Types of Holi: रंगों का पर्व होली पूरे भारत में हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। भारत के हर क्षेत्र में होली के विविध रूप रंग, प्रथा, मेले आदि देखने को मिलते हैं। आइए लेख के माध्यम से इस पर्व पर विस्तार पूर्वक चर्चा करें।
फाल्गुन का मदमाता यौवन। वृक्षों पर नयी कोपलें। बागों में नयी बहार। जीवन में हर कहीं बसन्त की सुरभि।
मिट्टी में नयी सुगन्ध। इस मनभावने सलौने वातावरण में दुखी मन भी क्षण भर को अपना सब कुछ भूलकर विनोद करने को ललकने लगता है। पवन, धरती की नयी ओढ़नी को प्यार से सहलाने लगता है और युवामन होली के रंग में रंगकर मस्ती से नाच उठता है ‘आजु बिरज में होरी रे रसिया।
होली की मूल भावना सर्वत्र एक है
प्यार और मस्ती के रंग में रंगकर अपने सभी कष्ट व पारस्परिक वैमनस्य को भुला देना और धरती की नयी उमंगों के साथ अपनी उमंगों को जोड़कर सर्वत्र हर्सोल्लास बिखेर देना। इस मूल भावना को प्रकट करने के लिए अलग-अलग स्थानों पर उसे अलग-अलग रंग दे दिया जाता है। कहीं पर वह रंग, प्यार की ठिठोली के रूप में उभर कर सामने आता है, कहीं वह स्वर और ताल में बंधकर नृत्य करता है, कहीं गुलाल और
पिचकारियों से वातावरण को मदमस्त बनाता है और कहीं प्रेम के रिश्तों में बंधकर कोड़े और लाठियों से एक दूसरे पर प्यार भरे प्रहार भी करता है।
वृन्दावन की होली

होलिकोत्सव में कृष्ण की जन्मभूमि वृन्दावन का विशेष महत्त्व है। प्रेम और मस्ती में भी हमारे यहां
कृष्ण बेजोड़ रहे हैं। अतएव उनकी जन्मभूमि पर होली की विशेष महिमा भी सहज स्वाभाविक है।
स्थान-स्थान पर रासलीला का आयोजन होता है। बीच में राधा-कृष्ण, इधर-उधर गोपिकाएं और
कुछ ग्वाले भी। तरह-तरह के वाद्यवृन्द के साथ, मस्ती में होली गाई जाने लगती है – ‘होरी आई रे, होरी आई रे। ‘हर गली और मोहल्ले में बृजवासी झूम झूम कर मस्ती से गा उठते हैं – ‘अपने अपने भवन ते
निकसी। कोई संवरि, कोई गोरी रे रसिया।
आजु बिरज में होरी रे रसिया।
वृन्दावन में होलिकोत्सव बसन्त पंचमी से ही प्रारम्भ हो जाता है। ज्यों-ज्यों होली का दिन निकट आने लगता है, त्यों-त्यों गीतों की मस्ती बढ़ने लगती है और त्योहार आते-आते यह मस्ती भी अपनी ऊंचाईयों को छूने लग जाती है।
प्रह्लाद मेला

इस त्योहार पर विविधता भी कम नहीं। सरसता के साथ कहीं-कहीं रोमांचकता का पुट भी दिखता है। इसी रोमांचकता का प्रमाण है – प्रहलाद मेला। इसमें होलिका-दहन के दिन वृन्दावन के फालैन गांव में, जब 20-22 फुट के घेरे में होली अपनी पूरी क्षमता से दहकने लगती है तो प्रहलाद कुंड का पंढा केवल एक अंगोछा धारण करके नंगे शरीर उसमें प्रवेश करता है और कुछ ही देर में सकुशल लौट आता है। यह बड़ा
रोमांचकारी दृश्य होता है, जिसे देखने के लिए हर वर्ष हजारों की संख्या में लोग फालैन पहुंचते हैं। इस दृश्य द्वारा प्रहलाद की घटना को सजीव करने का प्रयत्न किया जाता है।
बरसाने की लट्ठमार होली

