त्राटक के भेद

त्राटक को तीन भागों में बांटा गया है।

1. समीपस्थ त्राटक

ब्रह्म मुहूर्त में नित्य कर्म से निवृत्त होकर सुखासन में बैठ जाएं और अपने सामने दो फुट की दूरी पर एक मोती, गोल पत्थर, शिवलिंग, पुष्प अथवा कोई भी इसी तरह की वस्तु रख कर उस पर उपलक निगाहें जमायें। जब आंखों से आंसू आने लगे तो कुछ देर आंखों को झपकायें। ठंडा पानी या गुलाबजल आंखों में डाल लें। दो मिनट बाद पुन: अभ्यास आरंभ करें। यह क्रिया 4-5 मिनट तक करें। प्रतिदिन अभ्यास बढ़ाते चलें जाएं। जब वस्तु पर दृष्टिï स्थिर होने लगे तो समझें की सफलता निकट है।

2. दूरस्थ त्राटक

समीपस्थ त्राटक का अभ्यास होने पर ही दूरस्थ त्राटक का अभ्यास करना चाहिए। पौ फटने के वक्त किसी मन्दिर के गुंबद पर निगाहें जमाएं। किसी पेड़ की ऊंची डाल पर निगाहें जमाएं। उड़ते पक्षी की चोंच पर निगाहें जमाने का अभ्यास करें। जब ये अभ्यास पूरे हो जाएं तो रात के वक्त किसी भी तारे को अपलक देखें। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाते जाएं। जब कई घंटे के अभ्यास में पारंगत हो जाएं तो सफलता समझिए। इस अभ्यास की सिद्धि पर आप सैकड़ों मील दूर बैठे किसी व्यक्ति के बारे में जान सकते हैं कि इस वक्त वह क्या कर रहा है।

3. अन्तर्भूत त्राटक

अन्तर्भूत त्राटक मानसिक शक्ति से किया जाता है। माथे पर एक बिन्दी लगा लें और आंखें बन्द करके सुखासन में बैठ जाएं। फिर, बिन्दी पर ध्यान केंन्द्रित करने की चेष्टïा करें। शुरू-शुरू में कठिनाई हो सकती है, लेकिन इससे विचलित होने की आवश्यकता नहीं है।

आपकी आंखों के आगे अंधेरा छा जाएगा। अंधेरे में कोई बिन्दु अथवा माथे पर लगी बिन्दी पर निगाह जमाने की कोशिश करें। शुरू-शुरू में अनेक बिन्दु दिखाई देंगे जो बुलबुलों की तरह यहां-वहां भागते प्रतीत होंगे। इनमें से एक बिन्दु चुनिए और उसपर ध्यान केंन्द्रित कीजिए। लगातार अभ्यास करने से आपकी निगाहें इस एक बिन्दु पर केंन्द्रित होने लगेंगी। यह बिन्दु नित्य अभ्यास से चमकीला और बड़ा होता चला जाएगा। जिस दिन यह बिन्दु सूर्य की तरह चमकने लगे, समझिए आपकी साधना सफल हो गई। इससे आपके नेत्रों में चुंबकीय शक्ति उत्पन्न हो जाएगी। आप किसी की ओर देखते ही उसे अपने सम्मोहन में जकड़ने के योग्य हो जाएंगे।

त्राटक को अनेक विधियों द्वारा तथा पद्मासन, सिद्धासन या वज्रासन में बैठ कर किया जाता है। योगशास्त्र में त्राटक के बारे में कहा गया है कि ‘एकाग्र होकर पलकों को बिना झपकाए किसी सूक्ष्म वस्तु (छोटे वस्तु या बिन्दू) पर आंसू आने तक ध्यान केन्द्रित करना और आंसू आने पर आंखों को बंद कर लेना त्राटक कहलाता है।Ó

इस क्रिया की विधि-त्राटक को अनेक प्रकार से किया जाता है। त्राटक के लिए एक बंद कमरे में पद्मासन या वज्रासन में बैठ कर स्वयं से साढ़े चार हाथ की दूरी पर, सफेद कागज पर, ध्यान केन्द्रित करने के लिए एक रुपये के बराबर गोल निशान बना लें। निशान का रंग काला या हरा होना चाहिए या कमरे में कोई दीपक या मोमबत्ती जलाकर अपने आंखों की बराबर ऊंचाई पर रखें। दीपक के लिए देसी घी का प्रयोग करें।

अपने मन को एकाग्र करें और शरीर को स्थिर रखते हुए अपनी दृष्टिï को कागज पर बनाए गए निशान पर केन्द्रित करें या मोमबत्ती से निकलने वाली लौ (ज्योति) पर केन्द्रित करें। इस क्रिया में बिना पलक झपकाए तब तक उस पर दृष्टि रखे, जब तक आंखों में आंसू आने की स्थिति न बन जाए। अंाखों में आंसू आने से पहले ही आंखों को बंद कर लें और अपनी दोनों हथेलियों को आपस में रगड़कर आंखों के पलकों को सहलाएं। इस तरह इस क्रिया को 15 मिनट तक करें।

