भारतीय ज्योतिष शास्त्र के पाँच अंगों की दैनिक जानकारी पंचांग में दी जाती है। ये अंग तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण हैं। सूर्य एवं चंद्र के अंतर से तिथि का निर्माण होता है। पूर्णिमा को सूर्य.चंद्र एक.दूसरे के सामने एवं अमावस्या को एक साथ रहते हैं। पूर्ण ग्रह सात होने के कारण सप्तवारों की रचना की गई है। हिन्दू पंचांग हिन्दू समाज द्वारा माने जाने वाला कैलेंडर है। इसके भिन्न.भिन्न रूप में यह लगभग पूरे भारत में माना जाता है। पंचांग या शाब्दिक अर्थ है पांच अंग यानि पंचांग। यही हिन्दू काल.गणना की रीति से निर्मित पारम्परिक कैलेण्डर या कालदर्शक को कहते हैं। 

 

ऐसे चलते हैं साल, महीने, सप्ताह और दिन

हिंदू कलैंडर यानि पंचाग में भी 12 महीने होते हैं। प्रत्येक महीने में 15 दिन के दो पक्ष होते हैं। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। प्रत्येक साल में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में 27 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं। 12 मास का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। यह 12 राशियां बारह सौर मास हैं। जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से 11 दिन 3 घड़ी 48 पल छोटा है। इसीलिए हर 3 वर्ष में इसमे एक महीना जोड़ दिया जाता है जिसे अधिक मासए मल मास या पुरुषोत्तम महीना कहते हैं। प्रत्येक महीने में तीस दिन होते हैं। महीने को चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने के आधार पर शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष विभाजित होते हैं। एक दिन को तिथि कहा जाता है जो पंचांग के आधार पर उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक होती है। दिन को चौबीस घंटों के साथ.साथ आठ पहरों में भी बांटा गया है। एक प्रहर करीब तीन घंटे का होता है। एक घंटे में लगभग दो घड़ी होती हैं। एक पल लगभग आधा मिनट के बराबर होता है और एक पल में चौबीस क्षण होते हैं। पहर के अनुसार देखा जाए तो चार पहर का दिन और चार पहर की रात होती है। यह सूर्योदय से दूसरे दिन के सूर्योदय पूर्व तक रहता है। जिस दिन चंद्रमा जिस स्थान पर होता है उस दिन वही नक्षत्र रहता है। सूर्य.चंद्र के 13 अंश 20 कला साथ चलने से एक योग होता है। ये कुल 27 हैं। तिथि के अर्द्ध भाग को करण कहते हैं। इनकी संख्या ग्यारह है। स्थिर करण 7 एवं चर करण 4 होते हैं। ज्योतिष की चर्चा में राशि का स्थान प्रमुख रूप से होता है। इसी से सभी ग्रह की स्थिति जानी जाती है। ये बारह होती हैं। इनका क्रम भी निश्चित है। अर्थात मेष राशि के पश्चात वृषभ राशि तथा पूर्व में मीन राशि आती है। राशियों का प्रारंभ मेष राशि से होकर अंत मीन राशि पर होता है। इस राशि के समूह को राशि चक्र या भाग चक्र कहते हैं।

 

ये हैं पंचांग के पांच अंग

नक्षत्र

पंचांग का पहला अंग नक्षत्र हैण् ज्योतिष के मुताबिक 27 प्रकार के नक्षत्र होते हैं, लेकिन मुहूर्त निकालते समय एक 28वां नक्षत्र भी गिना जाता है। उसे कहते है अभिजीत नक्षत्र, शादी, ग्रह प्रवेश, शिक्षा, वाहन खरीदी आदि करते समय नक्षत्र देखे जाते हैं।

 

तिथि

पंचांग का दूसरा अंग तिथि है। तिथियां 16 प्रकार की होती हैं, इनमें पूर्णिमा और अमावस्या दो प्रमुख तिथियां हैं। ये दोनों तिथियां महीने में एक बार जरूर आती हैं। हिंदी कैलेंडर के अनुसार महीने को दो भाग में बांटा गया है। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष, अमवस्या और पूर्णिमा के बीच की अवधि को शुक्ल पक्ष कहा जाता है। वहीं पूर्णिमा और अमावस्या के बीच की अवधि को कृष्ण पक्ष कहा जाता है।

 

योग

पंचांग का तीसरा अंग योग है। योग किसी भी व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं। पंचांग में 27 प्रकार के योग माने गए हैं। इसके कुछ प्रकार है. विष्कुंभ, ध्रुव, सिद्धि, वरीयान, परिधि, व्याघात आदि।

 

करण

पंचांग का चौथा अंग करण है। तिथि के आधे भाग को करण कहा जाता है, जो मुख्य रूप से 11 प्रकार के करण होते हैं। इनमें चार स्थिर होते हैं और सात अपनी जगह बदलते हैं। बव, बालव, तैतिल, नाग, वाणिज्य आदि करण के प्रकार हैं।

 

वार

पंचांग का पांचवा अंग वार है। एक सूर्योदय से दूसरे सर्योदय के बीच की अवधि को वार कहा जाता है। रविवार, सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार, और शनिवार सात प्रकार के वार होते हैं। इनमें सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार को शुभ माना गया हैं।

 

पंचांग का ज्ञान

पंचांग दिन को नामंकित करने की एक प्रणाली है। पंचांग के चक्र को खगोलीय तत्वों से जोड़ा जाता है। बारह मास का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। गणना के आधार पर हिन्दू पंचांग की तीन धाराएँ हैं. पहली चंद्र आधारितए दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धति। भिन्न.भिन्न रूप में यह पूरे भारत में माना जाता है। एक साल में 12 महीने होते हैं। प्रत्येक महीने में 15 दिन के दो पक्ष होते है। शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक साल में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में 27 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं। पंचांग भारतवर्ष की ज्योतिष विधा का प्रमुख दर्पण है । जिससे समय की विभिन्न इकाईयों ज्ञान प्राप्त किया जाता है। संवत्, महीना, पक्ष, तिथि, दिन आदि का विधाओ को जानने पंचांग एक मात्र साधन है । धार्मिक व सभी प्रकार शादी, मुण्डन,भवन निर्माण आदि तिथियों के समय पर अनुष्ठान का ज्ञान पंचांग द्वारा लगाया सकता है । काल रूपी ईश्वर के विशेष अगंभूत पंचांग है  तिथि, नक्षत्र, योग, दिन के ज्ञान को सादर प्रणाम किया जाता है । आज इतना दैनिक में विशेष प्रचलित राशि फल एग्रह परिवर्तनए त्यौहार व व्रत आदि इसी पंचांग से देखा जाता है ।

 

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