ब्रह्मा को भी अकेलापन नहीं भाया। अत: वह भी अपनी विभूतियों को स्वयं तक सीमित रखकर कैसे तृप्त रह सकता था? जब विचार शक्ति संकल्प शक्तिमान बनकर क्रिया में अत्यधिक नम्र होती है। उसी का तुरंत रूप सामर्थ्य एवं घटनाक्रम बनकर सामने आता है। नाभि में से मन मस्तिष्क संकल्प जब बहि रंग कर्म में विकसित होता है तो उस कर्म वल्लरी को पौराणिक अलंकारिक भाषा में कमल बेल कहा गया है। 

ब्रह्मा की इच्छा से जब संसार का सृजन हुआ तो उसमें ज्ञान और कर्म का समावेश हुआ। इन दोनों के मिलने से बहुत छोटा चेतना संकल्प शक्ति के रूप में तुरंत सामर्थ्य में बदल गई और संसार का विशाल स्वरूप बनकर तैयार हो गया। इसमें ऋद्धि-सिद्धियों का आनंद-उल्लास भर गया जो कमल की पंखुड़ियां हैं। सामर्थ्य के तुंरत रूप का मुख्य है- ज्ञान और कर्म। इसी के आधार पर मनुष्य की गरिमा का विकास हुआ। जो इन्हें जितना साफ और तेज बनाता जाता है, उसकी प्रगति पूर्णता की दिशा में उतनी ही तेज गति से होती जाती है। इस तथ्य को स्मरण रखने के लिए दो प्रतीक हमारी संस्कृति के हैं। एक है ज्ञान की ध्वजा जो शिखा (चोटी) के रूप में मस्तक रूपी किले पर फहराती रहती है, दूसरा है यज्ञोपवीत अर्थात् कर्तव्य-मर्यादा जिसमें मनुष्य को आगे-पीछे पूरी तरह कस दिया गया है। शिखा की स्थापना और यज्ञोपवीत को धारण करना, उसी ज्ञान और कर्म को साफ बनाए रखने की चेतावनी है। श्रावणी पर्व पर पुराना यज्ञोपवीत बदला जाता है और नया पहना जाता है। पिछले दिनों की हुई अप्रिय गति विधियों त्रुटियों दुराचारी का सच्चे हृदय से प्रायश्चित करते हुए हेमाद्रि संकल्प करते हैं, इसी समय ऋषि पूजन और वेद पूजन भी किया जाता है। वेद अर्थात् सद्ज्ञान ऋषि यानी वे व्यक्ति जो सद्ज्ञान को सतकर्म में नम्र करने के लिए साहसिक तपस्या करते हैं, कष्ट साध्य रीति-नीति अपनाते हैं। शिखा का सिंचन और यज्ञो-पवीत परिवर्तन एक प्रकार से इनके वार्षिक संस्कार हैं, जैसे हर वर्ष जन्मदिन और विवाह दिन मनाए जाते हैं और वाहन, शस्त्र आदि के लाइसेंस का नया रूप देना होता है। इस पर्व पर इनका निरीक्षण विश्लेषण नया रूप देना इसी उद्ïदेश्य से किया जाता है कि यज्ञोपवीत और शिखा जैसे प्रकाश स्तंभों को निरादर और भूलजाना के गर्त में न डाल दिया जाए। 

श्रावणी पर्व ब्रह्माणत्त्व एवं ऋषित्त्व के अभिवर्द्धन का पर्व है। सद्ïज्ञान और सतकर्म की मर्यादाओं का कहीं विभाजित न हो जाए। श्रावणी पर्व द्विजरव के संकल्प के नया रूप का पर्व है। इस दिन लोग परंपरा गत ढंग से एकत्रित होकर पवित्र नदी आदि संस्कारित स्थान पर तीर्थ आह्वïन करते हैं, दस स्नान हेमाद्रि  संकल्प, तर्पण आदि कर्म करते हैं। यह संसार प्रबंधक के संकल्प से उपजी है। हर व्यक्ति अपने लिए एक नए संसार की रचना करता है। यह संसार ईश्वरीय योजना के उचित हुई तो कल्याणकारी परिणाम होते हैं अन्यथा अनर्थ का सामना करना पड़ता है। अपने संसार में सोचने करने में कहीं कोई विकार आया हो तो इसे हटाने और नया शुभारंभ करने के लिए हेमाद्रि संकल्प दोहराया जाता है कि हम विशाल तंत्र के एक छोटे लेकिन प्रामाणिक पुरजे हैं। हमें ईश्वरीय योजना एवं देव संस्कृति के समान बनना और ढलना है। हमारे संकल्प के साथ वातावरण की पवित्रता और देव अनुग्रह का अनुदान मिल रहा है। दसस्नान के क्रम में 1. भस्म 2. मिट्टी 3. गोबर 4. गोमूत्र 5. गो-दुग्ध 6. गो-दधि 7. गो-घृत 8. सर्वोषधि (हल्दी) 9. कुश 10. मधु, ये दस वस्तुएं होती हैं। ये पदार्थ क्रमश: हाथों पर लेकर बाएं हाथ से कमर से नीचे के अंगों पर और दाएं हाथ से कमर के ऊपर के अंगों पर लेपन किया जाता है। अत: में साफ से स्नान किया जाता है। ये दस स्नान अब तक किए हुए पापों का प्रायश्चित करने तथा बिल्कुल नए जीवन में प्रवेश करने के लिए हैं, जैसे सांप केंचुली छोड़कर नई त्वचा प्राप्त करता है, वैसे ही पिछले ढर्रे को छोड़कर उत्कृष्टï जीवन जीने का व्रत लेते हैं।