1. पिन की नोक पर अभ्यास-सुई अथवा पिन को धगे से बांधकर खूंटी से लटका दें और 2 फीट दूरी पर आसन लगाकर बैठ जाएं। ध्यान रखें कि सुई अथवा पिन बिलकुल हिलने न पाए। अब धीरे-धीरे अपना सारा ध्यान पिन की नोक पर एकत्रित करें। अपलक नेत्रों से तब तक देखते रहें, जब तक कि नेत्रों से पानी (आंसू) न निकलने लगे। ऐसी स्थिति में कुछ देर आराम करें। आंखों में ठंडे पानी के छींटे मारें, तदुपरान्त पुन: अभ्यास करें। 8-10 मिनट प्रतिदिन अभ्यास करें। अब आंखों को धीरे-धीरे चारों ओर धुमाएं। आप पाएंगे कि सुई अथवा पिन भी आपकी आंखों के साथ ही चारों ओर घूमने लगी है। जिस दिन यह क्रिया सहजता से ध्यान केंन्द्रित करते ही होनी आरम्भ हो जाए तो अभ्यास सफल मानना चाहिए।

2. दर्पण द्वारा अभ्यास-एक अच्छा, स्वच्छ दर्पण सामने टांग दें और उससे तीन फीट की दूरी पर बैठकर अभ्यास करें। दर्पण इतना बड़ा हो कि उसमें आपका पूरा चेहरा नजर आए। आप अपनी आंखों को भौंहों के बीच केंन्द्रित कर लें। निरंतर अभ्यास के पश्चात्ï कई बार आप विलुप्त हो जाएंगे। यह अभ्यास आधे घंटे करें। इस  प्रकार अभ्यास के दौरान आपको आस-पास का वातावरण दर्पण में नजर आयेगा। कई बार कुछ पुरानी घटनाएं साकार हो उठेंगी और आप रोमांच से भर उठेंगे। कुछ नवीन दृश्य भी नजर आयेंगे। हो सकता है वे दृश्य भविष्य में साकार हो उठें।

3. चन्द्रमा पर अभ्यास-चन्द्रोदय के प्रथम दिन (शुक्ल पक्ष) से ही नित्य 10 मिनट के अभ्यास से चन्द्र त्राटक आरम्भ करके प्रतिदिन 5-5 मिनट पढ़ाते चले जाएं। चन्द्रमा रोज दिशा बदलता है, अत: सुविधानुसार अनुकूल आसन लगाकर चन्द्रमा पर अभ्यास करें।

अभ्यास के दौरान चन्द्रमा को भेदने की कोशिश करें। इससे आपको उसमें कुछ दृश्य दिखनेे लगेंगे। आपकी कल्पनाएं वहां साकार दिखाई देने लगेंगी। फिर दृश्य और चन्द्रमा के स्थान पर आपको चारों ओर तीव्र प्रकाश दिखने लगेगा। ऐसा होने पर अपने अभ्यास को सफलता की ओर बढ़ता समझना चाहिए।  फिर, कृष्ण पक्ष में जब चन्द्रमा आकाश में न हो तो आपको यह कल्पना करनी चाहिए। कि चन्द्रमा चमक रहा है। नेत्र बन्द करके दृढ़तापूर्वक यह बात दोहरानी चाहिए। जब कृष्ण पक्ष में भी बंद आंखों से आपको चन्द्रमा नजर आने लगे तो अपना अभ्यास पूर्ण समझना चाहिए। 

सावधानी-त्राटक का अभ्यास हमेशा ब्रह्ममुहूर्त या मध्यरात्रि के समय करें। त्राटक क्रिया तब तक करें जब तक आंखों में जलन न होने लगे। इस क्रिया को शुरू-शुरू में एक बार ही करें। त्राटक के लिए कभी भी कैरोसिन तेल का प्रयोग न करें तथा बल्ब पर भी कभी त्राटक क्रिया को न करें।

विशेष-हठयोग के षट्ïकर्म से कुण्डलिनी जागरण में भी सहायता मिलती है। इस क्रिया को शांत स्थान पर करें और मन को एकाग्र करें। इसमें दीपक के लौ के अलावा किसी दूसरी वस्तु पर भी कर सकते हैं। जैसे-आप अपने मन के अनुसार किसी बगीचे में शांत स्थान पर बैठकर फूल पर दृष्टिï एकाग्र कर सकते हैं। इसमें सफलता मिलने के बाद चांदनी रात में चन्द्रमा पर अपनी दृष्टि केन्द्रित कर सकते हैं।

त्राटक के लाभ-त्राटक से शांभवी मुद्रा सिद्ध होती है। इससे आंखों के विकार दूर होते हैं तथा आंखों की रोशनी बढ़ती है। इस क्रिया से आंखों में इतनी शक्ति आ जाती है कि दिन में भी तारे दिखाई पड़ने लगते हैं। इससे धारणा में लाभ मिलता है और मन स्थिर रहता है। इससे इच्छाशक्ति बढ़ती है और प्राणवायु स्थिर रहती है। इस की पूर्ण सिद्धि होने के बाद यदि वह व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति को बढ़ाकर किसी व्यक्ति की आंखों से आंखों को मिलाकर देखें तो सामने वाला व्यक्ति सम्मोहित या हिप्नोटाइज्ड हो जाता है और उसे जो भी कहा जाता है, वह करने को तैयार हो जाता है। 

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