ति स्वयं इस अंतिम यज्ञ में होम हो जाता है। हमारे यहां अत्येष्टि को इसलिए संस्कार कहा गया है क्योंकि इसके माध्यम से मृत शरीर नष्ट होता है। इससे पर्यावरण की रक्षा होती है।

इस प्रकार ऋषि-मुनियों और पूर्वजों द्वारा बनाए गए इन संस्कारों के पीछे कोई न कोई उद्देश्य अवश्य है। इनका पालन करने से मानव-जीवन निश्चय ही सफल और सुख-शांतिपूर्वक व्यतीत होता है। ये संस्कार केवल धार्मिक दृष्टि से ही पालनीय नहीं है, बल्कि विज्ञान की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। 

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