ग्रहो का हमारी जिदंगी से एक खास नाता है। हमारे कर्मां से लेकर हमारे भाग्य तक हर जगह ग्रहों का विशेष प्रभाव नज़र आता है। अगर ऐसे में कुछ ग्रह हमसे रूष्ठ हो जाएं, तो उनका नकारात्मक प्रभाव हमारे जीवन पर साफतौर पर देखा जा सकता है। नतीजन जीवन में बिन बुलाई मुश्किले और तकलीफे आने लगती है।ं अगर सभी ग्रहों की बात करें, तो शनि ग्रह बेहद प्रभावशाली माना जाता है। अगर शनि ग्रह की क्रूर दृष्टि जीवन पर पड़ जाए, तो कई तरह के बदलाव आने लगते हैं। ब्रह्म पुराण की मानें, तो शनि के प्रकोप और रूष्ठता के पीछे उनकी पत्नी का श्राप है। जो उन्होंनें शनिदेव को दिया था। ब्रह्म पुराण के मुतबिक भगवान सूर्य के पुत्र शनिदेव बचपन से ही भगवान कृष्ण के परम भक्त थे और उनकी भक्ति में लीन रहा करते थे।  आइए जानते हैं, उनके जीवन में आने वाले इन बदलावों और उनकी क्रूर दृष्टि का रहस्य।

पौराणिक कथा

एक पोराणिक कथा के मुताबिक शनिदेव का विवाह चित्ररथ की कन्या से कर दिया गया था। वे एक तेजस्वी कन्या था। एक बार उनका मन बेहद विचलित हो उठा और वो पुत्र प्राप्ति की इच्छा लिएं शनिदेव के पास जा पहुंची। मगर वहीं भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त शनिदेव भक्ति में लीन थे। उनकी पत्नी उनके पास ही बैठ गई और लंबे वक्त तक इंतज़ार करती रही लेकिन यानिदेव भगवान श्रीकृष्ण के ध्यान में डूबे हुए थे। उन्होंनें काफी देर तक प्रतीक्षा की और फिर रूष्ठ होकर शनिदेव को श्राप दे दिया और कहा कि अब आप जिसकी ओर भी देखेंगे, वो नष्ट हो जाएगा। भक्ति में लीन शनिदेव का जब ध्यान टूटा, तो उन्होंनें अपनी पत्नी से माफी मांगी और अपनी भूल को भी स्वीकारा। मगर अब उनकी पत्नी में याप को वापिस लेने की शक्ति नहीं थी। ऐसी मान्यता है कि अगर शनिदेव किसी को देखते हैं, तो उसका अनिष्ट हो जाता है।  

शनिवार की कथा

शनिदेव का प्रकोप भयभीत करने वाला होता है। जी हां एक अन्य पौराणिक कथा के मुताबिक जब ज्योतिष आचार्यों ने भगवान दशरथ को चेताया था कि संकट भेदन हो सकता है और बारह वर्षों तक वो संकट राज्य पर बना रहेगा। शनि के प्रकोप के कारण आने वाली समस्या से इस राज्य में अन्न और जल का संकट गहरा सकता है और उसका दुष्प्रभाव प्रजा पर हो सकता है। ये बात सुनकर महाराज बेहद चिंतित हो उठे। उन्होंनें अब इस दोष से मुक्ति के लिए सबसे पहले शनिदेव को नमन किया और फिर युद्ध क्षेत्र में उन पर संहारास्त्र का संधान किया। अब महाराज दशरथ के आचरण से शनिदेव बेहद प्रफुल्लित हो उठे। उन्होंनें महाराज दशरथ को अपने पास बुलाया और कोई भी वर मांगन के लिए कहा। उन्होंने कहा कि जब तक सूर्य और नक्षत्रों की मौजूदगी बरकरार है, जब तक आप संकट भेदन से इस धरती को मुक्त कर दें। महाराज दशरथ को शनिदेव ने ये वर दे दिया और वो बेहद प्रसन्न हुए।

 

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