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religions - धार्मिक व्यवस्था की रीढ़ है चार आश्रम

Religion: यह बड़ी महत्त्वपूर्ण बात है कि वैचारिक विकास के क्रम में भारतीय मनीषा ने बहुत जल्दी ही अपना लक्ष्य निश्चित कर लिया था। यदि हम वैदिक कालीन धार्मिक व्यवस्था का विश्लेषण करें तो बड़ी आसानी से हम इस निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे कि हमारी संपूर्ण धार्मिक व्यवस्था जिसकी रीढ़ आश्रम व्यवस्था थी और जिसका अंङ्क्षतम लक्ष्य मोक्ष था, वस्तुत: मानव मात्र के शारीरिक और उससे भी अधिक मानसिक स्वास्थ्य के प्रति चैतन्यता को समर्पित थी। भारतीय वैदिक ऋषियों ने हर संभव प्रयत्न लोकहित और लोक मानस की सशक्तता के प्रति प्रतिबद्ध होकर किया।

आइये, अब इस बिन्दु पर जरा विस्तार से चर्चा करें। मानव और मानव ही क्या प्रत्येक चैतन्य प्राणी के सम्मुख जो सबसे विकराल भय सर्वप्रथम सामने आकर खड़ा हुआ वह मृत्यु थी और यह भय संभवत: चेतना की पहली सीढ़ी पर ही प्राणी मात्र के लिए चुनौती के रूप में सामने आ गया था। जब और जितने भी समय पूर्व पहली बार जिस किसी ने भी सर्वप्रथम अपने सामने अपने जैसे या अपने से भिन्न प्राणी का जीवन समाप्त होते देखा होगा उसी समय अथवा उसके कुछ ही समय बाद जब ऐसी दूसरी या तीसरी घटना हुई होगी तभी उसे अनुभव हुआ होगा कि मृत्यु एक अनिवार्य सत्य है और तभी मृत्यु, भय के सबसे बड़े प्रतीक रूप में उसके सामने आई होगी और तभी से प्राणी ने इस भय का सामना करने के लिए अपनी तत्कालीन बौद्धिक क्षमतानुसार प्रयत्न करने प्रारंभ कर दिए होंगे।

वे सारे कारक जो मृत्यु को समीप ला सकते थे या जो मृत्यु के कारण बन सकते थे, जैसे-जैसे मनुष्य के संज्ञान में आते गए मनुष्य प्रार्थना-आराधना (चाहे वह किसी भी रूप में हो) द्वारा या तो उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश में लगा रहा या भिन्न-भिन्न उपायों से (जिन्हें हमने बाद में विज्ञान की संज्ञा दी) उन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करता रहा। जल, विद्युत, अग्नि, पृथ्वी, वायु एवं आकाश वे विशाल एवं विराट कारक थे जिनकी मृत्यु कारकों के रूप में मानव ने बहुत जल्दी पहचान कर ली।

बाढ़, आग, भूकंप, तूफान और आकाशीय बिजली, उल्कापात आदि के स्रोत यही पांच तत्त्व थे और इन सारी व्याधियों से बड़ी संख्या में प्राणी मृत्यु का ग्रास बन जाता है यह मानव ने सबसे पहले अनुभव किया। यूं वन पशु, विषैले वृक्ष भी उसे मृत्यु कारक नजर आ चुके थे लेकिन उन पर काबू पाना भी वह बहुत जल्दी सीख चुका था, लेकिन जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु और आकाश पर नियंत्रण कर पाना उसे आसान नहीं लगा।

फलस्वरूप इन्हें महान मान कर इनके पूजन की परंपरा प्रारंभ हुई। इन विनाशक कारकों से ही जीवन भी मिलता है यह भी मानव को बहुत जल्दी ही समझा में आ गया। इन सबको नियंत्रण करने वाली भी कोई शक्ति होनी चाहिए। इसी विचार ने ईश्वरीय सत्ता की परिकल्पना को जन्म दिया।

