विनाशकारी वेला—गृहलक्ष्मी की कहानियां: Grehlakshmi ki Kahani
Grehlakshmi ki Kahani

Grehlakshmi ki Kahani: मृत्यु एक सबसे बड़ा सत्य लेकिन यह सत्य इस रूप में ऐसी विपत्ति देखने को मिलेगी। यह कभी मैं नहीं सोच पाया था । पूरी धरा पर कोहराम मचा हुआ है कोई भी परिवार ऐसा नहीं बचा है जिसमें से युवा, बच्चे, बूढ़े इस अंतिम सत्य से ना गुजर रहे हैं । दुर्भाग्य की सबसे बड़ी बात है कि अपने ही अपने को छूने तक से भी मजबूर हैं।आंखों से अश्रु धारा बह रहे हैं करीब आने की इच्छाएं हो रही है लेकिन ऐसा मंजर है कि ना करीब आ सकते हैं। ना थोड़ी देर सुकून के लिए अपनी मृतकों को परिजन अपने पास रख सकते हैं । मैं डॉक्टर आशीष….डॉक्टर ईश्वर का दूजा रूप मेरी नज़रों के सामने महिला अपने पति की बिगरती हालात के वियोग में चीत्कार कर रही है । यह एक नहीं हर घर की चित्कारों की ध्वनि है जो कोरोना महामारी की एक दुखद विनाशकारी वेला है……..।

डॉक्टर साहब मेरे पति को बचा लीजिए ना, डॉक्टर साहब मेरे पति को बचा लीजिए ना। मेरे पैर में लटकते हुए वह महिला बेबस और लाचार …..। आप कैसे डॉक्टर हैं आपका काम क्या है जब आप मेरे पति को बचा ही नहीं सकते। उस महिला का कहना भी जायज था क्योंकि वह बेबस और लाचार थी। ये लाचारी उनकी आंखों में साफ झलक रही थी। निरंतर बहती अश्रु धारा इसको प्रमाणित कर रही थी। मैं उन्हें सांत्वना देते हुए मैं डॉक्टर हूं इसीलिए तो यहां हूं वरना लोग दूरी से दूरी बनाकर रह रहे हैं ।जान किसे नहीं प्यारी है, मुझे भी प्यारी है मैं भी तो किसी का पति हूं बेटा हूं। मैं उन्हें समझाते हुए……मैं पूरी कोशिश कर रहा हूं, आप बिल्कुल परेशान मत होइए। उसने मेरी आंखों में उम्मीद से देखा और उसे विश्वास हुआ कि ,मैं उसके पति को बचा लूंगा। मैं क्या कितने डॉक्टर भी लग जाए एक साथ,जिसको कुदरत ने नहीं संभाला इस विनाशकारी वेला में उसको डॉक्टर कैसे संभाल पाएंगे। जिसकी किस्मत बुलंद है, हम तो बस माध्यम हैं उनके लिए…….।

दुर्भाग्य से उनके पति को मैं नहीं बचा पाया और मैं क्या कोई और भी नहीं बचा सकता था। इस वक्त की हवा ही कुछ ऐसी चल रही थी। हम डॉक्टर का तो घर भी जाना मुश्किल हो गया था। पूरे दिन मरीज का आना और हम डॉक्टरों की टीम के द्वारा उनको नहीं बचा पाना। हमें भी अंदर से झकझोर रही थी, और खुद की मृत्यु का भी भय सता रहा था। अभी मैं एक मरीज को देख ही रहा था घर से कॉल आया की, बात हुई तो पता चला मेरे छोटे भाई मयंक को भी कोरोना हो गया। मैं अपने घरवालों को समझाया कि तुम लोग परेशान ना हो मैं उसको लेने आ रहा हूं तुरंत। मैंने तुरंत में गाड़ी बुक किया और चल पड़ा घर की ओर, करीब करीब रात के 11:00 बज रहे थे। बाहरी हवाएं डरावनी लग रही थी। मेरे हॉस्पिटल से घर की दूरी अच्छी खासी थी सो थोड़ा समय लगना था पहुंचने में। मैं एक बार फिर बाहर झांककर देखा डरावनी रातों को देखकर डर गया।कुछ घंटे पहले बीते घटनाओं में खोता चला गया…….।

कहीं उस महिला की तरह मेरे घर में भी ना चीत्कार गूंजने लगे इस डर से मेरी रूह तक कांपने लगी। मैं बड़ा भाई हूं क्या जवाब दूंगा उसकी पत्नी बच्चे को। अपने आप को मजबूत , और अपने हौसला को बुलंद करते हुए नहीं नहीं ऐसा कुछ भी नहीं होगा मैं उसका बड़ा भाई हूं मैं उसे कुछ भी नहीं होने दूंगा। किस तरह से बचपन में उसकी चंचलता के आगे मैं समर्पित हो जाता था ।वह अपना खाना चंचलता में गिरा लेता था, और मैं बड़ा भाई होने का फर्ज अदा करते हुए उसके आगे अपना प्लेट खिसका देता था। यही सब सोचते हुए यह भय से भरी भयावह रात मुझे अपने घर में भी अनहोनी की संकेत दे रही थी ।लेकिन फिर भी मन को संभालते हुए अपने आप को स्थिर किया। तब तक हमारे घर भी नजदीक आ गए मैं मन ही मन ईश्वर को याद करने लगा। सच्चे दिल से ईश्वर से मैं प्रार्थना की मेरे छोटे भाई की जिंदगी बक्स दो मेरी जिंदगी ले लो। हमारे दोनों बच्चे बड़े हो गए हैं , वो जी लेंगे हमारे बगैर भी लेकिन उसके बच्चे अभी बहुत छोटे-छोटे हैं……..।

