Short Story: उस समय घर में नया-नया लैंडलाइन फोन आया था। हर बच्चे की
तरह मुझे भी हमेशा उत्सुकता रहती थी कि फोन को बार-बार उठाऊं
और कुछ नंबर डायल करूं। मम्मी-पापा और दादा-दादी से छुपकर मैं
अपने भाई के साथ फोन के साथ खेलती थी। तब फोन डायरेक्टरी भी
हमारे घर में थी और हम जब दिन में सब सो जाते थे तब चुपके से
फोन वाले रूम में जाते। डायरेक्टरी से कोई नंबर देखकर उसे डायल
करते और बोलते, ‘हैलो, चीनू से बात हो करवा दीजिए।’ सामने से
आवाज आती, ‘बेटा आपने रॉन्ग नंबर लगाया है। यहां कोई चीनू नहीं
रहती है।’ बस हम ‘ओह सॉरी’ कहकर फोन रख देते। बस ये जैसे कि
रोज का मामला हो गया था। हम इतने रोज कॉल करते कि भूल गए
थे कि हम पहले उस नंबर पर कॉल करके ‘प्रैंक’ कर चुके हैं। बस एक
दिन हमने उसी घर पर कॉल कर लिया जहां हम पहले दो बार कर
चुके थे। उन अंकल ने इतनी जोर से फटकार लगाई कि हमारे हाथ-
पैर कांपने लगे। हमें तो जैसे लगा कि वह फोन से ही बाहर न आकर
मारने लगे। अब थी तो बच्चा बुद्धि। हमें समझ ही नहीं आया कि
वो डांट रहे हैं तो फोन ही रख दें। इतने में मम्मी वहां आ गई और
यह नज़ारा देखा तो मेरे हाथ से झट से फोन लिया। फोन पर अंकल
ने पूरी बात बताई तो मम्मी ने उनसे माफी मांगी और कहा कि अब
ऐसा नहीं होगा।
बस उस दिन के बाद से हमारा फोन पर रॉन्ग नंबर लगाने का भूत
गायब हो गया और अब जब भी भाई के साथ वो घटना याद करती
हूं तो खूब हंसी भी आती है।
रॉन्ग नंबर-जब मैं छोटा बच्चा था
