योग यानी चित्त की वृत्तियों का निरोध अर्थात् निग्रह का नाम योग है। योग वह है जिससे साधक के लोक परलोक दोनों सुधर जाएं एवं उसे परब्रह्मï की प्राप्ति हो जाए। आज संसारी जीव योग्य गुरु के न मिलने के कारण कहते हैं कि परब्रह्मï के चेतन दिव्य अविनाशी स्वरूप में मन की एकाग्रता हो ही नहीं सकती। जो लोग योग को अच्छा समझते भी हैं वे नाक बंद कर श्वास ऊपर चढ़ा देने की क्रिया को ही योग मान बैठे हैं। योग की उच्चतम सीमा को वे नहीं जान पाते। इसी भूल के कारण आज उन्हें सच्चे सुख तथा आत्मज्ञान की प्राप्ति नहंीं होती। योग से आत्मज्ञान के साथ-साथ आरोग्यता की भी प्राप्ति होती है।

ऋषि चरक स्वस्थ व्यक्ति के लक्षण लिखते हुए बताते हैं  कि ‘वही मनुष्य स्वस्थ है जिसके वात, पित्त, कफ आदि दोष समान रूप से ठीक कार्य कर रहें हों। जठराग्नि भी ठीक कार्य करे रस, रक्त, मांस आदि धातु भी समान हों मलमूत्र आदि क्रियाएं ठीक हों तथा जिसकी आत्मा मन और इन्द्रियां भी प्रसन्न हों।’

सर्वरोगों का कारण मल आदि का साफ न होना है। परन्तु मल किस प्रकार साफ हो यह जानना आवश्यक है। जितने भी उपचार के तरीके हैं उन सबसे स्नायु शुद्धि तो हो ही नहीं सकती। यही कारण है कि इतने डॉक्टर, वैद्य और हकीम होने पर भी रोगी और रोग बढ़ते ही जा रहे हैं। एलोपैथी के इलाज में विशेषयता इंजेक्शन आदि लगाकर व्यक्ति का रोग दूर करने का प्रयत्न किया जाता है, परन्तु इससे वह रोग थोड़े समय के लिए दबकर और अनेक प्रकार के दूसरे रोग उत्पन्न कर लेता है।

योग की प्रत्येक क्रिया सुगमता से मल को बाहर निकाल देती है और रोगी को निसंदेह पूर्ण रूप से आराम आ जाता है। मल सात प्रकार के हैं। मल व मूत्र के अतिरिक्त आंख, नाक, कान, गला और शरीर का मल इन को शुद्ध करने के लिए योग के ग्रन्थों में छह क्रियाओं का वर्णन है जो षट्कर्म के नाम से प्रसिद्ध है।

धौति, बस्ति, नेति, न्यौलि, त्राटक एवं कपालभाति। इनसे शरीर की मलशुद्धि हो जाती है तथा देह निरोग होकर पुष्ट एवं तेजस्वी बन जाता है। 

प्राणायाम

प्राणायाम मन की एकाग्रता व शान्ति का एकमात्र साधन माना गया है।

बहुधाश्वास के भरने, रोकने व निकालने को ही प्राणायाम समझा जाता है। प्राणायाम का अर्थ है प्राणों अर्थात् श्वासों को प्रणव मन्त्र के साथ दीर्घ गति से भरना, रोकना व निकालना। इससे जीवनरूपी वृक्ष आयु भर स्थिर रहता है। इसके साथ-साथ साधक अपने चरम ध्येय आत्मस्वरूप को भी प्राप्त कर सकता है।

जैसे योग्य पदार्थ को पात्र में डालने से पूर्व पात्र शुद्ध कर लेना आवश्यक होता है वैसे ही प्राणायाम का अभ्यास प्रारम्भ करने से पूर्व नासिका रन्ध्र को मलरहित रहना आवश्यक है। यदि नासिका की सफाई किए बिना ही प्राणायाम प्रारम्भ कर दिया गया तो मल कुपित हो जाएगा और मल के परमाणु रक्त में मिलकर शरीर में नाना प्रकार की व्याधियां उत्पन्न कर देंगे। अतएव साधक को नेति आदि योग क्रियाओं का अभ्यास प्राणायाम करने से पूर्व अवश्य कर लेना चाहिये। 

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