1. भस्म स्नान में भावना यही है कि यह शरीर भस्मांत है मृत्यु कभी भी आ सकती है। अत: मृत्यु को स्मरण रखते हुए मरणोत्तर जीवन की सुख-शांति की तैयारी करें। 

2. मिट्टी स्नान में भावना यही है कि जिस मातृ भूमि का ऋण हमारे ऊपर है, उससे उऋण होने के लिए देश भक्ति एवं मातृ भूमि की सेवा का व्रत ग्रहण किया जा रहा है।

3. गोबर से स्नान में भावना रखते हैं कि गोबर की भांति अपने जीवन को संसार में सत्प्रवृत्तियों के फलने-फूलने में लगा दें। मनोभूमि को उपजाऊ बनाएं।

4. गो मूत्र मलिनता नाशक एवं कीटाणु नाशक है। इसके स्नान से शारीरिक और मानसिक दोष- दुर्गुण हटते हैं।

5. गो- दुग्ध स्नान में भावना है कि जीवन दूध सा धवल, साफ निर्मल बनने की प्रेरणा मिले। 

6. गो-दधि स्नान का अर्थ है- नियंत्रित होना, स्थिर होना। हमारी रीति-नीति स्थिर रहे।

7. घृत स्नान में भावना है कि जीवन क्रम चिकना सरस और स्नेह की प्रचुरता से भरा रहे। 

8. हल्दी रोगाणुओं का नाश करती है, शरीर मन के दोष-दुर्गुण दूर होते हैं।

9. कुश स्नान का अर्थ है तीक्ष्णता युक्त रहना, अत्याचार के प्रति नुकीले और तीखे बने रहना।

10. मधु स्नान का अर्थ है- मिठास सज्जनता और मधुर भाषण। विचार संसार की सबसे बड़ी शक्ति है और उन्नति का सर्वश्रेष्ठï साधन है। उच्च आदर्शों से युक्त बने रहने के लिए हमें नियमित अध्ययन का क्रम बनाना चाहिए।

अपनी सांस्कृतिक महानता का बोध बना रहे, उसके प्रति गौरव की अनुभूति होती रहे और उसे क्रियान्वित करने का कठोर उत्साह बना रहे तो जीवन धन्य हो जाता है। इसी स्मृति को बनाए रखने के लिए शिखा का सिंचन किया जाता है। नए यज्ञोपवीत का सिंचन करके ब्रह्म, विष्णु, शिव, यज्ञपुरुष एवं सूर्य देव का आहावन किया जाता है, तत्पश्चात् यह अभिमंत्रित यज्ञोपवीत धारणकर और पुराना उतार दिया जाता है। श्रावणी पर्व पर ब्रह्म, वेद और ऋषियों का आवाहन-पूजन किया जाता है। ब्रह्म ईश्वर हैं, ब्राह्म चेतना का चुन ना करने और अनुशासन पालन करने से ही मनोनीत की प्राप्ति हो सकती है। 

वेद ज्ञान को कहते हैं, ज्ञान से ही विकास होता है। अज्ञान ही अवनति का मूल है। ज्ञान का साक्षात्कार करने के लिए वेद का आवाहन-पूजन करते हैं। ऋषियों ने उच्चतम जीवनचर्या का विकास और अभ्यास करने में सफलता पाई। उनके अनुभवों-निर्देशों का लाभ उठाने के लिए ऋषि-पूजन किया जाता है। श्रावणी पर्व रक्षाबंधन का भी पर्व है। आचार्य ब्राह्मïण अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बांधते हैं। भावना यही है कि अब देश धर्म समाज, संस्कृति की सीमाएं खतरे में हैं, उनकी रक्षा के लिए धर्म योद्धा के रूप में सृजन सेना के युग सैनिक बनने के लिए कीटबद्ध होना चाहिए। कन्याओं द्वारा राखी बांधने में भानारी की गरिमा बढ़ाना है। कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए संकल्प बद्ध करना है। नारी को मां, बहन और पुत्री की नजर से देखने का भाव है। इस पर्व पर वृक्षा रोपण भी किया जाता है। वृक्ष परोपकार के प्रतीक हैं जो बिना मांगे फल, लकड़ी, छाया और औषधि प्रदान करने के साथ जीवनदायी प्राण वायु देते हैं वृक्षों से वर्षा और प्रदूषण नियंत्रित होता है। वृक्षारोपण जैसा पुण्य कार्य एवं वृक्ष पूजन इस पर्व की विशेषता है। तुलसी रोपण का कार्यक्रम सब जगह होना ही चाहिए, इन प्रेरणाओं के साथ श्रावणी पर्व मनाया जाए तो ही पर्व मनाना सफल होगा। 

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