यही सब सोचते सोचते घर पहुंच गया घर पर सभी इंतजार कर रहे थे ।आनन फानन में मैंने अपने भाई को गाड़ी पर लिया। उसकी पत्नी मोनिका भी जाने की जिद करने लगी मैंने कहा अभी सिचुएशन नहीं है किसी के साथ चलने की। उसको मना किया वह समझ गई लेकिन ,मेरी पत्नी कोमल मानने का नाम नहीं ले रही थी वह मेरे साथ हो चली। पता नहीं क्यों???? मुझे भी उसका साथ चलना अच्छा लगा। मयंक बुखार और कलेजे के दर्द से तड़प रहा था, और मैं जितनी देर का सफर था ईश्वर से मन ही मन प्रार्थना कर रहा था । हे ईश्वर आप चाहोगे तो कुछ भी संभव हो सकता है किसी तरह आप जान के बदले जान लेकर मेरे भाई की जान बचा दो। यह शब्द बोलते के बाद मेरा मन कोमल की चेहरे की और देखकर फिर झेप सा गया। मेरा दिल खुद से सवाल करते हुए कहा कि, मैं कितना स्वार्थी हो गया हूं। कोमल के बारे में एक बार भी नहीं सोचा उसका और कौन ख्याल रखेगा मेरे ना होने पे। बच्चे तो अपनी दुनिया में मग्न हो जाएंगे……..।

यही सब सोच ही रहा था की मेरी बगल में कोमल मेरा मुंह देख रही थी, उसने कहा क्या सोच रहे हो??? मैंने कहा कुछ भी नहीं। कुछ नहीं होगा मयंक बाबू को उसने बहुत ही विश्वास के साथ कहा। मैं भी ईश्वर के आदेश स्वरूप पूरे आत्मविश्वास के साथ कहां मेरे भाई को कुछ भी नहीं होगा वह तुम्हारे साथ वापस घर लौटेगा l यह सब बातें करते-करते हम अस्पताल पहुंच गए जल्दी से मैं और मेरी पूरी टीम उसके इलाज में लग गए। कोमल बाहर इंतजार करती रहती एक दिन दो दिन एवं प्रकार 15 दिन बीत गए।धीरे-धीरे मयंक में सुधार आने लगा था ईश्वर की कृपा से। लेकिन मेरी स्वास्थ्य गड़बड़ हो रही थी, बुखार जाने का नाम नहीं ले रहा था । मुझे शक हो गया कि मुझे भी कोरोना हो गया है, कोमल दिन रात एक करके मेरी सेवा करने लगी थी अस्पताल में ही। मैं मना भी करता तब भी वह मेरे बगल में बैठी रहती ,मेरे सर को बड़ी प्यार से सहलाती मेरे हाथों में अपने हाथ डालकर घंटों बैठी रहती। मैं हमेशा कहता कि मुझसे दूर रहो तुम्हें भी कोरोना हो जाएगा फिर मुझे कुछ हो गया तो बच्चों का ख्याल कौन रखेगा…….।

वह मेरे मुंह पर हाथ रखते हुए फफककर कर बच्चों की तरह रोने लगी। ऐसा कुछ भी नहीं होगा, होगा तो मुझे भी अपने साथ लेते चलो मेरे जीने का फिर कोई मकसद नहीं रह जाएगा।पता नहीं कैसे ईश्वर ने मेरी सुन ली थी ।मुझे विश्वास था मयंक ठीक हो जाएगा , और वह ठीक हो गया। मुझसे मिलने आया मैंने कहा मुझसे दूर ही रहो मेरे भाई अभी यही जरूरी है। यही इस वक्त की मजबूरी है।मैंने सोचा भी नहीं था कि इस कोरोना से मेरे भाई को मुक्ति मिल जाएगी जो कि अभी के समय में एक चमत्कार ही तो था।मेरी तबीयत बिगड़ती ही चली गई। ईश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली थी मेरे भाई को बचाकर मैं डॉक्टर आशीष ईश्वर के लोक में पहुंच गया। इधर कोमल का रो रो के बुरा हाल था लेकिन मयंक के साथ किसी तरह यहीं पर मेरा अंतिम क्रिया कर्म करके घर वापस लौट गई । उसे हमारे बच्चों के लिए जीना जो था। मैं डॉ आशीष मृत्युलोक पहुंच कर भी सोचने पर मजबूर हो गया। मृत्यु जो जिंदगी का अंतिम सत्य है, इतने लोगों की जान बचाने वाले डॉक्टर की जान को भी नहीं बकस्ती