फाल्गुन शुक्ला नवमी को नन्दगांव के हुरिहार, बरसाने में आते हैं। बरसाने के लोग उनका बड़े प्रेम से स्वागत करते हैं। वे सब श्रीजी के मन्दिर में एकत्रित होते हैं। गीतों में एक दूसरे पर व्यंग्य करते हैं और अपनी-अपनी श्रेष्ठता को प्रमाणित करने की कोशिश करते हैं। राधा और कृष्ण के रूप-सौन्दर्य की चर्चा होती है।
नन्दगांव के हुरिहार जब राधा की ओर इंगित करके ‘दरसन दे निकसि अटा ते’ गाते हैं तो लगता है जैसे वे बरसाने की सभी महिलाओं को बाहर आकर होली खेलने के लिए आमंत्रण दे रहे हों। हासविलास और नृत्य-गायन के इस वातावरण में श्रीजी का सम्पूर्ण मन्दिर रंग-बिरंगी अबीर गुलाल से भर जाता है। सभी चेहरे गुलाल में ढक जाते हैं। इसके बाद नन्दगांव के हुरिहार गाते बजाते मन्दिर से उतर कर आगे बढ़ते हैं। इस समय उनके सिरों पर साफा या मोटा कपड़ा बंधा हुआ रहता है और हाथ में ढाल रहती है। ये जब ‘रंगीली गली’ नाम की एक संकरी गली में पहुंचते हैं तो वहां पर बरसाने की गोपियां हाथ में लाठियां लेकर उनका स्वागत करने के लिए तैयार रहती हैं। वे लाठियों से प्रहार करती हैं और हुरिहार ढालों से अपना बचाव करते हुए आगे बढ़ते हैं। सम्पूर्ण वातावरण ‘लाडली लाल की जय’ के घोष से गूंजता रहता है और बाजार में इधर-उधर खड़े हुए हजारों की संख्या में दर्शक इस दृश्य का रस लूटते हैं। स्त्री और पुरुषों की इस होली में कहीं भी कटुता या अभद्रता का आभास तक नहीं। सभी के चेहरों पर सर्वत्र बिखरने वाली मुस्कान और मधुरता ही रहती है। लगभग दो ढाई
घंटे तक यह लमार होली चलती है। इस बीच बरसाने की गोपिकाएं किसी न किसी हुरिहार को पकड़ लेती हैं और उससे ‘वृषभानु सरोवर’ का पूजन करवाती हैं। इसके साथ ही बरसाने की लमार होली समाप्त हो जाती है। अगले दिन बरसाने के हुरिहार इसी प्रकार नन्दगांव जाते हैं और वहां पर नन्दगांव की गोपिकाओं से ल_मार होली खेलते हैं। एकादशी को सम्पूर्ण नन्दगांव और बरसाने का वातावरण रंग और गुलाल से रंगरंगीला हो जाता है। फाल्गुन शुक्ला पूर्णिमा को होलिका-दहन के बाद अगले दिन सम्पूर्ण देश के समान राधा-कृष्ण
की इस भूमि पर भी होलिकोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।
राधारानी का मेला

मथुरा-वृन्दावन क्षेत्र में बसन्त-पंचमी को ही, होलिका-दहन के स्थान पर दांडा गाड़ दिया जाता है, जो होलिकोत्सव के प्रारम्भ होने का प्रतीक है। इसके बाद, फाल्गुन कृष्ण एकादशी को मथुरा के निकट मानसरोवर नामक स्थान पर राधारानी का मेला लगता है। इस मेले को होलिकोत्सव का औपचारिक उद्घाटन माना जा सकता है। इसके बाद यह उत्सव अपने पूरे उत्साह और गति से चलने लगता है। इसी श्रंृखला में लठमारहोली, फाल्गुन शुक्ला नवमी तथा दशमी को होती है, जो मुख्यत: तो नन्दगांव और बरसाने के लोगों की ही होली है,
मगर जिसे हर युवा-मन देखने के लिए लालायित रहता है। नन्दगांव, कृष्ण-भूमि है और बरसाना राधा की जन्मभूमि। इस लठमार होली में हमें उसी पारम्परिक प्रेम और मधुरता के दर्शन होते हैं, जो समधाने के सम्बन्धियों के बीच प्राय: देखने को मिलते हैं।
राजस्थान की लट्ठमार होली

