वाह्य जगत की भांति ही मानव शरीर के आन्तरिक अवयव भी लयबद्ध हैं। इसी कारण शरीर के भीतर खून दौड़ता है। फेफड़े हवा पीकर फिर छोड़ते हैं। यौवन, बुढ़ापा आ रहा है। दूसरी मशीनों की तरह शरीर के पुर्जों में भी थकान बिन्दु आ रहा है। शरीर मृत हो रहा है। वैज्ञानिक इसे ‘माइक्रोज्म’ ‘क्षुद्र जगत’ या ‘प्राणी’ कहते हैं। प्रत्येक वस्तु पंचतत्त्वों अर्थात् पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि, और वायु के योग से बनी है। अब वैज्ञानिकों ने इन्हीं के विविध रूप खोजकर इनकी संख्या एक सौ अठानवे तक पहुंचा दी है। शरीर भी इन्हीं पंचतत्त्वों से बना है, जिसमें जीवन अपने आप आता-जाता है। ऐसा कैसे होता है, इसका उत्तर विज्ञान के पास अभी भी नहीं है।’

जीवधारियों में मानव सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि उसके पास चौदह करोड़ कोष्ठकों वाला एक दिमाग है जो सोचता है, याद रखता है, योजनायें बनाता है, प्रत्यक्षीकृत करता है, कल्पना करता है, तर्क करता है, भावुक हो उठता है । इसके अतिरिक्त झूठ, ईर्ष्या, लोभ, मोह आदि विशेषताएं भी मानव मस्तिष्क में पाई जाती हैं।

अपने को ब्रह्माण्ड से अलग एक स्वतंत्र इकाई मानना ही अज्ञान है। यदि आदमी का दिमाग अपने आपको सम्पूर्ण ब्रह्मïाण्ड से जुड़ा हुआ मानता है, तो यही ज्ञान एवं समझदारी है। जब यही दिमाग पूरे ब्रह्माण्ड को किसी विराट शक्ति का रंगमंच मानकर उसके समक्ष विनम्र होकर कृतज्ञता से भर जाता है तो यह हुआ अध्यात्म या धार्मिक होने की शुरुआत। कोई भी नियम कैसे कार्य करता है, इसकी तथ्यपरक पड़ताल से विज्ञान का जन्म हुआ। चाहे जितना जान लिया जाये, तब भी इसे नहीं जाना जा सकता, इस प्रतीति से धर्म या अध्यात्म का जन्म हुआ।

पश्चिमी विचारधारा के अनुसार प्रकृति की शक्तियां मनुष्य से अलग हैं। अत: पश्चिम ने उसे चुनौती के रूप में स्वीकार कर उस पर विजय पानी चाही। भारत ने प्रकृति को मैत्री भाव से देखा इसलिए शिव का भाव जागा। प्रकृति के साथ सहकार भाव शिव है तथा प्रकृति के साथ अतिचार भाव ही अशिव है। प्रकृति अलग है और मनुष्य अलग, इस धारणा से वैज्ञानिकता को बढ़ावा मिला, परन्तु जो ब्रह्मïाण्ड में है वही इस शरीर (पिंड) में भी है, इस धारणा से भारत का ऋषि आत्म प्रगति की ओर बढ़ा और उसने पाया कि सब एक ही तार से जुड़े हैं। सब से ‘वही’ (वही शाश्वत नियम, विराट शक्ति या ईश्वर) झलक रहा है। सब छवियां उसी की छवियां हैं। ‘वह’ रूप या ढांचा भले बदलता हो, हमेशा के लिए नष्ट कभी नहीं होता। भारतीय ऋषियों के इसी चिन्तन एवं मान्यता को सनातन धर्म की संज्ञा प्रदान की गयी। इसकी दृष्टि को सर्वात्मवादी दृष्टि कहा गया क्योंकि ‘जीवन’ नाम से प्रवाहित ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, वह सिर्फ शरीर बदलती है। इसी वजह से भारत में पुनर्जन्म का सिद्धान्त बना।

