पांखी की पन्द्रह वर्ष पुरानी सहेली विदेश से भारत लौटी तो उसी के घर आयी। अपनी खूबसूरत और अमीर सखी के आगमन पर पांखी का कॉलर थोड़ा ऊंचा हुआ और उसने खुलकर स्वागत किया अपनी माडर्न सहेली का। सुधीर को पहले तो अजीब सा लगा पर जब आमने-सामने मुलाकात हुई पांखी की सखी से, तो वह ऐसा मचल सा गया माना पुराने झुनझुने से मन बहलाते बच्चे को किसी ने नया खिलौना थमा दिया हो। 

पांखी को अपनी सहेली से बहुत स्नेह था। वो बड़ी खुशी से उसको अपने घर का एक-एक कोना दिखाती उसकी राय लेती। किसी बात का बुरा न मानती। मानती भी क्यों, पांखी और उसकी सखी राधा में थी ही इतनी अच्छी समझ। मज़ा तो वैसे सुधीर को भी आ रहा था, पर वो कुछ दूसरा वाला था उसको राधा से लगाव सा होने लगा था। क्यों? इसका कारण न वो जानता था न जानना चाहता था। सुधीर के लिए पहले तो यही एक बड़ा प्यारा सा सरप्राइज था कि सिर्फ आवाज में ही परिचित वो प्यारी सी परी सशरीर उसके घर पर आ पहुंची और जब आयी तो घर को जन्नत सा भी बना गयी थी।

सुधीर उसे मन ही मन चाहने सा लगा था फिर राधा थी भी तो ऐसी ही चंचल चपल हंसमुख और बहुत ही आकर्षक। सुधीर के लिए इतना काफी था वो मन ही मन खुद को सहलाता और खुद को माफ करता कहता कि पांखी के साथ एक उदास दिनचर्या ने सब कुछ ठहरा सा दिया था। सोम से शुक्र दफ्तर में खटते रहो फिर शनिवार सुबह से शाम पांखी के साथ बाजार भर की खाक छानकर राशन वाशन लाद कर लाओ। रविवार को दोनों बेटों की बातें सुनो, बस सुनते रहो और फिर आ जाता है वही सोमवार।

हालांकि कभी कभार फिल्म, मॉल का भी कार्यक्रम बनता, मगर सुधीर वहां भी बोर सा हो जाता। आजकल फिल्में बन भी तो कैसी रहीं थी अब कुछ वैसी वाली जीनत अमान देवानन्द या राजकपूर नरगिस या फिर दिलीप मधुबाला वाली हॉट जोड़ी स्क्रीन पर आये तो फिल्म देखने का कोई अर्थ भी हो। आजकल के गाने तो ऐसे कि आये और गये। वैसे ही फिल्मों में किरदार पहले तो क्या फिल्में थी। वैसे सुधीर को अमिताभ रेखा की सारी फिल्में पसन्द थी, मगर घर पर तसल्ली से देखने का वक्त होता नहीं था, पूरा हफ्ता यों ही उदास, थकावट में गुजरता मगर पिछले पन्द्रह दिनों से तो घर में जैसे ताजी हवा का कोई झोंका सा बह रहा था।

ऐसा महसूस होता कि मन-मयूर नाचने को बेताब हो उठा हो। सुधीर आजकल खूब खुश रहता था, राधा भी उसके साथ खूब देखती बोलती खिलखिलाती, थोड़ी बहुत छेड़छाड़ भी रहती थी। अभी तक वो पल आया नहीं था कि सुधीर पूरी आत्मीयता से अपने मन की बात राधिका से कह पाता। खैर राधिका पूरे दो महीने के लिए आयी थी इसलिए सुधीर ने सोचा तसल्ली से एक दो दिन में अपने मन की बात राधिका से कह ही दूंगा।

यही सब सोचते सोचते सुधीर को अन्दाजा भी नहीं हुआ कि वो इस हफ्ते कई काम करना भूल गया था। पिछले दिनों किसी पॉलिसी का प्रीमियम भरना था, गैस बुक करवानी थी, बच्चों की फीस जमा करनी थी, एक मित्र की बिटिया का विवाह था, वहां जाना भूल गया और ना ही उनसे फोन अथवा मैसेज करके क्षमा मांगी उफ! ये राधिका। ऐसा बुदबुदाता सुधीर अपने दफ्तर में दाखिल हो गया। ताबड़तोड़ काम चलता रहा।