बरसाने के अतिरिक्त, पूर्वी राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में भी लट्ठमार होली होती है। सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ महावीर जी में प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ला दूज को इस होली का आयोजन होता है। मन्दिर के विशाल प्रांगण में पानी के बड़े-बड़े बर्तन भर दिये जाते हैं। उनमें अलग-अलग रंग घोल दिये जाते हैं। उसके बाद प्रांगण में खिलाड़ियों की टीम के समान पुरुष और महिलाएं अपनी-अपनी टोली बनाकर खड़े हो जाते हैं। बीच में कुछ बुजुर्ग इस उद्देश्य से खड़े हो जाते हैं कि होली के नियम भंग न हों, किसी प्रकार की अशिष्टता न हो और किसी व्यक्ति पर आवश्यकता से अधिक मार न पड़े।
महिलाओं के मुंह पर घूंघट होता है और हाथ में लम्बी-लम्बी लकड़ियां। पुरुषों के हाथों में डोलची और बाल्टियां होती हैं। होली शुरू होने पर पुरुष अपनी बाल्टियों और डोलचियों में रंग भरकर महिलाओं पर डालते हैं और महिलाएं उससे बचने की कोशिश करते हुए उन्हें अपनी लाठियों का शिकार बनाती हैं।
थोड़ा प्रयत्न करने पर कुछ पुरुष इन लाठियों से बच निकलते हैं। यदि किसी को लाठी लग जाती है तो सम्पूर्ण प्रांगण अट्टहास से गूंज उठता है। लगभग दो घंटे तक यह होली चलती है। चारों ओर दर्शकों की बड़ी भीड़ दृश्य का आनन्द लेती रहती है और प्रांगण विभिन्न लोकगीतों से गूंजता रहता है।
दाऊ जी के मन्दिर में हुरंगा
चैत्र कृष्ण द्वितीया को दाऊ जी के मन्दिर में विशाल हुरंगा होता है। मन्दिर के विस्तृत प्रांगण में एक ओर महिलाएं होती हैं और दूसरी ओर पुरुष। स्त्रियां कपड़े का कोड़ा बनाकर और उसे रंग में भिगोकर पुरुषों के मारती हैं। पुरुष उन पर रंग और अबीर फेंकते हैं। चारों ओर का वातावरण बड़ा रंगीला और रसीला हो जाता है। रंगबिरंगी गुलाल को कपड़ों में भरकर, गोपियों की तरह घुमाकर दूर-दूर तक फेंका जाता है। पुरुषों के
हाथों में होली का झंड़ा होता है। स्त्रियां उसे लूटने का प्रयत्न करती हैं और उसे लूटने के साथ ही हुरंगा समाप्त हो जाता है। इस बीच मस्ती भरे गीत, रंगीली होली को संगीत भी प्रदान करते रहते हैं।
सोटेमार होली
लट्ठमार की तरह ही मगर उससे कुछ कम, सोटेमार होली है, जो राजस्थान में लगभग सर्वत्र खेली जाती है। यह होली अक्सर देवर-भाभी या साली-बहनोई के बीच होती है। महिलाएं मोटे वस्त्रों को बट देकर रस्सी की तरह तैयार कर लेती हैं और उससे पुरुषों पर प्रहार करती हैं। पुरुष, महिलाओं पर रंग और अबीर डालते हैं। दोनों ही एक दूसरे के प्रहार से बचने की कोशिश करते हैं और प्रहार की पकड़ में आजाने पर दर्शक-परिजनों में
अट्टहास गूंज उठता है। विन्ध्याचल के भीलों में होली के पहले पड़ने वाले रविवार को ‘भगोरिया का मेला’ आयोजित होता है, जिसमें नृत्य और गायन के विशेष कार्यक्रम होते हैं। इस मेले में यदि कोई युवक किसी युवती के मुंह पर गुलाल लगा देता है और उसके बदले में युवती उसे पान खिला देती है तो उसका अर्थ यह समझा जाता है कि उन्होंने एक दूसरे को स्वीकार कर लिया है। कुमाऊ में भी रंग, गुलाल और अबीर के अतिरिक्त संगीत को विशेष प्रधानता दी जाती है। शिवरात्रि से ही वहां पर प्रत्येक गली मोहल्ले में संगीत का कार्यक्रम शुरू
हो जाता है। एकादशी को, होलिका-दहन के स्थान पर एक वृक्ष की बहुत बड़ी शाखा को गाड़ा जाता है और उसके पास ही अग्नि की स्थापना की जाती है, जो होली तक जलती रहती है। एकादशी से इस स्थान पर ही गायन और वादन का कार्यक्रम निरन्तर चलता रहता है। युवतियां ‘धोस्यला’ नाम का लोकनृत्य करती हैं। मालवा की होली रोमांचक और आश्चर्यजनक है। वहां पर होलिका दहन के बाद लोग, उसके जलते हुए अंगारों
को एक दूसरे पर फेंकते हैं। उनका विचार है कि इस प्रकार होलिका नाम की राक्षसी का अन्त हो जाता है।