मानव जीवन में आनन्द तो है किंतु कठिनाइयां भी कम नहीं यदि अनुकूल परिस्थितियां मिलती जाएं तब तो ठीक है किंतु यदि प्रतिकूल परिस्थितियां मिलें तो क्षमता, धैर्य, मानसिक संकल्प शक्ति और ऊर्जा के चुकने में देर नहीं लगती। अधिक विपरीत परिस्थतियां एवं अवरोध मानसिक सन्तुलन तक नष्टï कर देते हैं। इस आनंद और दुख का कारण यह मानव शरीर और जन्म-मृत्यु बंधन ही तो है, यदि यह जन्म-मृत्यु का बंधन ही समाप्त हो जाए तो निश्चित शान्ति मिल सकती है, इसी विचार ने मोक्ष, निर्वाण जैसी परिकल्पना को जन्म दिया। मोक्ष आथवा निर्वाण ही ज्ञानी जनों को अपने चिन्तन का अन्तिम लक्ष्य नजर आने लगा और लगभग प्रत्येक विचारक ऋषि ने निर्वाण कैसे प्राप्त हो इसके उपायों को जानने का हर संभव प्रयत्न किया। इसी एक विचार ने आस्थाओं के भिन्न-भिन्न स्वरूपों को, जिसे हम धर्म भी कह सकते हैं, को जन्म दिया। ईश्वर, परमसत्ता, परमात्मा, खुदा या ईशू या वाहेगुरु ही हमें मोक्ष या निर्वाण की स्थिति तक पहुंचा सकता है। इस धारणा का संसार के लगभग प्रत्येक धर्म ने समर्थन किया।

भारतीय वैदिक कालीन ऋषियों ने भी यद्यपि इसी आधार भूमि पर वैचारिक उत्स प्रस्तुत किए किंतु इससे इतर उन्होंने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की परिकल्पना दी जिसे यदि मूल रूप में लागू किया जाता तो एक आदर्श समाज ही विकसित नहीं होता वरन्ï विकासोन्मुख नागरिक भी तैयार होता और ऐसा हुआ भी। इतिहास गवाह है कि वैदिक काल में भारतीय जन मानस की चैतन्यता ही उर्ध्वगामी नहीं थी, श्रेष्ठï जीवन शैली एवं ज्ञान-विज्ञान का स्वर्णकाल भी इसी युग में भारतवर्ष का हिस्सा बना।
इसी बिन्दु पर भारतीय मनीषा की वैचारिक समृद्धता इसे न केवल विश्व के अन्य विचारकों से अलग स्तर पर खड़ा करती है वरन्ï इसे अकल्पनीय ठोस स्वरूप भी प्रदान करती है। एक ऐसा ठोस स्वरूप जिसकी आधारशिला मनोविज्ञान के वे सिद्धान्त अथवा सत्य है जिन पर आज भी विश्व चिन्तनरत है।

एक उदाहरण हम आश्रम व्यवस्था का ही लेते हैं। ब्रह्मïचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास इन चार आश्रमों की व्यवस्था का ही अगर हम विश्लेषण करें तो लगता है कि यह व्यवस्था औसत मानव की शारीरिक एवं मानसिक अवस्था के सर्वथा अनुकूल तो है ही साथ ही यदि इसका उचित रूप से पालन किया जाए तो यह मोह को क्रमिक गति देती हुई अंत में उसके नष्टï करने के बिन्दु तक ले जाती है।

पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मïचर्य का पालन, जिस में पूर्ण ध्यान अध्ययन, पर वह भी घर से दूर, गुरु आश्रम में जहां राजा, रंक सभी समान, साथ ही निकृष्टïतम कार्य भिक्षा मांगने से लेकर साहसिकतम कार्य आश्रम की रक्षा हेतु वन्य प्राणियों अथवा आतंकियों से युद्ध। इस आश्रम का पूरा आग्रह सर्वगुण युक्त मानव के निर्माण के प्रति ही तो था, फिर अगले पच्चीस वर्ष तक ग्रहस्थ आश्रम में विवाह, आजीविका, सन्तानोत्पत्ति उनका पालन-पोषण अन्य सामाजिक जिम्मेदारियों का पालन अर्थात्ï इस आश्रम का पूर्ण आग्रह इस हेतु था कि सर्वगुण सम्पन्न मानव जिसका निर्माण ब्रह्मïचर्य आश्रम के माध्यम से किया गया था वह समाज और देश की प्रगति में सहायक बने किन्तु इस आश्रम का जो अनिवार्य परिणाम होना था वह था व्यक्ति के अन्दर मोह की उत्पत्ति। पत्नी, परिवार, समाज, अर्जित सम्पत्ति, मान-यश आदि से मोह। इस मोह से मानव को कैसे धीरे-धीरे दूर किया जाए इसी समस्या ने वानप्रस्थ आश्रम की व्यवस्था को जन्म दिया।

वानप्रस्थ आश्रम अर्थात्ï ग्राम-नगर से दूर (अधिक दूर भी नहीं) वनों में प्रकृति के सान्निध्य में पच्चीस वर्षों का वास। वानप्रस्थ में पत्नी को साथ रखने का प्रावधान था, क्योंकि भारतीय विचारक ने यह अनुभव कर लिया था कि नारी शक्ति के बिना नर अधूरा है। दोनों में जो मानसिक सामंजस्य हो गया है उसके कारण दोनों का अधिकतम समय तक साथ रहना अनिवार्य एवं न्याय संगत है।

वानप्रस्थ आश्रम में व्यक्ति के वन में रहने पर तो जोर दिया गया किंतु पुन: परिवार में जाने का विरोध तो नहीं था। समारोह- पारिवारिक उत्सवों के अवसर पर वानप्रस्थी परिवारों में आते-जाते थे। गृहस्थ जीवन में प्रकृति से दूरी और घर, परिवार, समृद्धि से मोह, इन दोनों ही स्थितियों से वानप्रस्थ आश्रम में छुटकारा होना संभव था। पुन: प्रकृति से निकटता, सार्वभौमिक सत्यों का साक्षात्कार, व्यक्तिगत मोह से मुक्ति दिलाने की दिशा में ठोस कदम था।

पच्चीस वर्षों में एक ओर व्यक्ति का मोह परिवार से टूटता दूसरी ओर उसे चिन्तन-मनन का अवसर भी मिलता और संसार की नि:सारिता का उसे भान भी होता, क्योंकि आयु बढ़ने के साथ-साथ उसकी क्षमताएं एवं आवश्यकताएं भी सीमित होती चली जातीं। अत: उसका अपने परिवार में आवागमन भी धीरे-धीरे कम होता जाता और दूसरी ओर अगली पीढ़ी भी उनका आश्रम छोड़ स्वयं के कदमों पर खड़ी होती।

अंतिम पच्चीस वर्ष संन्यास आश्रम के नाम थे और इसमें तीर्थ स्थलों पर जाकर आध्यात्मिक चिन्तन एवं देव दर्शन में मन लगाने की व्यवस्था थी। अर्थात्ï वानप्रस्थ आश्रम में जो कुछ थोड़ा-बहुत मोह बचा था उससे भी नि:सतरण। भारतीय मनीषियों का संपूर्ण ध्यान इस चिन्ता पर केन्द्रित था कि किस प्रकार मानव को स्वाभाविक रूप से सुख, आशा, आत्मविश्वास, ऊर्जा, कल्पनाशीलता, संकल्पशक्ति, विपरीत परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति से युक्त रखा जाए और इस क्रम का प्रारंभ उन्होंने धर्म स्थलों को (मन्दिर मठ आदि) गांव-कस्बों से कुछ दूर स्थापित कर किया।