आज सुधीर जरा जल्दी घर जाना चाहता था वो चाहता था कि अपने शहर के किसी महंगे से रेस्त्रां में राधिका को रात्रि भोज करवाया जाये इसलिए केबिन में घुसते ही वह फाइलें निबटाने में जुट गया। मगर दोपहर के वक्त उसको एक ऐसी घटना से दो-चार होना पड़ा कि कुछ बदल सा गया। उसके ऑफिस के सहकर्मी की एक महिला मित्र ने झूठी दोस्ती गांठ कर उससे लाखें रुपये, जेवर, जमीन आदि हड़प कर अपना फोन नम्बर, पता और अपनी पहचान बदलकर खूब धोखा दिया।

इस घटना का जिक्र जब जोर- शोर से दफ्तर के अवकाश के समय हो रहा था।  तब सुधीर के पैर भीतर से कंपकंपा रहे थे। दरअसल उन्हें भी राधिका का कुछ ज्यादा अता-पता नहीं था। बस यही कि वो न्यूजर्सी में रहती है। पति मशहूर व्यवसायी है और वो लम्बे अवकाश के लिए यहां आयी है। बाकी खुद पांखी को भी यह नहीं पता था कि राधिका के माता-पिता भाई-बहन कहां हैं, कैसे हैं, उसे फोन करते हैं या नहीं वगैरह वगैरह।

उफ! सुधीर जब दोपहर अवकाश के बाद फिर अपने केबिन में लौटा तो उसके हाथ सुन्न से पड़ रहे थे। उसने सोचा आज घर जाकर रात्रिभोज तो रहने दूंगा, पहले चुपचाप फेसबुक या गूगल पर इस राधिका की पूरी कुण्डली ढूंढ निकालूंगा कि ये सचमुच में क्या है। कहीं कोई ठग तो नहीं। हमें बुद्धू समझकर कहीं लूटने खसोटने तो नहीं आ धमकी है।

सुधीर ने खुद को संयत करते हुए बहुत दिनों बाद पांखी को एक फोन किया। पांखी भी कुछ चहक सी रही थी। पांखी ने बताया कि आज उसने राधिका को अपने आभूषण पहनने को दिये। ज्यादा कुछ नहीं एक डायमण्ड की अंगूठी और दो कंगन। जब सुधीर ने पूछा कि राधिका कहां है तो पांखी ने बताया किसी जरूरी खरीदारी के लिए गयी है, पर अभी लौटी नहीं, फोन भी नहीं उठा रही है।

सुधीर ने पांखी को फोन पर डराना उचित न समझा। अभी दफ्तर की छुट्टी में दो घंटे बाकी थे। सुधीर ने पांखी से बच्चों के बारे में पूछा और बात खत्म करके फोन वापस रख दिया। फिर पूरे दो घण्टे जैसे-तैसे काम निबटा कर सुधीर तीर की सी गति से घर लौटा। आज शाम बस में बैठे बैठे उसे यही लग रहा था कि राधिका पक्का गायब हो गयी है अब चिन्ता यह थी कि न जाने और क्या-क्या माल समेट कर नौ दो ग्यारह हुई है। सुधीर बस से उतरा भी न था कि पांखी का फोन आया कि राधिका वापस आ गयी है और पूरे घर के लिए खूब सारे उपहार लायी है। साथ ही सबको अपनी तरफ से रात के खाने पर वन्डरलैंड रेस्त्रां में ले जाना चाहती है। सुधीर ने मन ही मन चैन की सांस ली मगर सिर्फ हूं कहकर फोन काट दिया। 

घर की दहलीज तक पहुंचते पहुंचते वह बहुत कुछ तय कर चुका था। उसने घर में प्रवेश करते ही बहाना बनाया कि आज रात वो बहुत व्यस्त हैं क्योंकि कल एक मीटिंग के लिए प्रेजेन्टेशन तैयार करनी है। साथ ही उसने आज रात सिर्फ मूंग की खिचड़ी खाने की इच्छा जाहिर की। ऐसा बोलते वक्त उसने गौर किया कि राधिका ने वो गहने उतार दिये थे शायद पांखी को वापस भी कर दिये हों। 