उपनिषद काल तक उस विराट चेतना की कोई तस्वीर नहीं थी, परन्तु अपनी कल्पनाशक्ति प्रकृति के कारण मनुष्य ने ‘उसकी’ एक प्रतिमा गढ़ डाली। राम-कृष्ण सदृश महापुरुषों में अति मानवीय गुण पाकर पूर्वजों ने कहा ‘वह’ कभी-कभी मानव रूप में पृथ्वी पर भी उतरता है। इस तरह अवतारवाद का सिद्धान्त बना। मनुष्य ने अपने भीतर के आत्मतत्त्व को पहचानने के साथ ही वाह्य परम आत्मतत्त्व को भी पहचाना तथा उसे परमात्मा कहा। भारत की तरह अवतारवाद की कल्पना अन्य देशों ने भी की। ईसा, मोहम्मद आदि महापुरुषों को भी वहां के लोगों ने मसीहा, देवदूत, खुदा या स्वयंभू माना।

भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार सृष्टि नित्य है, उसका चक्र चलता ही रहता है। अत: पुनर्जन्म निश्चित रूप से होगा। जबकि ईसा-मोहम्मद आदि के अनुयायियों का कहना है कि पुनर्जन्म नहीं होता। एक जन्म में पचास-अस्सी वर्ष जी लेने के बाद मृत्यु है, कब्र है, जहां लाखों वर्ष पड़े रहने के बाद कयामत के दिन परमात्मा सबके कर्मों का लेखा-जोखा करके फैसला सुनायेगा। उसी दिन स्वर्ग या नरक में रहने का स्थान देगा। ईसाई और इस्लाम मानने वालों का कहना है कि बाइबल, कुरान आदि ग्रंथों में जो नियम या आदेश है, वे ही सत्य हैं। इसके बाहर जो कुछ भी है, वह मानवीय नहीं है। इस तरह ये धर्म रुढ़िवादी हो जाते हैं। सभी में एक ही परमात्मा व्याप्त है, ऐसा न मानने के कारण इन धर्मों में जीव-हत्या भी वर्जित नहीं है। जबकि सनातन धर्म के अनुसार परमात्मा हर जीव, आकाश, सूर्य, पर्वत, फूल, चिड़िया, पानी, हवा, बादल सभी में हैं। वह अनेक रूपों में सृष्टि में व्याप्त है। अत: उसके करोड़ों रूप हैं। फिर भी उस ईश्वर की राम-कृष्ण के साकार रूप में कल्पना करके, उनकी मूर्ति या चित्र को सामने रखकर उनका गुणगान करना और उन्हीं के आदर्शों को जीवन में चरितार्थ करना ही जागे हुए आदमी का लक्षण माना गया।

पहले चेतना या प्राणतत्त्व उत्पन्न होता है और फिर कर्मकांड का उद्ïभव होता है। धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय (चोरी न करना), शौच, इन्द्रिय-निग्रह, घी, विद्या, सत्य और अक्रोध इसके दस लक्षण बताये गये हैं।

विज्ञान के अनुसार यदि पदार्थ को एक खास गति पर फेंका जाये तो वह प्रकाश बन जाता है। इसे अध्यात्म के क्षेत्र में भी अनुभव किया गया। प्रकाश की तरफ जाने या दिव्यता पाने की युक्ति जब ऋषियों ने खोजनी शुरू की तो जैसे-जैसे उनकी कल्पना में विस्तार होता गया, वैसे-वैसे ‘दिव्यता’ के प्रतिरूप देवताओं की संख्या में भी वृद्धि होने लगी। इसीलिए हमारे यहां तैंतीस करोड़ देवता हैं। इन्हीं देवताओं के गुणगान की विधि को भक्ति कहा गया। भक्ति का अर्थ है प्रशंसा करना, सेवा करना, बिना पुरस्कार की इच्छा के मगर जब पगार, पद या पुरस्कार पाने के लिए गुणगान किया जाये तो वह हुई राजनीति।