आमतौर पर मंदिर सुरम्य प्राकृतिक स्थलों पर, चाहे वह पहाड़ हो, नदी हो अथवा फल-फूल वाला उद्यान हो, ही बनाने की परम्परा विकसित की। क्योंकि हरीतिमा, नदी की कल-कल बहती जलधारा, ताजा खिले पुष्प एवं एकान्त पर्वत स्वत: ही मन को प्रफुल्लित रखने की क्षमता रखते हैं अत: इन स्थलों का उपयोग मंदिर निर्माण के लिए किया गया। जितने स्वरूप आराधना हेतु निर्मित कराए गए उनमें नब्बे प्रतिशत की सौम्य, शान्त, दैदीप्तमान, कैशौर्य आभायुक्त एवं सर्वांगीण सौन्दर्य युक्त देव के रूप में कल्पना की गई और शिल्पकारों ने भी यही प्रयत्न किया कि उन मूर्ति स्वरूपों को वे कुछ इस प्रकार निर्माण करें कि उनके दर्शन मात्र से चित्त को शान्ति और आनन्द प्राप्त हो।

इसी क्रम को और विस्तार देते हुए उन्होंने दूर पर्वतों की चोटियों पर, घाटियों में एवं सागर के किनारे अधिक विशाल एवं भव्य मंदिरों को स्थापित किया। ये मंदिर केवल आस्था का प्रतीक ही नहीं थे वरन्ï इनके निर्माण में शिल्पकला की उत्कृष्टïता का भी समावेश कर इन्हें दर्शनीय एवं भव्य बनाने का सम्पूर्ण प्रयत्न किया गया।

यहीं से धर्म को माध्यम बनाकर पर्यटन को विकसित करने की परिकल्पना का विकास हुआ। सच पूछा जाए तो यह चतुर्मुखी विकास की अद्ïभुत व्यवस्था सिद्ध हुई। और यह व्यवस्था थोड़े-बहुत युगीन परिवर्तनों के साथ ही आज भी सार्थक है। कल्पना कीजिए उस युग की जब भारत छोटे-छोटे, दूर-दूर फैले हुए असंख्य गांवों के रूप में विकसित हो रहा था। ज्ञान का विकास कैसे हो? दूरस्थ प्रदेशों के लोग कैसे एक दूसरे के बारे में जानें, निकट आएं, इसी प्रश्न के उत्तर का हल संन्यास आश्रम में व्यक्ति को दूर-सुदूर स्थानों पर बने आस्था स्थलों की यात्रा के लिए प्रेरित कर, ढूंढा गया। संन्यास आश्रम में प्रवेश कर चुके व्यक्ति को इस हेतु भेजना निरापद भी था।

इसी क्रम ने जब और विकसित रूप लिया तो विभिन्न दूरस्थ स्थानों के विकास के लिए आस्था को माध्यम बनाया गया। हमारे ऋषियों ने यह परिकल्पना की कि यदि दूर-दराज के अपेक्षाकृत असहज स्थानों पर यदि कोई विशाल भव्य आस्था स्थल (मंदिर) स्थापित कर दिया जाए तो उस स्थान तक लोग अपनी आस्था के कारण दर्शन हेतु अवश्य जाएंगे और धीरे-धीरे उस स्थान का विकास भी होगा। उनकी यह परिकल्पना नितान्त सत्य सिद्ध हुई। ऐसे स्थल, जो यूं तो अत्यन्त रमणीक थे, किन्तु जहां तक पहुंचना अत्यन्त कठिन एवं श्रम साध्य था, आराधना स्थल बनते ही केवल लोकप्रिय हुए वरन्ï उनका विकास भी प्रारम्भ हो गया।

एक और बड़ा लक्ष्य धर्म को पर्यटन से जोड़ने से सिद्ध हुआ। वह लक्ष्य था भारत के विभिन्न भागों में रहने वाले भिन्न भाषा-भाषी, रंग-रूप वाले लोगों को एक दूसरे के नजदीक लाना और आराधना स्थल को माध्यम बना कर उनमें भावनात्मक एकता स्थापित करना।