फिर चुपचाप अपने कमरे में जाकर सुधीर काफी देर काम के बहाने कुछ विचार करता रहा। न जाने क्यों, अब वो इस राधिका से पीछा छुड़ाना चाहता था। जबकि डरने की कोई बात नहीं थी। उसको थका जानकर पांखी कमरे में ही चाय ले आयी और यह भी बता दिया कि राधिका ने गहने वापस दे दिये हैं। सुधीर ने बहाना सा बनाया और मन ही मन पांखी के प्रति खूब सारा स्नेह उड़ेल कर काम करने में जुटा रहा वैसे एक फायदा तो हुआ इस बहाने उसने कुछ पेंडिंग काम निबटा डाले। 

उसने सिर्फ नपी तुली बातें की और वो भी अपने बच्चों से। सुधीर से बच्चों को कुछ मजेदार किस्से सुनाये मगर कोई फायदा नहीं था, बच्चे गहरी नींद में सो चुके थे। उस रात सुधीर ठीक से नहीं सोया। उसके दिमाग में रात भर कुछ न कुछ हलचल सी मची रही। अगली दोपहर अपने दफ्तर से फोन करके पांखी को बताया कि राधिका से कहना कि उसके लिए किसी गेस्ट हाउस में रहने की व्यवस्था कर रहा हूं। कारण पूछने पर उसने बताया कि दो तीन दिन बाद सपरिवार रामेश्वरम जाना है। क्यों जाना है जब पांखी ने थोड़ा जोर देकर पूछा तो सुधीर ने ठीक-ठाक जवाब नहीं दिया।

पांखी को लगा कि हो सकता है किसी मित्र या परिचित से संबंधित कोई जरूरी काम होगा। वैसे भी शनिवार- रविवार को बाहर जाना बच्चों के लिए भी बेहतर था इसलिए पांखी ने हंसते हंसते राधिका को सब बता दिया।  सफर में बच्चे खुश थे और सुधीर तो सबसे ज्यादा खुश था। आखिर राधिका से पीछा छूटा अब उसे जो करना हो वो खुद करे। हमने चार दिन के लिए गेस्ट हाउस में व्यवस्था कर दी है अब हम क्या कर सकते हैं।

पांखी को आधे रास्ते पहुंचकर सुधीर ने एक खुशखबरी सुनायी कि उसका एक साल से अटकी वेतनवृद्धि आज ही लागू हो गयी है। साथ ही उसे अगले महीने पेट्रोल बचाने के लिए दफ्तर मे होने वाले विशेष समारोह में सम्मानित किया जाएगा। पांखी ने खुश होकर बधाई दी। वो जानती थी कि सुधीर इतने अनुशासित हैं कि घर पर कार होने के बावजूद दफ्तर हमेशा बस से जाते हैं इस आदत की वजह  से दफ्तर में कई लोग उनकी मिसाल भी देते थे। 

रामेश्वरम पहुंचकर पांखी के पास दो बड़ी खुशियां थी। उसके बच्चे तो इस अचानक यात्रा से खासे उत्साहित थे। वापस लौटते हुए जब वे यात्रा के अनुभव बांट रहे थे तो राधिका का फोन आया। उसने बताया कि वो अपने ननिहाल जा रही थी। और अब शायद ही वापस मिलना हो पायेगा। राधिका का ननिहाल शिमला में था, जो पूना से काफी दूर था। राधिका ने सबको याद किया था। वह एक महीना शिमला रहकर वापस विदेश लौटने का कार्यक्रम बना चुकी थी। 

यह सब जानकर सुधीर ने चैन की सांस ली। वो कौन थी? क्या थी? उसे क्या लेना देना है? उसका अपना काम-काज है? पत्नी है बच्चे हैं। बेकार ही राधिका उसकी अच्छी खासी जिन्दगी में तूफान बन रही थी। चलो तूफान से बच गये। सुधीर ने मन ही मन रामेश्वरम के शान्त और बगैर हलचल वाले समुद्र को याद किया अब उसके जीवन में भी शान्ति और गहराई वापस आ  चुकी थी । सुधीर मन ही मन बहुत प्रसन्न था। 

 

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