भक्ति का अर्थ है झुकने या अपने को झुकना सिखाने की कला, एवं विराट के सामने अपने तुच्छ होने की स्वीकृति। जैसे-जैसे यह स्वीकार भाव बढ़ता चला जाता है, आदमी का व्यक्तित्व तरल से तरलतम होता जाता है। भक्ति, पूजन, बन्दन और प्रार्थना से शरीर में धीरे-धीरे रासायनिक परिवर्तन अपने आप होने लगते हैं, ईर्ष्या, क्रोध, हिंसा, घृणा, क्रूरता जो विकास विरोधी भाव हैं, अपने आप भाप बन कर उड़ जाते हैं। हम हर काम सुरुचि के साथ करते हैं, ताकि हम सुसंस्कृत कहला सकें। इसीलिए भक्ति को भी सलीके साथ करने के लिए कालान्तर में नवधा भक्ति का विकास हुआ।

भक्ति एक कला है। चरण धोकर हम मूर्ति के साथ परिचय करते हैं। जल छिड़ककर हम अपने अहम् को विगलित करते हैं। चन्दन में सुगन्ध होती है। गन्ध पृथ्वी का तत्त्व है। अत: हम चन्दन लगाकर अपने पार्थिवता से ऊपर उठते हैं। पुष्प में रंग होते हैं। रंग सूर्य की देन है। सूर्य आत्मतत्त्व है। पुष्प अर्पित करके हम पार्थिव अस्तित्व से आत्मा के तल तक उठ आते हैं। गुरु या धूप जीवन-ऊर्जा के चुकने का संकेत करता है। हम अगरु देकर देवता या मूर्ति को अपने विसर्जित होने की सूचना देते हैं। आरती की ज्योति पर ध्यान एकाग्र करने से एकाग्रता बढ़ती है। घण्टी का स्वर आकाश तत्त्व है। शब्द आकाश का गुण है। इस तरह हम पंच महाभूतों में बने अपने शरीर का एक-एक तत्त्व विराट को समर्पित करते जाते हैं। दूसरे शब्दों में हम भावात्मक रूप में खण्ड से सम्पूर्ण की ओर चले जाते हैं।

घण्टी की ध्वनि ठीक वैसी होती है, जैसी कुंडलिनी जागने पर कानों में बजती हैं। घण्टी की ध्वनि सोयी कुंडलिनी में स्पन्दन पैदा करती है। इस तरह जो कुंडलिनी वर्षों हठयोग और प्राणायाम करके भी नहीं जागती वह भक्ति में सहज ही स्पंदित हो उठती है। इस ध्वनि के कारण प्राण वायु जो वैसे इडा या पिंगला नाड़ियों में से होकर बह रही होती है, शीघ्र ही सुषुम्ना में से होकर बहने लगती है। जो पूजा करने के अनुभव से गुजरे हैं, उन्हें सही पूजा हुई हो तो शान्ति का अनुभव होता है। उन्हें नहीं मालूम कि शान्ति का यह अनुभव आया कहां से? दरअसल यह प्राण वायु के सुषुम्ना में आ जाने के कारण होता है। जिन लोगों के प्राण जितनी देर या जितना अधिक सुषुम्ना में से होकर बहते हैं, वे उतने ही शान्त, धैर्यपूर्ण, दीर्घायु, स्वस्थ एवं आशावान होते हैं।

व्रत का कारण भी शरीर की मशीनी व्यवस्था से जुड़ा है। भोजन पचाने के लिए करोड़ों श्रमिकों की टोलियां चौबीसों घण्टे वर्षों से काम कर रही हैं। व्रत इन श्रमिकों को आराम देने के लिए है। व्रत इसलिए भी साधना से जोड़ दिया गया है, कि शरीर को संग्रह की बीमारी है। सब बिमारियां संगृहीत मांस और चर्बी की वजह से शुरू होती हैं। शरीर की इस पूंजीवादी मनोवृत्ति का पर्दाफाश करने के लिए व्रत का नियम बनाया गया है। जिस तरह पूंजीवादी कभी स्वच्छ मनोविचारों वाला नहीं हो सकता, उसी तरह चर्बी वाला शरीर भी दिव्य की ओर यात्रा में बाधक होता है, इसलिए व्रतों का विधान किया गया है। 

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