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Tarun Sagar : जीवन को सहजता से जिओ। सुख-दुख जो भी मिले उसे स्वीकार करते चलो। क्या पता दुख ही वह द्वार हो, सुख जिसके पार हो। किसी दूसरे के सिर ठीकरा मत फोड़ो। वह तो निमित्त मात्र है, उपादान तो तुम्हारा अपना है सोचो ऐसा होना था, सो हो गया।

हम श्रेष्ठï हैं क्योंकि हमारी संस्कृति श्रेष्ठï है। संस्कृति व्यक्ति को सुसंस्कृत करती है। जैन संस्कृति श्रम की संस्कृति है। जो भी मिलेगा वह श्रम और परिश्रम से मिलेगा। स्वर्ग हो या मोक्ष सब अपने पुरुषार्थ से मिलता है। मोक्ष किसी को गिफ्ट में नहीं मिलता और न ही लिफ्ट से मिलता है बल्कि जो अपने में शिफ्ट होता है, उसे मिलता है।

एक व्यक्ति का मुझे परिचय कराया जा रहा था। परिचय कराने वाले सज्जन ने कहा: मुनिश्री ये इस नगर के बहुत बड़े आदमी हैं। मैंने उन्हें गौर से देखा। ऊपर से नीचे की तरफ, नीचे से ऊपर की तरफ, आगे से पीछे की तरफ, पीछे से आगे की तरफ, सब एंगल से देखा लेकिन मुझे वह साढ़े पांच फुट के ही नजर आ रहे थे। फिर बड़े कैसे हुए? मैंने उन सज्जन से पूछा भाई ये बड़े कैसे हैं? मुझे तो आम आदमी के बराबर ही दिख रहे हैं। सज्जन बोले: ये ऐसे बड़े नहीं हैं वैसे बड़े हैं। मैंने पूछा: ये वैसे बड़े क्या होते हैं? वे बोले: ये पैसे से बड़े हैं। इनके घर चार-चार नौकर काम करते हंै। कभी अपने हाथ से पानी का गिलास भी नहीं पकड़ते।

अच्छा…। अब समझे। मैंने कहा: तब तो ये बड़ा निकम्मा आदमी है। वे बोले: आप क्या बोलते हैं? मैंने कहा: ठीक बोलता हूं। बड़ा आदमी वह नहीं जिसके घर चार-चार नौकर काम करते हैं। बल्कि बड़ा आदमी वह है जो चार-चार नौकर का काम खुद अकेला कर लेता है। वह बड़ा आदमी है क्योंकि उसने श्रम को महत्त्व दिया है, परिश्रम को पूजा है। मेरा मानना है कि श्रम करने से जो स्वेद (पसीना) निकलता है वह किसी गंधोदक, गंगोदक से कम नहीं है। अपने हाथ-पैर को, अंगों को हिलाते रहिए। अगर अंग से काम लेना बंद कर दिया तो फिर अंग में जंग का लगना निश्चित है।

कभी-कभी मुझे लगता है कि संपन्न घरों में लंगड़े-लूले हो गये। सब नौकरों के पराधीन हो गये। पानी पिलाने के लिए नौकर, खाना बनाने के लिए नौकर, झाडू-पोंछा लगाने के लिए नौकर, मां-बाप बूढ़े हो गये तो उनकी सेवा के लिए नौकर, बच्चों को मां-बाप का प्यार कहां मिलता है? उनको पालने के लिए नौकर। आदमी इतना व्यस्त हो गया कि उसे अपने लिए टाइम नहीं है। मुझे तो डर लगता है कि कहीं कल ऐसा न हो कि पत्नी से प्यार करने के लिए नौकर रखना पड़े। ध्यान रखो प्रेम और प्रार्थना में नौकर नहीं चलते। कुछ काम ऐसे होते हैं जो खुद ही करने पड़ते हैं। मां-बाप की सेवा, गुरु की सेवा, धर्मध्यान और ईश्वर भक्ति खुद ही करनी पड़ती है।

आदमी इतना बेईमान है कि सोचता है, मैं सुखी हूं, मेरी बीवी-बच्चे सुखी रहें बाकी दुनिया जाए। ये दुनिया भाड़ में जायेगी या नहीं जायेगी मुझे नहीं पता लेकिन ऐसा सोचने वाला भाड़ में जरूर जाएगा। वो भाड़ में जाता है, नहीं जाता है ये उसका नसीब है लेकिन बोलने वाला भाड़ में जरूर जाएगा, जो भावों से गिर गया उसका भव जरूर बिगड़ता है, ये महावीर की वाणी है।

अपने भावों को शुद्ध रखो। विचारों को शुद्ध बनाओ। मन का प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण से भी ज्यादा खतरनाक है। किसी से ईर्ष्या मत करो। तुम्हें जो मिला है, तुम्हारे भाग्य का मिला है। दूसरे को जो मिला है, उसके भाग्य का मिला है। सबको अपने-अपने भाग्य का मिलता है। जीवन को सहजता से जिओ। सुख-दुख जो भी मिले उसे स्वीकार करते चलो। क्या पता दुख ही वह द्वार हो, सुख जिसके पार हो। जो हो जाए वह ठीक है। किसी दूसरे के सिर ठीकरा मत फोड़ो। वह तो निमित्त मात्र है, उपादान तो तुम्हारा अपना है सोचो ऐसा होना था, सो हो गया।

अपने चिंतन को, अपनी सोच को बदल लो सब कुछ बदल जाएगा और हां इस दुनिया में, घर परिवार में रहते हुए यह मत भूलो कि एक दिन सब कुछ छोड़कर चले जाना है लेकिन आदमी की वासना दुष्पूर है। एक के बाद एक वासना जाग्रत होती चली जाती है और आदमी संसार के दलदल से कभी मुक्त नहीं हो पाता।

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