पर्यटन जीवन में उत्फुल्लता लाता है, एकरसता को दूर करता है, नवीन अनुभवों का साक्षात्कार कराता है, ज्ञान अर्जन का स्रोत है और इन सबसे बढ़कर वह व्यक्ति को पुन: ऊर्जावान बना कर जीवन युद्ध के संघर्ष को सरल बनाता है। इन सारे सत्यों का हमारे मनीषियों को ज्ञान था और वे चाहते थे कि प्रत्येक व्यक्ति पर्यटन की इस शक्ति का लाभ उठा सके। प्रत्येक व्यक्ति इस हेतु स्वत: कदम उठाएगा। इसी सत्य शंका का समाधान धर्म को पर्यटन से जोड़ कर निकाला गया। धर्म के पर्यटन से जुड़ते ही प्रत्येक व्यक्ति के लिए पर्यटन जैसे जीवन का एक अनिवार्य लक्ष्य हो गया।

रामेश्वरम पर शिव का जलाभिषेक करना है तो उत्तर के आदमी को दक्षिण जाना ही पड़ेगा। पुरी में यदि जगन्नाथ जी को प्रसाद रूपी खिचड़ी का भोग लगाना है तो उड़ीसा की यात्रा करनी ही होगी। हमारे चारों धाम गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ एवं केदारनाथ अपनी कठिन यात्रा के बावजूद पर्यटन के विशिष्टï केन्द्र साबित हुए।


पर्यटन की इस ऊर्जावान शक्ति का लाभ भारत में वैदिक युग के बाद भी विकसित होने वाले प्रत्येक धर्म ने उठाया। बुद्ध धर्म के अनुयाइयों ने तो बौद्ध विहारो एवं गौतम बुद्ध संदर्भित स्तूपों का विस्तार नेपाल, तिब्बत एवं चीन तक किया। कुशीनगर, सारनाथ, श्रावस्ती, बोध गया, सांची आदि इस रूप में बेहद लोकप्रिय हुए। जैन धर्म के ऋषियों ने भी इस परपंरा का पालन किया और माउंट आबू, सोनगिरी, जबलपुर आदि जैन तीर्थ स्थलों के रूप में विकसित हुए। इसी वर्तमान शताब्दी में लोकप्रिय हुआ वैष्णो देवी आस्था स्थल भी इसी प्रकार विकसित हुआ है।


सामान्य रूप से पर्यटन के लाभों के अतिरिक्त धार्मिक पर्यटनों का एक अतिरिक्त लाभ यह भी है कि धार्मिक पर्यटन पर्यटक को गौरव की अनुभूति प्रदान करता है साथ ही समाज की नजरों में भी उस व्यक्ति के प्रति विशेष सम्मान बढ़ जाता है जिसने धार्मिक पर्यटन किया हो। इस्लाम के अनुयाइयों में तो जो हज कर आता है उसे आज भी हाजी की विशिष्टï उपाधि एवं सम्मान प्राप्त होता है।

हमारे देश में भी वर्तमान युग में जब आस्था और धर्म के प्रति संवेदनशीलता कम हो रही है, अमरनाथ जैसे अपेक्षाकृत कठिन यात्रा प्रधान तीर्थस्थलों की यात्रा कर आए व्यक्ति को विशेष सम्मान की नजर से आज भी देखा जाता है। मुश्किल से पचास वर्ष पहले तक चारों धाम की यात्रा भी अत्यन्त श्रम साध्य एवं कष्टïप्रद थी। उस युग में चारों धामों की यात्रा करने वाले को भी विशेष सम्मान प्राप्त होता था।

धर्म और पर्यटन का यह अन्योन्याश्रित संबंध जिसका विकास वैदिक काल में हुआ, आज भी प्रासंगिक एवं उपयोगी है। शारीरिक से अधिक मानसिक स्वास्थ्य को नव-शक्ति प्रदान करने में सर्वथा समर्थ धार्मिक पर्यटन देश की आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था के लिए भी अत्यन्त लाभदायक सिद्ध हुआ।

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